जब बेतिया में पहुंचे गांधी ही गांधी

  • 28 अप्रैल 2017
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ये गांधी के चम्पारण सत्याग्रह का सौंवा वर्ष है. प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय अभिलेखागार के प्रांगण में इस अवसर को याद करने से लेकर दिल्ली मेँ ही सहमत द्वारा आयोजित गोष्ठी में प्रोफेसर इरफान हबीब को सुनने उमड़ी भीड़ और लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओँ द्वारा इस अवसर को याद करना अच्छा लगा.

आयोजन और प्रकाशन अभी भी जारी हैं. लेकिन इस अवसर पर दस अप्रैल से, जिस दिन गांधी पहले पटना और फिर मुजफ्फरपुर गए थे, बिहार में रहने और वहाँ के आयोजनों और माहौल को देखना, अनुभव करना गांधी के इस पहले भारतीय प्रयोग की सनसनी को भी अनुभव करना था.

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जिस तरह से सरकारी, अर्द्ध सरकारी, विभिन्न गांधीवादी संस्थाओँ और आम लोगों की तरफ़ से आयोजन हो रहे हैं और गांधी के चम्पारण प्रवास की एक-एक तारीख की घटनाओं को फिर से जीवंत करने का प्रयास किया जा रहा है वो सिर्फ आयोजन करने और श्रेय लेने की होड से अलग चीज़ है.

वो होड़ भी है और इसमें नीतीश कुमार की बिहार सरकार और जनता दल-यू ने बाज़ी मार ली है. बिहार कांग्रेस भी आयोजन में साथी है.

और अब भाजपा के पक्ष में शुरू में पिछड़ने का भाव आने के बाद नए सिरे से आगे बढ़ने की होड़ लेने की तत्परता भी दिखती है. कई बार इस तरह से देखने के बाद यह होड़ अच्छी नहीं लगती.

मीडिया की होड़

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होड़ मची

पर इस माहौल को बनाने में जिस एक और होड़ ने सार्थक भूमिका निभाई है वह है मीडिया की होड़.

सचमुच बिहार के अखबारों और पत्रिकाओं में चम्पारण सत्याग्रह को याद करने, उससे जुडे आयोजनों के कवरेज और चम्पारण आन्दोलन से जुड़ी जानकारियों को फिर से सामने लाने की होड़ लगी हुई है.

10 से 22 अप्रैल, जिस दिन मोतिहारी की अदालती लड़ाई जीतकर गांधी बेतिया गए थे, तक तो राज्य से प्रकाशित होने वाले छह प्रमुख अखबारों-हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों के, मेँ होड़ सी लगी थी कि कौन कितने पन्ने चम्पारण सत्याग्रह और उसके आयोजन से जुड़ी खबरें छापता है.

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ज़ाहिर है कि जब स्थानीय समाज यही कर रहा है और यही पढ़ रहा है तब अख़बार भी उसी में होड़ लगाएंगे.

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पत्रिकाओं के चम्पारण सत्याग्रह विशेषांक ढूंढे नहीं मिलते.

नेट से कौन क्या देख और पा रहा है, यह हिसाब लगाना वैसे आसान है, पर इस लेखक जैसे लोगों के लिये मुश्किल.

पर जब प्रिंट की, टीवी की ऐसी मांग हो तो सोशल मीडिया और नेट की मांग भी होगी ही. रोज़ नई किताबों का विमोचन भी हो रहा है. और दसियों रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम होने की जानकारी इस लेखक को है.

बड़े पैमाने पर हो रही तैयारी

बिहार सरकार के आयोजनों में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी पहुंचे और स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान किया गया.

राज्य सरकार अपने सभी स्कूल के सभी विद्यार्थियों के लिए लाखों किताबें छापने और बांटने की तैयारी कर चुकी है. उसके मुखिया नीतीश कुमार इसे अपने विश्वास और राजनैतिक लड़ाई का हथियार बनाने में लगे हैं.

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पटना में दो दिवसीय राष्ट्रीय विमर्श में गांधी परिवार के चार सदस्यों की मौजूदगी के साथ देश भर के गांधीवादियों और गांधी के जानकारों की मौजूदगी ने उनका हौसला बढ़ाया होगा.

