नज़रिया: महीने भर में क्या साबित कर पाए हैं योगी

  • 23 अप्रैल 2017
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( बीते 19 अप्रैल को योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर अपना एक महीना पूरा किया है. उनके एक महीने के कामकाज के आकलन पर आप बीबीसी हिंदी पर अंबिकानंद सहाय का आकलन पहले पढ़ चुके हैं. आज पढ़िए शरत प्रधान का आकलन.)

उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ को सीएम पद संभाले एक महीने से थोड़ा ज़्यादा वक्त हो चुका है और यह सवाल लोगों के ज़ेहन में लगातार आ रहा है कि क्या योगी को सीएम बनाना महज़ हथकंडा साबित होगा या फिर योगी वास्तव में अपने काम में सफल साबित होंगे?

आम धारणा तो यह है कि उनका पहला महीना कई असामान्य घटनाओं से भरा हुआ रहा जिसने लोगों को आश्चर्यजनक रूप से हैरान किया.

कई वर्षों तक प्रचंड सांप्रदायिक राजनीति करने के बाद और ख़ुद एक कट्टर हिंदुत्ववादी आंदोलन को शक्ल देने के बाद जब सीएम आदित्यनाथ योगी ने नया अवतार लिया,तो उनका नारा था, "किसी से भेदभाव नहीं और किसी का मनुहार नहीं."

कैसा रहा यूपी में योगी सरकार का एक महीना?

क्या यूपी का मुसलमान निशाने पर है?

लेकिन उनके इस नारे पर लोग काफी देख-परख कर ही भरोसा करेंगे. क्योंकि सवाल ये है कि क्या ये नारा महज़ एक राजनीतिक मजबूरी में दिया गया है- क्या एक कट्टर मुस्लिम विरोधी चेहरा रहे योगी आदित्यनाथ केवल गद्दी पर बैठने के कारण ऐसा कह रहे हैं?

क्योंकि ये सच है कि कई बार सत्ता की शक्ति, विचारधारा से अधिक शक्तिशाली हो जाती है.

क्या है योगी का उद्देश्य?

ऐसा लगता है कि उनका यह संदेश सूबे के मुसलमानों के प्रति निर्देशित था जो ज़ाहिर तौर पर अपनी तरफ योगी के रवैये को लेकर संदेहास्पद रहे हैं और समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या योगी का उद्देश्य वाकई यूपी में काम करना है?

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यह एक लखटकिया सवाल है जिसका जवाब बीतते वक्त के साथ मिलना है. उनके कुछ हालिया फ़ैसले बेशक संदेहास्पद हैं. जैसे जावीद अहमद का यूपी पुलिस चीफ़ के पद से तबादला करना, योगी की "कोई भेदभाव नहीं" की नीति को औंधे मुंह गिरा देती है.

इस मामले में तथ्य यह है कि शुक्रवार तक यूपी पुलिस चीफ़ के पद पर रहे जावीद अहमद को लेकर यह अटकलें लगाई जा रहीं थीं कि वे आगे भी इस पद पर बने रहेंगे.

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खासतौर पर इसीलिए क्योंकि जावीद अहमद की पहचान यूपी पुलिस में एक ईमानदार अफ़सर के तौर पर हो चुकी थी और समझा जा रहा था मुख्यमंत्री योगी उन्हें अपनी नई टीम में देखना चाहते हैं.

मुसलमान पर भरोसा?

इसके बावजूद योगी ने अपनी टीम के लिए एक नए नाम पर मोहर लगाई. क्या जावीद को मुसलमान होने की वजह से हटाया गया? इसके जबाव में सीएम के करीबी यह तर्क दे रहे हैं कि सुलखान सिंह भी काफी ईमानदार अफ़सर हैं और जावीद से चार साल सीनियर भी.

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हालिया फेरबदल में कई ऐसे अफ़सरों के नाम भी हैं जिन्हें अखिलेश यादव का क़रीबी माना जाता था. यानी कि मेरिट को इन तबादलों का आधार नहीं बनाया गया. कई युवा आईएएस अफ़सर जिनकी बीते वक्त में बढ़िया काम करने के लिए पहचान बनी थी, उन्हें भी उनकी जगहों से हटाया गया. और इसका आधार यह भी रखा गया कि उनके नाम में 'यादव' लगा था.

