कब और कैसे रुकेंगे सुकमा जैसे नक्सली हमले?

  • 26 अप्रैल 2017

सोमवार को छत्तीसगढ़ के सुकमा में सीआरपीएफ पर हुआ हमला पिछले सात सालों में सब से बड़ा और घातक हमला बताया जा रहा है. घात लगाकर किया गया ये आक्रमण तीन घंटों तक जारी रहा.

अभी पिछले महीने इसी इलाक़े में एक और हमले में 11 अर्धसैनिक मारे गए थे. इस साल मार्च के अंत तक 80 अर्धसैनिक मारे जा चुके हैं.

सुकमा जैसे बड़े नक्सली हमले क्यों हो जाते हैं?

सीआरपीएफ़ यदि अहम तो मुखिया बगैर क्यों?

केंद्रीय सरकार के लिए ये हमले बड़े झटके हैं क्योंकि सरकार ने दावा करना शुरू कर दिया था कि माओवादी हिंसा की वारदातों में भारी कमी आई है. लेकिन अब इन हमलों के बाद सरकारी दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे हैं.

सरकार के दावे

छत्तीसगढ़ विधानसभा में विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव कहते हैं, " सरकार के दावे केवल दावे हैं. सच्चाई ये है कि स्थिति अब भी गंभीर है."

मंगलवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इलाक़े के दौरे के समय कहा कि सरकार रणनीति की समीक्षा करेगी. लेकिन सवाल ये पूछे जा रहे हैं कि माओवादियों को लेकर सरकार की कोई रणनीति है भी?

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अर्धसैनिक बल बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह के मुताबिक़, "मेरी जानकारी में राष्ट्रीय स्तर पर कोई रणनीति नहीं बनी है. कुछ महीने पहले राजनाथ सिंह ने ये बयान दिया था कि माओवादियों से निपटने के लिए एक मसौदा तैयार किया जा रहा है. मगर वो मसौदा अब तक सामने आया नहीं है."

गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर माओवादियों के लिए बनी रणनीति को स्पष्ट किया गया है. वेबसाइट के मुताबिक़ सरकार ने चार बातों का ध्यान दिया है, स्थानीय लोगों की सुरक्षा, इलाक़े का विकास, स्थानीय लोगों के अधिकार और सार्वजनिक धारणा को मैनेज करना.

रणनीति का अभाव तो नहीं

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक अजय साहनी के अनुसार हाल के दिनों में कई माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है. उनसे प्रभावित ज़िलों की संख्या कम हुई है. वो कहते हैं, "नक्सलियों के दबदबे वाले 223 ज़िले थे जो अब सिकुड़ कर 107 रह गए हैं."

लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता नंदिनी सुंदर कहती है कि सरकार की नीतियां ज़मीन पर नज़र नहीं आतीं. उनके अनुसार इन हमलों को बंद करने का एक ही तरीक़ा है और वो है बातचीत का रास्ता.

नंदिनी सुंदर ने कहा, "राजनीतिक इच्छा और राजनीतिक दृष्टिकोण दोनों की कमी है. एक ही रास्ता है और वो है शांति वार्ता."

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टी एस सिंहदेव उनसे सहमत हैं. उनके अनुसार बातचीत के बग़ैर दुनिया में कोई मसला हल नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि विपक्ष ने विधानसभा में कई सुझाव दिए हैं. लेकिन सरकार ने अब तक कोई पहल नहीं दिखाई है.

गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर एक साथ कई क़दम उठाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है. ऐसा लगता है कि सरकार के पास रणनीति है. ज़रूरत शायद इसको अच्छी तरह से लागू करने की है.

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