छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली हमले के बाद आस-पास के गाँव खाली

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24 अप्रैल की मुठभेड़ के बाद आस पास के गाँव वीरान हो गए हैं

झोपड़ियां तो हैं मगर इंसान नदारद. गाँव में दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा है. मकान बंद हैं.

कुत्तों के भौंकने की आवाजें ख़ामोशी को चीरती हुई दूर तक जा रही हैं. पास में बकरियों का एक झुण्ड है. मगर इन्हें चराने वाले नदारद हैं. आख़िर कहां गए सब लोग? गाँव की ये वीरानी इसे डरावना बना रही है.

250 घरों की आबादी वाले बुर्कापाल गाँव में पैदल चलने के बाद एक अकेली वृद्ध आदिवासी महिला नज़र आती हैं. मगर वो सुन नहीं सकती. वो जो बोल रही हैं मैं नहीं समझता.

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मेरे साथ गए एक स्थानीय पत्रकार ने बताया कि 'महिला कह रही थी कि गाँव के सारे लोग भाग गए हैं. वो कमज़ोर हैं इसलिए नहीं जा सकी.'

खौफ़ का माहौल

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गाँव में एक भी पुरुष नहीं है

कुछ दूर और पैदल चलते हुए गाँव के दूसरे छोर पर दो-तीन महिलाएं नज़र आती हैं जो मुझे देखकर छुपने की कोशिश कर रही हैं. वो बात करना नहीं चाहतीं. गाँव में कोई भी पुरुष नहीं है.

वो बताती हैं कि 24 अप्रैल की घटना के बाद सुरक्षा बल के जवानों ने उनके गाँव में छापेमारी की थी. फिर माओवादी भी आए थे. इन दोनों के डर से लोग अपना गाँव छोड़कर भाग गए हैं.

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बुर्कापाल से कुछ दूरी पर एक और गाँव है. ये चिंतागुफा और ताड़मेटला के बीच बसा हुआ है. यहाँ भी वीरानी है. मगर यहाँ मेरी मुलाक़ात दो आदिवासी युवतियों से हुई जो हिंदी बोल सकती थीं.

एक सुनीता और दूसरी मडकम मुक्के. मडकम मुक्के कहती हैं कि उन्हें तब ज़्यादा डर लगता है जब गोलियों की आवाजें आती हैं. हालांकि ये इनके लिए अब रोज़मर्रा की बात हो गयी है.

सुनीता का कहना है कि 24 अप्रैल को चिंतागुफा के इलाके में हुई मुठभेड़ के बाद उनके गाँव में सुरक्षा बल के जवान आए और घरों की तलाशी ली.

'सुरक्षा बलों ने धमकाया'

सुनीता कहती हैं, "गाँव आने के बाद जवानों ने गांववालों को धमकाया और कहा कि तुम लोग नक्सलियों से मिले हुए हो."

वो बताती हैं कि इस दौरान सुरक्षा बलों के जवानों ने गाँव वालों की पिटाई भी की.

सुनीता के अनुसार, "वो गाँव के चार लोगों को पकड़कर ले गए. पहले उन्हें गाँव में ही पीटा. फिर उनमें से एक को छोड़ा मगर बाक़ी के तीन लोगों का कोई अता-पता नहीं है."

मडकम मुक्के और सुनीता ने आरोप लगाया कि सुरक्षा बलों के जवानों ने गाँव की महिलाओं को भी पीटा. दरअसल सुरक्षा बलों से जिस दिन माओवादियों की मुठभेड़ हुई थी उस दिन माओवादी छापामारों ने गाँव की तरफ से भी हमला किया था.

महिलाएं बताती हैं कि सुरक्षा बल के जवान गाँव वालों को कह रहे थे कि उन्होंने ही माओवादियों को अपने घरों में पनाह दी थी.

डर में है ज़िंदगी

लेकिन गाँव की महिलाएं इन आरोपों का खंडन करती हैं. उनका कहना है कि सैकड़ों की संख्या में जब हथियारबंद माओवादी गाँव में घुसे तो वो लोग उनका विरोध भला कैसे कर सकते थे.

मगर सुरक्षा बल के जवान उनकी एक सुनने को तैयार नहीं हैं. वो मानते हैं कि बिना किसी गाँव वाले की मदद के माओवादी वहां शरण नहीं ले सकते थे.

सुरक्षा बलों के जवानों के बाद गाँव में माओवादी भी आ धमके और उन्होंने भी गाँव के लोगों को धमकाया. गाँव की महिलाएं कहतीं हैं कि माओवादियों ने उन्हें गाँव से चले जाने का फरमान जारी किया.

बुर्कापाल गाँव खाली हो चुका है क्योंकि यहाँ रहने वालों ने कहीं दूर जाकर शरण ले रखी है.

मगर गाँव में जो इक्का दुक्का बुज़ुर्ग और महिलाएं बचीं हैं वो खौफ़ में जी रही हैं. उन्हें एक बार फिर किसी अनहोनी का अंदेशा सता रहा है.

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