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Image caption मोतिहारी में नीतीश कुमार

पर जिस तरह से उनकी सरकार ने कई दिनों का सार्वजनिक अवकाश देकर अपने पूरे अमले को इस आयोजन से जुड़े कामों में जोड़ रखा है उससे ही यह सम्भव हुआ कि देश भर के जीवित स्वतंत्रता सेनानी या उनके आश्रित पटना में जुटें और जो नहीं आ पाए उनके लिए अधिकारी घर तक जाकर सम्मान वाले प्रतीक और शाल पहुंचा आएँ.

उन्होंने गांधी की यात्रा से जुड़े सभी प्रमुख स्थलों को जीवंत बनाने के लिये निर्माण कार्य तो कराए ही हैं सात किमी पैदल चलकर गांधी हेरिटेज यात्रा की शुरुआत भी की.

केंद्र सरकार और भाजपा भी जुटे

देखा देखी भाजपा और केन्द्र सरकार ने मोतिहारी में किसान मेला के नाम पर सात-सात कैबिनेट मंत्रियों का जमावड़ा करके जवाब देने की कोशिश की पर नीतीश का मुकाबला करना सम्भव नहीं हुआ.

पर इन आयोजनों, जलसों और विमर्शों से ज्यादा बड़ी चीज थी लोगों की भागीदारी और उत्साह, जिसके एक हिस्से की चर्चा मीडिया की होड़ वाले हिस्से में की गई है.

जब मुजफ्फरपुर लंगट सिन्ह कालेज के लडकों ने गांधी के शहर पहुंचने का दृश्य फिर से उपस्थित करने के लिये गांधी को गाड़ी से उतारने और बग्घी से प्रोफेसर मलकानी/कृपलानी के घर ले जाने का अभिनय किया उस दिन मुजफ्फरपुर स्टेशन पर बीस हजार से ज्यादा लोग जुटे.

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भीड़ को सम्भालने में पुलिस के पसीने छूट गए. शहर में गांधी चार दिन रहे थे. उन दृश्यों को भी फिर से उपस्थित किया गया और शहर का माहौल उत्सव सा बना रहा.

मजा यह आया कि राजकुमार शुक्ल बना छात्र वहां आकर शुक्ल जी की तरह दृश्य से गायब होने को तैयार न था. जब गांधी की बग्घी चलती थी वह कूदकर उस पर सवार हो जाता था.

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जुटे दिग्गज

जब 15 अप्रैल को गांधी मोतिहारी गए तो हर स्टेशन पर लोगों की भीड़ थी. और जब 22 अप्रैल को गांधी को बेतिया जाना था तो एक की जगह दो गांधी आ गए-एक भाजपा के आयोजकों के और दूसरे मूल सरकारी प्रोग्राम वाले. अब भितिहरवा और दूसरे जगहों पर जाने और आयोजन की होड़ लगने वाली है.

जाहिर है ऐसी होड़ सबको पसंद आएगी क्योंकि आयोजन के बहाने ही गांधी और उनके कामों को दोबारा याद करना और समाज को इस महात्मा तथा उनके पहले प्रयोग की बारीकियों और महत्व की याद कराना अपने आप में बहुत बडा काम है.

अगर गांधी, उनका काम, उनका तरीका, कथनी और करनी के बीच भेद न करने की उनकी ज़िद का अंश मात्र भी समाज को याद आ जाए तो यह बहुत बड़ा काम हो जाएगा.

और जब प्रणब मुखर्जी, नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे राजनेता, सच्चिदानन्द सिन्हा, राजमोहन गांधी, गोपाल गांधी, चन्द्रशेखर धर्माधिकारी, तारा गांधी, तुषार गांधी, मेधा पाटकर, कुमार प्रशांत जैसे लोग इस काम को होड लगाकर करना शुरु करें तो गांधी को समझना तो सबसे आसान है.

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अगर सौ साल पहले की घटनाओं को प्रोफेसर इरफान हबीब जैसे इतिहासकार और विद्वान नए सिरे से देखना शुरु करेँ तो उसमेँ से नई राह निकलेगी ही.

जब गांधी को दुनिया भर में अन्याय का अहिंसक प्रतिरोध करने वाले आन्दोलनकारी, वैकल्पिक और टिकाऊ विकास का मॉडल तलाशने वाले लोग तथा पश्चिमी विकास को एकांगी मानने वाले लोग एक सम्भावना से भरा विकल्प मान सकते हैं तो हमें इस काम के लिये इतना इंतजार नहीं करना चाहिए था.

पर शताब्दी के बहाने ही सही यह सही शुरुआत हुई है तो उसका स्वागत होना चाहिए.

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