जबकि संदेहपूर्ण काम के लिए ख़बरों में रहे कुछ अधिकारियों को उनके पदों से नहीं हटाया गया है. वे अधिकारी पावर, पीडब्ल्यूडी, सिंचाई और हाउसिंग जैसे भ्रष्टाचार के अड्डे कहे जाने वाले महकमों में बने हुए हैं.

किसकी ज़्यादा चली?

योगी के समर्थक भी इन आरोपो को गलत नहीं मानते है पर कहते हैं कि इसमें दिल्ली का निर्देश ज़्यादा दिखता है. कहा जा रहा है कि इन फ़ैसलों में बीजेपी प्रमुख अमित शाह, उनके करीबी समझे जाने वाले सुनील बंसल और मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्र जैसे अधिकारियों की बात ज़्यादा चली है.

'बूचड़खानों पर अभियान मुस्लिमों को कारोबार से तोड़ने की साज़िश'

यह कहा जा सकता है कि आदित्यनाथ योगी ने अवैध बूचड़खानों को बैन करके और एंटी रोमियो जैसी मुहिम के ज़रिए चर्चा बटोरी है और अपने समर्थकों की वाह वाही भी. लेकिन सच ये है कि जिन अधिकारियों की बदौलत ये गैर-लाइसेंसी बूचड़खाने चल रहे थे, उनपर योगी सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की.

वहीं योगी यह कहते ज़रूर रहे कि एंटी रोमियो दल किसी निर्दोष को तंग नहीं करे. लेकिन यह साफ़ देखा जा सकता था कि पुलिस या फिर योगी की सेना कही जाने वाली हिंदू युवा वाहिनी के सदस्यों ने बेकसूर लोगों का शोषण किया, उन मामलों में योगी ने कोई कार्रवाई नहीं की.

शायद योगी यह भूल गए कि सत्ता की ज़िम्मेदारी आते ही उन्हें हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं को भी ज़िम्मेदार होने का प्रशिक्षण देना था.

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सीएम दफ़्तर से जुड़े लोग बताते हैं कि योगी ने अपने अब तक के कार्यकाल में दफ़्तर को तय वक्त से ज़्यादा ही समय दिया है. आमतौर पर वो आधी रात तक काम करते हैं. लेकिन यह ज़रूर कहना होगा कि दफ़्तरों में नौकरशाही की सुस्ती पर, संस्थागत रूप में चलने वाली भ्रष्ट प्रथाओं पर और 'वर्क कल्चर' के बदलाव में फिलहाल योगी बेअसर साबित नज़र आते हैं.

जनता दरबार के ज़रिए आम आदमी की सीएम तक पहुंच बनाने का योगी का फ़ैसला सराहनीय रहा है. हालांकि, मायावती ने 'जनता दरबार' के पारंपरिक अभ्यास को बंद कर दिया था.

जनता दरबार बंद

अखिलेश ने इसे फिर शुरू करने की कोशिश की, लेकिन इसे जल्द ही बंद कर दिया गया. योगी सरकार में आगे क्या होगा? और क्या इस दरबार के ज़रिए लोगों की शिकायतों का निराकरण होता है? यह एक बड़ा सवाल है.

'निज़ाम बदला है, लोग नहीं बदले'

पीएम मोदी के आह्वान पर योगी और उनके मंत्रियों ने वीआईपी कल्चर के ख़िलाफ़ अपने नौकरशाहों से लाल व नीली बत्तियां हटाने को कह तो दिया है, लेकिन जिस 15-20 गाड़ियों के लंबे-चौड़े काफ़िले के साथ अखिलेश यादव चलते थे, योगी भी उसे वैसे ही इस्तेमाल कर रहे हैं.

हाल कमोबेश योगी के मंत्रियों का भी उनके जैसा ही है, जो देश के सबसे घनी आबादी वाले सूबे में अपनी चौधराहट को फिलहाल तो कम होते नहीं देखना चाह रहे.

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वैसे इस बात में कोई दो राय नहीं है कि कई बातें कहना, करने से ज़्यादा आसान होता है. वैसे ही हैं योगी के बड़े वादे और प्रचंड आश्वासन, जिन्हें ज़मीनी हक़ीकत पर लाना आसान नहीं है.

सच्चाई ये है कि अब तक उनके काम की रफ़्तार सुस्त है. अब देखना यह है कि क्या यह सुस्त रफ़्तार भी कम से कम बरकरार रहती है और 44 साल के एक साधु से सीएम बने योगी को आख़िरकार रेस में जीत दिलाती है या नहीं.

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