पाश्चात्य शैली की धुनों के जादूगर: सी रामचन्द्र

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
बीबीसी हिंदी की ख़ास सिरीज़ संग संग गुनगुनाओगे में संगीतकार सी. रामचंद्र

हिन्दी फ़िल्म संगीत के मधुरतम दौर के संगीतकारों में सी. रामचन्द्र को सबसे महत्वपूर्ण संगीतकारों में गिना जाता है.

एक हद तक यह भी कहा जा सकता है कि पचास के दशक में जिन प्रमुख लोगों ने फ़िल्म की दुनिया में सुरीलेपन का दौर सृजित किया, उसमें सी. रामचन्द्र जैसे संगीतकार अलग से रेखांकित किये जाने योग्य हैं.

पचास और साठ के दशक में ढेरों कालजयी फ़िल्मों के संगीत को अपने प्रयोगों और नवाचारों से समृद्ध करने के चलते इनकी भूमिका आज भी प्रासंगिक बनी हुई है.

अवध की 'तवायफ़ी ग़ज़ल' मिज़ाज वाले नौशाद

रोशन : संगीत से बना मिठास का झरना

सी. रामचन्द्र के संगीत का अलग से आकर्षित करने वाला एक पहलू यह भी था कि वे पाश्चात्य धुनों को प्रामाणिक ढंग से भारतीय संगीत में बदल डालने की महारत रखते थे, जिसके कारण उनकी शैली ने अदभुत ढंग से उनके द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्मों को प्रामाणिक और नवोन्मेषी बनाया.

शाम ढले खिड़की तले...

'शहनाई', 'अलबेला', 'सगाई', 'शिन शिनाकी बूबला बू', 'घुंघरू' जैसी फिल्मों के माध्यम से इस संगीतकार की प्रतिभा पचास के शुरुआती दौर में पूरे दम-ख़म के साथ स्थापित हो चुकी थी.

आप याद करना चाहें, तो आसानी से 'आना मेरी जान सन्डे के सन्डे' (शहनाई), 'गोरे-गोरे ओ बांके छोरे' (समाधि), 'शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो', 'भोली सूरत दिल के खोटे' (अलबेला), 'तुम क्या जानो तुम्हारी याद में हम कितना रोए' (शिन शिनाकी बूबला बू), काली काली रतियाँ याद सताए' (घुंघरू), 'ईना मीना डीका' (आशा) जैसे गीतों को थोड़ी देर के लिए याद कर सकते हैं, जो आज भी संगीत प्रेमियों की ज़ुबान पर गाहे-ब-गाहे चढ़ जाते हैं, जब दूरदर्शन, रेडियो इन्हें कभी प्रसारित कर रहा होता है.

इमेज कॉपीरइट Wekipedia

सी. रामचंद्र अपने गीतों को एक ही राग पर आधारित करके कभी नहीं बनाते थे. उनके स्थायी और अंतरे के राग अकसर भिन्न-भिन्न होते थे. यह उनकी शैली की ख़ास बात थी.

शायद इसीलिए चित्रपट-संगीत में अधिकाधिक धुनें शास्त्रीयता पर आधारित होने के बावजूद, एक अलग ही श्रेणी 'सुगम-संगीत' के दायरे में खड़ी नज़र आती हैं. यह बताना भी ज़रूरी होगा कि इसी संगीतकार के यहाँ प्रचलित ठुमरियों का फिल्मी धुनों में बदलाव भी देखने को मिलता है, जिसमें उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां की कई ठुमरियाँ शामिल हैं.

हेमन्त कुमार: सदाबहार गीतों के शहंशाह

शंकर-जयकिशन: संगीत की गौरवशाली यात्रा

'देवता' का 'कैसे आऊं जमुना के तीर' और 'पहली झलक' का 'ना मारो नजरिया के बान' इसके सबसे सुंदर उदाहरण हैं. सी. रामचन्द्र की तन्तु वाद्यों पर पकड़ और इंटरल्यूड्स का रोचक इस्तेमाल उनकी धुनों को एक ऐसा नृत्यात्मक असर देता है, जो लोकप्रिय होने के साथ-साथ कहीं वक्रता और शास्त्रीयता के बीच भी अपना एक संतुलित रास्ता बनाता हुआ दिखाई पड़ता है.

जीवंत संगीत का असर

इस तरह, थोड़े शास्त्रीय और तकनीकी प्रयोगों के चलते उनकी धुनें आसानी से ज़ुबान पर चढ़ने वाली बन जाती हैं. एक जीवंत किस्म का संगीत, जिसमें रागों के मिश्रण के अलावा पश्चिम का असर तारी है.

इस जीवन्तता में अतिरिक्त प्राण डालने का काम भारतीय एवं पाश्चात्य वाद्यों के सहमेल से पैदा किये गए आर्केस्ट्रेशन का भी रहा है, जिसमें सितार, सरोद, शहनाई, तबला, सारंगी, नाल, ढोलक, मंजीरा, घुंघरू के साथ ही पियानो, मैंडोलियन, क्लैरोनेट, आर्गन, हवाईयन स्पैनिश गिटार एवं वॉयलिन का प्रयोग किया गया है.

शास्त्रीय और लोक संगीत की जुगलबंदी का चेहरा

एकबारगी यदि सी. रामचन्द्र द्वारा संगीतबद्ध बेहद प्रासंगिक फ़िल्मों की फेहरिस्त बनायी जाए, तो उनमें आराम से लगभग दर्जन भर फ़िल्मों के नाम शामिल किए जा सकते हैं.

इमेज कॉपीरइट Anarkali Film Poster

यह लिस्ट शहनाई (1947) से शुरू होकर बहूरानी (1963) पर जाकर समाप्त होती है, जिसके बीच में समाधि (1950), अलबेला (1951), परछाईं (1952), शिन शिनाकी बूबला बू (1952), अनारकली (1953), नास्तिक (1954), आज़ाद (1955), यास्मीन (1955), अमरदीप (1958), नवरंग (1959) एवं स्त्री (1961) जैसी सदाबहार फ़िल्में आएंगी.

यह ऐसी कुछ फ़िल्में हैं, जो उनके कॅरियर में विशेष स्थान रखती हैं. मधुर संगीत और भाव-गीतों की तरलता लिए हुए चितलकर रामचन्द्र का सिरजा हुआ फ़िल्म संगीत हमें अभूतपूर्व तरीके से आनन्दित करता है, जिसकी चमक आज उनकी संगीतबद्ध फ़िल्मों के निर्माण के लगभग आधी सदी बीत जाने के बाद भी जस की तस बरक़रार है.

(यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं.)

(फिल्मी दुनिया के महान संगीतकारों के बारे में बीबीसी हिंदी की 'संग संग गुनगुनाओगे' सिरीज़ की छठी कड़ी सी. रामचंद्र को समर्पित है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे