क्या टूटने वाला है पीडीपी और बीजेपी का गठबंधन?

  • 22 अप्रैल 2017
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भारत प्रशासित कश्मीर की गलियों में पत्थरबाज़ी करते युवाओं का गुस्सा, चुनावी हिंसा में होने वाली मौतें और उपचुनाव में महज 7 फ़ीसदी का मतदान अगर काफ़ी नहीं हो तो जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के एक कैबिनेट सहयोगी के बयान से ज़ाहिर है कि महबूबा का मुश्किलें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही हैं.

जम्मू कश्मीर के उद्योग मंत्री चंदर प्रकाश गंगा का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वे कह रहे हैं कि पत्थरबाजी करने वालों को गोलियों से निपटना चाहिए. गंगा महबूबा की सरकार में साझेदार पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेता है.

पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का नेतृत्व गंगा के बयान पर उबल पाता उससे पहले ही भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव ने एक और बयान दे दिया, जिसमें उन्होंने सेना के अधिकारियों द्वारा कश्मीरी नागरिक को जीप के बोनेट से बांधने की घटना की प्रशंसा करते हुए कहा कि प्यार और युद्ध में सबकुछ जायज है.

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कश्मीर का वो इलाका जहां कोई वोट देने नहीं आया

यहां ये उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती सेना की कार्रवाई की निंदा कर चुकी हैं और इस बारे में उन्होंने आर्मी चीफ़ से भी बातचीत की है. उनके कड़े प्रतिरोध के बाद ही सेना ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं.

पीडीपी के लिए बढ़ता संकट

ये सारे बयान उस वक्त आ रहे हैं जब कश्मीर की घाटी में तनाव पसरा हुआ है. नौ अप्रैल को श्रीनगर लोकसभा सीट के उपचुनाव में कश्मीरी युवकों की मौत के बाद इलाके में अशांति है. इसके बाद घाटी में काफ़ी विरोध प्रदर्शन देखने को मिला है.

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इसके बाद दक्षिण कश्मीर के पुलवामा के डिग्री कॉलेज में पुलिस के छापे के बाद छात्रों का विरोध भी बढ़ा जिसके बाद प्रशासन ने घाटी के यूनिवर्सिटी, कॉलेज और हायर सेकेंडरी स्कूलों को बंद कर दिया है.

ऐसी स्थिति में, पीडीपी के लिए स्थिति और गंभीर होती जा रही है, पार्टी के परंपरागत वोटर कश्मीर घाटी में ही हैं. श्रीनगर में हुए उपचुनाव (मतदान भले 7 फ़ीसद हुआ हो) से साफ़ है कि पीडीपी की लोकप्रियता कम हो रही है.

क्या मालूम है और क्या नहीं

ऐसे में महबूबा मुफ्ती के सामने अपनी जमीन बचाने की चुनौती है. 2016 के दौरान घाटी में 90 मौतों के बोझ तले महबूबा को अपनी साख बचाने के लिए भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन तोड़ने का फ़ैसला ले लेना चाहिए. लेकिन बड़ा सवाल यही क्या वो ऐसा करेंगी?

क्या करेंगी महबूबा मुफ़्ती?

दरअसल महबूबा और उनकी पार्टी मौजूदा समय में चुनाव का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं. ऐसे में महबूबा बीजेपी के साथ अपनी गठबंधन सरकार को जारी रखेंगी और उनकी कोशिश अगले साढ़े तीन सालों में कुछ काम करके घाटी के लोगों का दिल जीतने की होगी.

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हालांकि ऐसी भी ख़बरें आ रही हैं कि केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाने पर विचार कर रही है. ऐसा हुआ तो पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के पास अपनी साख बचाने का मौका भी नहीं बचेगा.

अगर महबूबा मुफ़्ती को ये लगा कि दिल्ली की केंद्र सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने जा रही है तो वह बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ सकती हैं. इसका संकेत जम्मू कश्मीर के शिक्षा मंत्री और पीडीपी के वरिष्ठ नेता सैयद अल्ताफ़ बुख़ारी के बयान से मिलता है.

'मानव ढाल' वाले वीडियो पर कश्मीरी मीडिया में ग़ुस्सा

बुख़ारी ने राम माधव के बयान पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है, "राम माधव किसके ख़िलाफ़ युद्ध की बात कर रहे हैं, ये कोई नहीं समझ पा रहा. क्या वे उन कश्मीरियों के ख़िलाफ़ युद्ध की बात कर रहे हैं जो तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद लोकतंत्र में भरोसा रखते हुए वोट डालने जाते हैं? या फिर वे युद्ध की घोषणा इसलिए कर रहे हैं ताकि ऐसा करना देश के ख़ास राजनीतिक पार्टी के चुनावी हित को पूरा करने वाला है."

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बुख़ारी ने गंगा को बौद्धिक रूप से दीवालिया बताते हुए कहा कि गोलियों से दुनिय में केवल विनाश आता है और इससे इलाके की शांति ख़त्म होगी. बुख़ारी आगे कहते हैं, "गोलियों से आप विचारों की जंग नहीं जीत सकते. पीडीपी का मानना है कि केवल बातचीत से रास्ता निकल सकता है. कश्मीरी लोगों का विश्वास जीतने के उलट बीजेपी के कुछ लोग वाजपेयी के कार्यकाल में शुरू हुई शांति प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं."

बुख़ारी के बयान से संकेत मिलता है कि पीडीपी ख़ुद को इस बात के लिए तैयार कर रही है कि राष्ट्रपति शासन लगाने की स्थिति में वह गठबंधन के एजेंडे को पूरा नहीं कर पाने का आरोप बीजेपी पर लगाकर गठबंधन को तोड़ सके.

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