क्या हैं अयोध्या पर मोदी सरकार के रुख़ के मायने?

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सुप्रीम कोर्ट ने 19 अप्रैल को दिए फ़ैसले में कहा है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की आपराधिक साज़िश रचने के आरोप में राममंदिर आंदोलन के नेताओं पर अब रायबरेली में अलग से मुक़दमा नहीं चलाया जाएगा.

रायबरेली में यह मुक़दमा 15 साल से अधिक समय तक चला था. वहीं बाबरी मस्जिद के विध्वंस की साज़िश के आरोप में कारसेवकों पर एक मुक़दमा लखनऊ में चला था.

नेताओं के ख़िलाफ़ मामला यह था कि उन्होंने 6 दिसंबर 1992 को भड़काऊ भाषण दिए थे. उन्होंने मस्जिद के पास एक अस्थायी मंच से इकट्ठा हुई ग़ैरकानूनी भीड़ के सामने उत्तेजक नारे लगाए थे.

अदालत का फ़ैसला

जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने अपने फैसले में लिखा है कि विध्वंस के लिए उकसाने वालों को उन लोगों से 'कृत्रिम रूप से विभाजित' किया गया था जिन्होंने वास्तव में मस्जिद को तोड़ा था.

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इस कृत्रिम विभाजन में नेताओं (आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और अयोध्या आंदोलन के अन्य प्रचारकों) की भूमिका को ग़ैरकानूनी तरीके से इकट्ठा होने तक सीमित रखा गया था जबकि केवल कारसेवकों पर विध्वंस की साज़िश रचने का अभियोग लगाया गया था.

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इस भेद को खत्म करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने 2010 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि यह 'स्पष्ट रूप से गलत' था. 2010 के हाईकोर्ट के फैसले में 2001 के लखनऊ ट्रायल कोर्ट की उस मूल गलती को बरकरार रखा गया था जिसमें विध्वंस की साजिश रचने के आरोपों से सभी नेताओं को मुक्त कर दिया गया था.

2001 के ये फैसले तकनीकी गलतियों के कारण आए थे. सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए रायबरेली की अदालती कार्यवाही को लखनऊ अदालत में स्थानांतरित कर दिया, जिसमें नेताओं के ख़िलाफ साजिश के आरोप तय करने के निर्देश दिए गए हैं.

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ कोर्ट को निर्देश दिया कि इस मामले की संयुक्त सुनवाई रोज़ाना की जाए और दो साल के भीतर इसे पूरा किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला आडवाणी के लिए बुरे समय में आया है, ख़ासकर तब जब अटकलें लगाई जा रही हैं कि आगामी राष्ट्रपति चुनाव में आडवाणी उम्मीदवार हो सकते हैं. आखिरकार, उनके ख़िलाफ़ उस साजिश को रचने के लिए मुकदमा चलाया जाएगा जिसे भारत की धर्मनिरपेक्षता के प्रति वचनबद्धता के लिए सबसे बड़ा झटका माना जाता है.

इसी तरह, मोदी को उमा भारती को अपने मंत्रिमंडल में बरकरार रखने में मुश्किलें आ सकती हैं.

हिंदुत्ववादी ताक़तें

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खैर आरोपों के घेरे में खड़े नेताओं के लिए इस फ़ैसले के तात्कालिक नतीजे जो भी हों, 19 अप्रैल के इस फ़ैसले में मोदी सरकार की भूमिका को लेकर हिंदुत्ववादी ताकतों की भौहें तन गई हैं.

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राजनीतिक रूप से दूसरे संवेदनशील मामलों के उलट ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने सीबीआई को अयोध्या मामले को पहले की तरह जारी रखने की इजाज़त दी. नतीजा ये हुआ कि जब इस साल की शुरुआत में ये मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए आया तो सीबीआई अयोध्या मामले में हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ 2011 की अपनी याचिका पर डटी रही.

ये कोई सामान्य बात नहीं थी, जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नीरज कौल ने सीबीआई की तरफ़ से पैरवी करते हुए हाईकोर्ट के फ़ैसले की आलोचना की जिसमें नेताओं के ख़िलाफ साजिश रचने के आरोप हटा दिए गए थे. इस तरह भाजपा के लिए इस अति महत्वपूर्ण मुद्दे पर सीबीआई ने अपने उस रुख को कायम रखा जो उसने यूपीए के शासन के दौरान अपनाया था.

अवमानना का मामला

अयोध्या पर अदालतों के मिले-जुले रिकॉर्ड को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी जिस तरह से सीबीआई के रुख का समर्थन किया वो भी उल्लेखनीय है.

बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद कल्याण सिंह के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी करने पर कार्रवाई का ही मामला देख लें.

ये विध्वंस न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाली पीठ के 'प्रतीकात्मक कार सेवा' की इजाज़त देने का उल्लंघन था.

हालाँकि ये घटना रविवार को हुई थी, वेंकटचलैया ने उसी शाम अपने घर पर बेंच की विशेष सुनवाई की थी.

ये जानने के बावजूद भी कि विध्वंस सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला था, न तो जस्टिस वेंकटचलैया और न ही किसी अन्य जज ने कल्याण सिंह के ख़िलाफ कोई कार्रवाई की.

अक्टूबर 1994 में भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के आखिरी दिन, वेंकटचलैया ने कल्याण सिंह को प्रतीकात्मक रूप से एक दिन के कारावास की सज़ा दी. लेकिन ये सज़ा उन्हें विध्वंस से चार महीने पहले के एक मामले में अवमानना को लेकर दी गई थी.

तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के प्रतीकात्मक कार सेवा के दौरान मस्जिद की रक्षा करने का हलफ़नामा देने के बावजूद विध्वंस होने पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, "हालाँकि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और उसके अधिकारियों के ख़िलाफ 6-12-1992 के संबंध में स्वत: संज्ञान के जरिए अवमानना के मामले शुरू हुए हैं, वे लंबित हैं और स्वतंत्र रूप से निपटाए जाएंगे."

लेकिन अवमानना की ये कार्यवाइयां कभी नहीं निपटीं, न तो स्वतंत्र रूप से और न किसी दूसरी तरह. लेकिन इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई के आरोप पत्र में नामित किसी भी नेता के ख़िलाफ कार्रवाई में कोई नरमी नहीं दिखाई.

कल्याण सिंह को मिली छूट

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कल्याण सिंह के मामले में ये कहा गया कि राज्यपाल होने के नाते उन्हें अभियोजन से सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन जैसे ही वे राज्यपाल पद से हटें, उनके ख़िलाफ़ भी आरोप तय किए जाएं.

अगर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिखाई गई न्याय की उम्मीदें खत्म नहीं हुई तो अयोध्या मामले को कल्पनातीत मोड़ लेना होगा.

अगर विध्वंस पर अदालत का अंतिम फ़ैसला आता है तो क्या ये पार्टी के समयानुकूल होगा जो कि इसमें बुरी तरह फंसी हुई है. वास्तव में क्या मोदी इस मामले में सफल होंगे, जहां नेहरू भी विफल रहे थे?

1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियों की गुप्त स्थापना के लिए जो एफ़आईआर दर्ज की गई थी, उस पर तो मुकदमा तक शुरू नहीं हो सका था.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. मनोज मित्ता फिक्शन ऑफ फैक्ट-फाइंडिंग: मोदी और गोधरा के सह-लेखक हैं)

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