नज़रिया: गोरक्षा पर क्या थी महात्मा गांधी की राय

  • 23 अप्रैल 2017
सुब्रमण्यम स्वामी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गाँधी ने कहा था कि अगर हमारे पास सत्ता आएगी तो मैं गोरक्षा के लिए काम करते हुए गोहत्या पर प्रतिबंध लगा दूंगा.

महात्मा गांधी ने साफ़ कहा था कि उनके लिए गाय का कल्याण अपनी आज़ादी से भी प्रिय है.

देश में गोरक्षा की परंपरा हज़ारों साल से चली आ रही है और जब बहादुर शाह ज़फर को 1857 में दोबारा दिल्ली की गद्दी पर बैठाया गया तो उनका पहला कदम था गोहत्या पर प्रतिबंध.

जब भारत का संविधान बना तो राज्य के नीति-निर्देशक तत्व बने, जिनमें कहा गया है कि सरकार को गोरक्षा करने और गोहत्या रोकने की तरफ़ क़दम उठाने चाहिए.

हम पर ये आरोप लगता है कि हमने हिंदुत्व के नाम पर इसे मुद्दा बनाया है जो सरासर गलत है, क्योंकि ये एक प्राचीन भारतीय परंपरा रही है.

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सुप्रीम कोर्ट

प्राचीन काल में सिर्फ़ गाय के लिए ही नहीं बल्कि मोर की रक्षा की भी परंपरा रही है और भारत में मोर की हत्या पर 1951 में प्रतिबंध लगने के अलावा उसे राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया.

मोर की हत्या करने पर सात साल के कारावास की सज़ा का भी प्रावधान है.

भारत में गोरक्षा को सिर्फ धार्मिक दृष्टि से देखना भी गलत है और इसके दूसरे फ़ायदे नज़रअंदाज़ नहीं किए जाने चाहिए.

हमारे यहाँ 'बॉस इंडिकस' नामक गाय की नस्ल है और ये सर्वमान्य है कि उसके दूध में जो पोषक तत्व है, वो दूसरी नस्लों में नहीं है.

1958 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर गोहत्या पर प्रतिबंध लगाएं तो इससे इस्लामिक संप्रदाय को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए क्योंकि इस्लाम में गोमांस खाना अनिवार्य नहीं है.

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रहा सवाल अखलाक़ अहमद और पहलू ख़ान की कथित गोरक्षों द्वारा की गई हत्याओं का, तो मैं बता दूँ, जो भी क़ानून अपने हाथ में लेता है वो अपराधी है जिसके ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी ही चाहिए.

दूसरी बात, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा है कि कथित गोरक्षों द्वारा अगर कोई भी हिंसक घटना होती है तो पूरे आंदोलन की बदनामी होगी.

लेकिन आरएसएस प्रमुख और मेरी भी मांग यही है कि भारत में गोहत्या पर प्रतिबंध लगना चाहिए.

मेरी अपनी मांग है कि गोहत्या करने वालों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए और संसद में मेरे प्राइवेट मेंबर्स बिल प्रस्तुत करने के बाद कई राज्यों ने इसकी सजा को आजीवन कारावास कर दिया है.

मेरे बिल में इस बात के भी सुझाव हैं कि जब गाय दूध देना बंद कर दे तो कैसे उन्हें गोशालाओं में शिफ्ट किया जाए और इसके लिए एक नैशनल ऑथॉरिटी का गठन होना चाहिए.

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जामनगर से गुवाहाटी

रहा सवाल उन इतिहासकारों या विशेषज्ञों का जो अपनी रिसर्च के आधार पर दावा करते हैं कि प्राचीन काल और मध्य काल में भारत में गोमांस खाया जाता था, तो ये लोग आर्यन शब्द का प्रयोग करने वाले अंग्रेज़ों के पिट्ठू हैं.

ताज़ा जेनेटिक या डीएनए शोध के अनुसार कश्मीर से कन्याकुमारी और जामनगर से गुवाहाटी तक सारे हिन्दुस्तानियों का डीएनए एक ही है.

हिंदू-मुसलमान का डीएनए भी एक है इसलिए सभी मुसलमानों के पूर्वज हिंदू हैं.

इतिहासकारों ने आर्यन्स और द्रविडियन्स का जो बँटवारा किया मैं उसे नहीं मानता.

किसी भी ग्रन्थ में इस बात का उल्लेख नहीं मिलता जिससे गोमांस खाने के प्रमाण मिले या किसी तरह की अनुमति के प्रमाण मिलें.

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मूलभूत अधिकार

एक और सवाल उठता है कि हर नागरिक का एक मूलभूत अधिकार होता है अपनी पसंद का, यानी जो पसंद होगा वो खाने का और इसे कोई छीन नहीं सकता.

लेकिन भारत के संविधान में ऐसा नहीं और हर मूलभूत अधिकार पर एक न्यायपूर्ण अंकुश लग सकता है.

कल कोई कहेगा कि मैं अफ़ीम खाऊँगा या कोकीन लूँगा, तो ऐसा नहीं हो सकता.

रहा सवाल एकमत होने का तो भारत में लगभग 80% हिंदू हैं जिसमें से 99% गोहत्या के पक्ष में नहीं बोलेंगे तो अलग राय होने का सवाल ही नहीं.

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बात अगर माइनॉरिटी राइट्स या अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा की है तो फिर ये आपको दिखाना होगा कि गोमांस खाना उनके लिए अनिवार्य है.

जबकि सुप्रीम कोर्ट ये कह चुका है कि ये अनिवार्य नहीं.

और ये कहना कि सिर्फ मुसलमानों में कथित गोरक्षा मुहिम से संशय है तो ये बात गलत हैं.

कई हिंदू भी गोहत्या करके निर्यात करते थे क्योंकि सब्सिडीज़ मिलतीं थीं और कारोबार बढ़ता था बूचड़खाने खोलने से. उन्हें भी नुकसान होगा.

(बीबीसी हिंदी की गोरक्षा के मुद्दे पर ख़ास सिरीज़ की दूसरी कड़ी - बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)

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