इमली, महुआ पर टिकी जिंदगी में अब रेशमी बहारें

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झारखंड के नक्सल प्रभावित और आदिवासी इलाकों में महुआ, इमली, करंज, चिरौंजी जैसे वनोपज गुम होने लगे हैं. जबकि सालों से यही उत्पाद ग्रामीणों के लिए नकद पैसे हासिल करने का मजबूत जरिया रहा है.

लेकिन इन मुश्किलों के बीच नई तस्वीर उभरी है.

महुआ, इमली चुनने वाले बहुतेरे हाथ रेशम की खेती करने के साथ धागे कातने लगे हैं. लिहाज़ा उनकी बेहद आम सी ज़िंदगी में रेशमी बहारें आने लगी हैं.

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बंदगाव के आदिवासी बुजुर्ग धनु मुंडा बताते हैं कि कई दिनों तक लोग मेहनत-मशक्कत से जंगली उत्पादों को इकट्ठा कर उसे धूप में सुखाते हैं. तब बिक्री के लिए मीलों पैदल चलकर हाट पहुंचने के बाद साहूकारों के हुज्जत से जी घबरा जाता है.

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Image caption सीमा कच्छप

उनका कहना था कि दुर्लभ पेड़ों की कटाई, मौसम परिवर्तन, खान- खनिज की खुदाई- ढुलाई की वजह से वनोपज पर जबरदस्त असर पड़ा है. लिहाजा लोग रेशम की खेती की ओर तेजी से बढ़ने लगे हैं. हम इस ताने-बाने को जानने कई इलाके में गए.

सालों से हाट- बाजार में इमली -महुआ खरीदने का काम कर रहे उत्तम कुमार बताते हैं, '' बाप- दादा के ज़माने से यही काम कर रहे हैं, लेकिन अब दूसरा धंधा करना ही पड़ेगा. इस साल बचे- खुचे पेड़ों पर इमली आए ही नहीं. ग्रामीणों को पुचकार कर 32 रुपए किलो का दाम मिल रहा है, जबकि 34 रुपए किलो पर थोक कारोबारियों को देते हैं. किलों में दो रुपए की कमाई में तमाम खर्चे हैं. महुए का भी नशा उतरा सा है. ''

सरायकेला ज़िले के कुचाई प्रखंड के जिलिंदा गांव के महेश्वर उरांव बताते हैं कि साल में दो बार रेशम की खेती की जाती है, इसके तकनीकी गुर सीख लेने पर हाथों हाथ डेढ़ से दो लाख उठा सकते हैं.

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इसी कमाई से उन्होंने एक स्कूल वैन भी खरीद ली है, जो किराये पर चलती है.

महेश्वर के मुताबिक पचास - सौ रुपए कमाना उनके लिए कठिन था. तब लौह अयस्क की खदान में काम करने चले गए. हालांकि इससे दुश्वारियां बढ़ती गई. वहां से लौटने के बाद उन्होंने गांव के किसानों से संपर्क साधा और रेशम की खेती करने की ठानी. उन्हें इसका भी गुमान है कि कुचाई सिल्क ने दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई है. दरअसल कुचाई का पूरा इलाका उम्दा रेशम उत्पादन कर रहा है.

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Image caption महेश्वर

इंटर तक पढ़े महेश्वर, रेशम की खेती के साथ गांव की तरक्की के लिए भी संजीदा रहे हैं. इसी लोकप्रियता से उन्होंने मुखिया का चुनाव जीता. अब उन्हें सरकारी कार्यक्रमों के तहत रेशम दूत का दर्जा दिया गया है. उनकी टीम में पचीस लोग शामिल हैं.

अच्छी उपज

रेशम निदेशालय के प्रोजेक्ट सह रिसर्च अधिकारी अनिल कुमार बताते हैं कि तर्जुबा व तकनीकी जानकारी हासिल कर महेश्वर जैसे सैकड़ों किसानों के मेहनत से तसर सिल्क के उत्पादन में झारखंड देश में अव्वल हुआ है. साल 2015- 16 में यहां 2281 मिट्रीक टन उत्पादन का रिकॉर्ड है. उनका कहना था कि नक्सली इलाके में लोग लोग मुख्य धारा से जुड़ रहे हैं और पलायन भी ठहरा है.

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सिल्क के चार किस्मों में तसर दूसरे नंबर पर है. साल, अर्जुन और आसन के पेड़ों पर टसर के कीड़े छोड़े जाते हैं, जो एक निर्धारित समय में ककून की शक्ल धारण करते हैं. तब ककून की प्रोसेसिंग कर धागे निकाले जाते हैं. झारखंड के जंगलों में ये पेड़ उपलब्ध हैं

रेशमी चमक की महत्वपूर्ण कड़ियां बड़ी तादाद में गंवई महिलाएं भी हैं, जो महज चौथी- पांचवी तक पढ़ी होती हैं या बिल्कुल अशिक्षित. पर रीलिंग मशीनों पर धागे कातने में लट्टू की तरह उनकी उंगिलयां नाचती हैं.

सुमन कुजूर एक साथ दो रीलिंग मशीने चलाती हैं.

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Image caption सुमन कुजूर

उनका कहना है कि पति दो वक्त की रोटी बमुश्किल जुटा पाते थे. फिर रेशम के धागे कातने का उन्होंने प्रशिक्षण लिया और देखते ही देखते उनकी जिंदगी बदल गई. वो महीने में दस हजार रुपए तक कमाती हैं .

उन्हें अपना नाम- पता लिखना आता है, लेकिन खुशी है कि बच्चों को वो निजी स्कूलों में पढ़ा रही हैं. घर के लिए टीवी, फ्रिज, कुर्सियां भी खरीदी है. सीमा कच्छप से हमने पूछा कि कितनी कमाई होती है, तो उनके चेहरे पर मुस्कारहट छा गई. वो बताने लगी रेशम में रोजगार है, वरना जिंदगी तंगहाल थी.

लाखों परिवारों की ज़िंदगी बदलने का लक्ष्य

झारखंड सिल्क डेवलेपमेंट इंस्टीच्यूट में कार्यरत अधिकारी मोहसिना खातून ने गांवों में लंबे दिनों तक किसानों और महिलाओं के काम को देखा - परखा है और कई रिपोर्ट तैयार की है.

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Image caption मोहसिना खातून

वो अंडे के आकार का एक ककून दिखाते हुए कहती हैं, '' इसमें 1100 मीटर तक धागे होते हैं. आदिवासी परिवारों की आर्थिक तरक्की के साथ महिलाओं को रेशम के इसी लंबे डोर ने सशक्त बनाया है. राज्य में दो लाख परिवार इस काम से जुड़े हैं. अगले पांच साल में इसे पांच लाख लोगों तक ले जाने का लक्ष्य है. ककून बेचने के लिए हर साल दर तय होते हैं, ताकि ग्रामीण ठगे नहीं जाएं.''

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बेड़ो क्षेत्र के प्रोजेक्ट प्रबंधक ललन सिंह का कहना था कि ग्रामीणों को हर स्तर पर प्रशिक्षण दिया ही जाता है.

सरकार से संबद्ध संस्थान झारखंड सिल्क टेक्सटाइल्स एंड हैंडीक्राफ्ट ककून और धागे खरीदने का काम करती है. सिल्क के कपड़े भी यहां तैयार होने लगे हैं. जबकि तसर के उम्दा धागे की कीमत पांच हजार रुपए किलो तक हो सकती है.

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