नज़रिया: आईएएस अफ़सर बीते 70 साल से प्रशासन तंत्र की रीढ़ क्यों?

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( 21 अप्रैल को मनाए सिविल सर्विसेज़ डे के मौके पर वरिष्ठ नौकरशाह टीएसआर सुब्रमण्यम बता रहे हैं कि भारत के 70 साल के सफ़र में प्रशासनिक अधिकारियों का योगदान कितना अहम रहा है.)

ब्रिटिश हुकूमत ने भारत जैसे विशाल देश पर अपने उदार और सख्त आईसीएस यानी भारतीय लोक सेवकों के बलबूते सदियों तक राज किया. फिलिप मैसन ने वूडरफ नामक उपनाम से एक किताब लिखी है जिसका नाम द मैन हू रूल्ड इंडिया है.

भारत की आजादी के एक साल बाद साल 1948 में गठित होने वाली भारतीय प्रशासनिक सेवा इसी सेवा की उत्तराधिकारी है. इतिहास इस बात का साक्षी होगा कि आईएएस सर्विसेज को भारत का स्टील फ्रेम कहकर सही उपनाम दिया गया.

इस सेवा के अफसरों ने आजादी को बरकरार रखते हुए बहुभाषी, बहुजातीय और जातपात से प्रभावित देश के सबसे कमज़ोर वक़्त में एक अहम रोल निभाया.

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70 साल से नीतिगत सलाहकार

साल 1947 में भारत और इसके क्षेत्र के नियंत्रण का अधिकार लंदन में बैठी सरकार से दिल्ली में बैठी सरकार को ट्रांसफर हो गया.

इसके बाद बीते कई दशकों से स्थानीय नेताओं की शक्ति में इज़ाफे के साथ सांसद और विधायक प्रमुख हो गए हैं. और भारत में सत्ता के केंद्र बन गया.

बीते 70 साल से जारी विकास की प्रक्रिया में आईएएस अधिकारी नीतिगत सलाहकार से लेकर ज़मीन पर फ़ैसलों के अमलीकरण की भूमिका को निभा रहे हैं.

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इसीलिए ज़िला स्तर पर आज भी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (कलेक्टर) राज्य सरकार का मुख्य नुमाइंदा होता है. डीएम ज़िले के सभी विभागों में समन्वयक और राज्य सरकार की परियोजनाओं की देखरेख की ज़िम्मेदारी संभालता है.

इसी वजह से नई उम्र में सर्विस ज्वॉइन करने वाले आईएएस अधिकारियों को ब्रिटिश सरकार के आईसीएस अधिकारियों जैसा सम्मान प्राप्त है.

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राजनेता और आईएएस,एक सिक्के के दो पहलू

राज्यों के सत्ता केंद्रों में सभी विभागों के सचिव इसी सर्विस से आते हैं. इसी तरह सभी मंत्रालयों और भारत सरकार के विभाग भी इन्हीं अधिकारियों द्वारा चलाए जाते हैं जो सीधे राजनीतिक रूप से चयनित मंत्री के साथ काम करते हैं.

सचिवालय के अलावा आईएएस अधिकारी केंद्र से लेकर राज्यों के स्तर पर तमाम संगठनों का नेतृत्व करते हैं. ऐसे में चयनित राजनेता और आईएएस अधिकारी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

हालांकि, सचिवालयों में पद के हिसाब से चयनित मंत्री नीति निर्माता हैं और प्रशासक इन नीतियों को अमल में लाता है. लेकिन अगर हक़ीक़त देखें तो वरिष्ठ प्रशासक ही अक्सर नीतियों का निर्माण करते हैं जिन्हें राजनेताओं के समर्थन के बाद औपचारिक वैधानिक मिलती है.

