'एक मुसलमान गोरक्षक क्यों नहीं हो सकता'

  • 25 अप्रैल 2017
दिलदार हुसैन बेग़
Image caption दिल्ली के दिलदार हुसैन बेग़ नियमित रूप से जाते हैं गोशाला

चिलचिलाती धूप में हम दिल्ली के तुर्कमान गेट के सामने वाली सड़क पर एक अधेड़ मुस्लिम व्यक्ति के पीछे-पीछे चल रहे हैं.

दाईं ओर नज़र गई तो एक वीरान पड़ी कब्र दिखी. ये कब्र एक महिला की है. मध्यकाल में दिल्ली की एकमात्र महिला शासक रज़िया सुल्तान को यहाँ दफनाया गया था.

तीस कदम आगे, हम हनुमान वाटिका मंदिर में दाखिल होने के लिए जूते उतारने लगे.

मुस्लिम व्यक्ति पहले भीतर गए और उनके हाव भाव से लगा कि पुजारी और कई श्रद्धालुओं से वो खासे परिचित हैं.

कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतर कर अब हम एक गोशाला में पहुंच गए हैं जहाँ बीस-पच्चीस गायें मौजूद हैं.

हम जिनके पीछे चल रहे थे उनका नाम दिलदार हुसैन बेग़ है, वे आगे बढ़ कर एक गाय को पुचकारते हैं और चारा खिलाने में जुट जाते हैं.

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क्या है मकसद?

दिलदार कहते हैं, "ये मुझे उन दोनों से ज़्यादा पहचानती हैं क्योंकि सीढ़ी से उतर कर मैं पहले यहीं रुकता हूँ."

पुरानी दिल्ली के रहने वाले दो और मुस्लिम युवक बिलाल और अहमद अब आ पहुंचे हैं और मंदिर का प्रसाद लेने की प्रतीक्षा में हैं.

इधर दिलदार साहब के विज़िटिंग कार्ड पर 'मुस्लिम गोरक्षा दल' लिखा हुआ है. मेरा सवाल था, 'गोरक्षा से जुड़ने का असल मक़सद क्या है? राजनीतिक या कुछ और?"

दिलदार का जवाबा मिला, "मेरे समुदाय पर इल्ज़ाम है कि वो गोहत्या में शामिल है, तो मुझे आगे बढ़कर इस इल्ज़ाम को धोना भी पड़ेगा और अपने समुदाय के लोगों से बात भी करनी पड़ेगी."

मैंने पूछा, "क्या आप मुस्लिम समुदाय का लीडर बनना चाहते हैं, और ये स्टंट जैसा कुछ नहीं है क्या?"

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वो बोले, "अल्लाह का दिया हुआ सब कुछ है मेरे पास. हाँ, कुछ साल पहले जब मैंने गोरक्षा की बात कहनी शुरू की तो मेरा मज़ाक भी काफी उड़ा. रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने तंज़ किया कि हो क्या गया है तुम्हे?

उन्होंने कहा, ''मुझे फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि मेरे विचार से 50-55 मुसलमान साथ में जुड़े हैं और उम्मीद है कि ये तादाद बढ़ेगी."

दिलदार हुसैन अब बात करते हुए गोशाला के आखिरी हिस्से में पहुँच चुके हैं. बीच-बीच में घड़ी भी देखते हैं क्योंकि थोड़ी देर बाद घर जाकर बाइक उठाकर बच्चों को लेने स्कूल भी जाना है.

वो आगे बताते हैं, "दरअसल घर के पास इस हनुमान वाटिका मंदिर की गोशाला में पिछले 10-15 सालों से आता रहा हूँ. जब दो-तीन साल पहले गोहत्या प्रतिबंध का मामला उठने लगा तो मैंने भी अपने समुदाय के लोगों से कहना शुरू किया कि गाय का मांस खाना बंद कर दें और बफ़्फ़ (भैंस) वगैरह पर ही रहें क्योंकि इससे धार्मिक भावनाएं जुड़ी नहीं हैं."मैंने पूछा आप मांस खाते हैं या घर में बीवी बच्चे मांसाहारी नहीं हैं?

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निर्दलीय चुनाव लड़ चुके हैं

दिलदार हुसैन कहते हैं, "देखिए मैं पांच बार नमाज़ पढ़ने वाला मुसलमान हूँ और घर में सभी नमाज़ी हैं. खुद भी चिकन खाता हूँ और बच्चे भी खाते हैं. मैं मुसलमान होते हुए भी गोहत्या बंद करने की बात क्यों नहीं कर सकता?"

दिलदार हुसैन एक निर्दलीय उम्मीदवार रह कर 2014 का लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं. हारे भी, लेकिन इस बात पर 'फ़ख़्र' करते हैं कि पुरानी दिल्ली के रेहड़ी वालों ने बड़ा समर्थन दिया था.

मैंने पूछा, "क्या वे उन चंद मुसलमानों में नहीं हैं जिन्हें संघ कभी-कभी आगे कर देता है?"

दिलदार हुसैन बेग ने कहा, "मैं किसी भी पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं हूँ, होता तो मुझे वो पार्टी टिकट न देती? मुझे निर्दलीय चुनाव लड़ने की क्या पड़ी थी? मैं बस गोहत्या के खिलाफ हूँ क्योंकि भारत में ज़्यादातर लोग इस बात से आहत होते हैं, इसलिए पूरे देश के लिए एक केंद्रीय क़ानून बनना चाहिए, बस."

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अल्पसंख्यक समुदाय

शरबत के ठंडे गिलास के बीच मेरा अगला सवाल था, "क्या गोरक्षकों की हिंसा से अल्पसंख्यक समुदाय में थोड़ी आशंका नहीं बढ़ी हुई है? क्या उन्हें अपनी पसंद का खाने-पीने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए?"

थोड़ा ठहर कर, लेकिन गहरी सांस लेकर दिलदार ने कहा- "कुछ लोग गोरक्षा के नाम पर, दूसरों को धमका कर अपनी दुकानें चला रहे हैं और हिंसा का सहारा ले बैठते हैं."

उन्होंने कहा- " मैं तो उनसे यही कह सकता हूँ कि मिल जुलकर बात करने से मसले हल होते हैं, जबकि उनका तरीका गलत है. और अगर हिंदुओं को गोहत्या पर आपत्ति है तो कौन सी बड़ी बात है उसे मान लेना. गाय मत खाओ, बफ़्फ़ खाओ, चिकन खाओ."

तीन बजने को हैं और घर से फ़ोन आ चुका है कि बच्चों को स्कूल से लेना है. दिलदार ने कहा, "आप भोग ग्रहण कीजिए, मैं बीस मिनट में आता हूँ."

अब भी मुझे इस बात के जवाब की तलाश है कि दिलदार हुसैन जैसे चंद लोगों का मक़सद क्या वही है जो वो बता रहे हैं?

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