झारखंड के बाद चंडीगढ़ में लीक हुआ आधार का डेटा

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भारत सरकार आधार नंबर को विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रही है.

जब आधार नंबर की परिकल्पना सामने आई थी तो कहा गया था कि इसे अनिवार्य नहीं बनाया जाएगा.

लेकिन मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार में आधार नंबर को कई सरकारी सेवाएं लेने और कई डिजिटल कामों के लिए अनिवार्य बनाने की कथित तौर पर कोशिश की जा रही है.

इसी को लेकर पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि आधार को अनिवार्य कैसे बनाया जा सकता है.

आधार नंबर को अनिवार्य बनाए जाने के विरोधियों की राय है कि इससे आधार कार्ड धारकों की जानकारी चुराए जाने और उसका ग़लत इस्तेमाल होने का ख़तरा बढ़ जाएगा.

हालांकि सरकार ऐसे आरोपों को निराधार बताती रही है. लेकिन पिछले दिनों सरकार की वेबसाइट से आधार नंबर के आंकड़े लीक होने की घटनाओं ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है.

ताज़ा मामला चंडीगढ़ ज़िला प्रशासन की वेबसाइट से आधार कार्ड से जुड़ा डेटा लीक होने का है. इससे पहले झारखंड सरकार की वेबसाइट से भी ऐसे आंकड़े लीक हो चुके हैं.

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चंडीगढ़ ज़िला प्रशासन की वेबसाइट पर राशन कार्ड की जानकारी के साथ यूआईडी यानी आधार नंबर भी दर्ज नज़र आ रही है.

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हालांकि, इस खबर के सार्वजनिक होने के बाद संबंधित वेब पेज को बंद कर दिया गया है.

क्या है सुप्रीम कोर्ट का रुख?

सुप्रीम कोर्ट आधार कार्ड के संबंध में इसे अनिवार्य बनाए जाने के पक्ष में नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, "आप आधार कार्ड को अनिवार्य कैसे कर सकते हैं जबकि हमने ये आदेश दिया है कि इसे वैकल्पिक बनाया जाए?"

अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि "ऐसे उदाहरण हैं जिसमें एक व्यक्ति के पास कई पैन कार्ड हैं और मुखौटा कंपनियों में फंड्स को ट्रांसफ़र करने के लिए उसका ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है."

इस पर बेंच ने एटार्नी जनरल से पूछा, "क्या पैन कार्ड के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य करना ही इसका इलाज है? इसे अनिवार्य क्यों किया गया?"

रोहतगी का कहना था, "पहले भी लोग मोबाइल फ़ोन के सिम कार्ड के लिए फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों का इस्तेमाल करते थे और सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस पर ध्यान देने की बात कही थी."

बीते दिनों हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि इसे सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है.

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