आईएएस और भ्रष्टाचार

एक रेवेन्यू सेक्रेटरी से जब पूछा गया कि उसके मंत्री से कैसे संबंध हैं तो उसने कहा कि मंत्री जी अहम मलाईदार पोस्टिंग और तहसीलदारों की पोस्टिंग देखते हैं और मैं नीतियों से जुड़ा काम देखता हूं.

उत्तर प्रदेश के आईएएस कैडर से जुड़ा ये मामला 90 के दौर में इस सेवा की दिशा और दशा के बारे में बताएगा. उत्तर प्रदेश के आईएएस अधिकारियों की वार्षिक बैठक में 400 के करीब अधिकारियों को गुप्त रूप से प्रदेश के सबसे भ्रष्ट अधिकारी का नाम बताने को कहा गया.

क्या दुनिया में किसी भी पेशेवर समूह में अपने बीच सबसे ज्यादा भ्रष्ट व्यक्ति की पहचान की जाएगी? ये उनके ख़ुद पर यक़ीन रखने का संकेत देता है.

इसमें चार लोगों का नाम सामने आया था जिनमें से तीन लोग राज्य के प्रमुख सचिव बने. चौथे व्यक्ति की असमय मौत हो गई. इन तीनों व्यक्तियों को वरिष्ठता के क्रम में पीछे रहने के बावजूद गद्दी दी गई.

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ये बात बताती है कि राजनेता इस समय तक प्रभावी हो चुका था, मुख्यमंत्री को एक ईमानदार चीफ सेक्रेटरी की जगह हां में हां मिलाने वाला अधिकारी चाहिए था.

दूसरे शब्दों में कहें तो 90 के दशक से इस सर्विस का राजनीतिकरण शुरू गया और तबसे ये अब तक बहुत तेज़ी से बढ़ा है.

हालांकि आज़ादी के पहले दशक में ही कुछ भ्रष्ट अधिकारियों को किसी भी कैडर में पहचाना जा सकता था, ये ख़तरा इस शताब्दी की शुरुआत में तेज़ी से बढ़ा है.

अफ़सोस कि सेवा की शुचिता को जिस रुप में होनी चाहिए वैसी अब नहीं रही है. जबकि आईएएस अधिकारियों का एक छोटा हिस्सा ही अब भी आर्थिक तौर पर भ्रष्ट देखा जा सकता है, लेकिन ये सच्चाई है कि आईएएस की एक बड़ी संख्या बौद्धिक तौर पर भ्रष्ट है.

ये वो तबका है जो अपनी स्वतंत्र और नि:स्वार्थ सलाह नहीं देते जिसकी उनसे उम्मीद की जाती है और जानबूझकर मंत्रियों की इच्छा के मुताबिक काम करते हैं, यहां तक कि कुछ मामलों में तो राजनेताओं की व्यक्तिगत ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सह-षड्यंत्रकारी बनकर सहयोग करते हैं.

प्रशासनिकतंत्र की रीढ़

निश्चित तौर पर सर्विस की अखंडता पर कुछ हद तक समझौता हुआ है. आईएएस अब भी राज्य और केंद्र की प्रशासनिक तंत्र की रीढ़ है.

कई और फ़ायदेमंद रोज़गार के अवसरों के बावजूद भी कम से कम वर्तमान की वार्षिक भर्तियां अतीत के मुक़ाबले बराबर या बेहतर गुणवत्ता की होंगीं.

इसकी कठोर योग्यता-आधारित चयन प्रणाली के साथ, देश के सबसे प्रतिभाशाली लोग समाज में विशेष योगदान के लिए इस सेवा को चुनते हैं.

ऐसे युग में जहां विशेषज्ञ बनाम सामान्य की बहस समय-समय पर हो जाती है, वहां आईएएस ने अपने अतिविशेष क्षेत्र प्रशिक्षण के अवसरों, किसी भी प्रशासनिक समस्या को संभालने, व्यापक अनुभव और इन सबसे ऊपर प्रशासनिक क्षेत्र में अपनी दक्षता साबित की है.

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