...क्योंकि कश्मीर पर भारत नहीं, पाकिस्तान के साथ है तुर्की

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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन एक मई से दो दिनों की भारत यात्रा पर हैं.

वो इस दौरान दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के साथ तुर्की के रिश्ते मज़बूत बनाने की कोशिश करेंगे, ख़ासकर तब जब इस वक्त ज़्यादातर पश्चिमी देशों के साथ उनके रिश्तों में मतभेद उभर आए हैं.

अपनी दो दिवसीय यात्रा के दौरान वो दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय भी जाएंगे, जहां उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से नवाज़ा जाएगा.

उनके दिल्ली पहुंचने से पहले से ही उनके कुछ प्रतिनीधि पहुंच चुके थे और कई आयोजनों में शिरकत कर उन्होंने भारत और तुर्की के बीच बेहतर संबंधों की वकालत की है.

उन सबों ने बताया है कि कैसे भारत और तुर्की 'दो महान लोकतांत्रिक' देश एक-दूसरे के लिए मददगार हो सकते हैं और उन्हें होना भी चाहिए.

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यह ऊपर से सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन दोनों देशों के बीच संबंधों को लेकर कई गंभीर मतभेद और समस्याएं भी हैं जो इस संबंध की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने वाले हो सकते हैं.

सबसे पहली अड़चन तो यह है कि एर्दोआन और उनकी टीम को मोदी को यह समझाना मुश्किल होगा कि भारत के साथ तुर्की के संबंध का पाकिस्तान के साथ उनके संबंध से कोई लेना-देना नहीं होगा.

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तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का परिवार ना सिर्फ़ व्यक्तिगत तौर पर क़रीब है बल्कि दोनों ही देशों की विचारधारा भी कमोबेश एक ही जैसी है.

कभी धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध रहने वाला देश तुर्की अब एक ऐसे देश में तब्दील हो चुका है जहां सत्ता की हर राजनीतिक पहलकदमी भ्रष्ट धार्मिक नेताओं के इशारे पर होती है.

ये हालात बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे आम धार्मिक देशों में होते हैं.

दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के बारे में बहुत साफ़ है कि वो हमेशा से एक धर्म की प्रभुता वाला देश ही रहा है.

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जहां तक भारत और तुर्की व तुर्की और पाकिस्तान के लोगों के बीच आपसी मेलजोल और संबंधों की बात है तो उसमें पाकिस्तान भारत की तुलना में कहीं आगे है.

कहने का आशय यह नहीं है कि तुर्की और पाकिस्तान के लोगों के बीच की दोस्ती भारत के लिए ठीक नहीं है बल्कि हक़ीक़त यह है कि भारत और तुर्की के लोग एक-दूसरे को ठीक से जानते नहीं है और ना ही उन्हें यह पता है कि वो एक-दूसरे के लिए अपने पूर्वाग्रहों को कैसे दूर करेंगे.

तुर्की में जहां पाकिस्तानियों को 'भाई' की नज़र से देखा जाता है, तो वहीं आम तौर पर भारतीयों की छवि 'गौ पूजक' की बनी हुई है.

उपरोक्त सभी कारणों की वजह से तुर्की के साथ संबंधों के मामले में पाकिस्तान की स्थिति भारत से बेहतर है.

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ऐसे हालात में तुर्की का भारत के साथ संबंध पाकिस्तान के साथ उसके संबंध से अछूता नहीं रह पाएगा.

और यह उम्मीद करना कि जिन मसलों पर भारत और पाकिस्तान के बीच असहमति है उस पर तुर्की पाकिस्तान के साथ नहीं होगा बेकार है.

कश्मीर के मुद्दे पर और भारत के परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल होने के सवाल पर तुर्की मज़बूती के साथ पाकिस्तान के साथ खड़ा है.

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत कावुसोगलु ने कहा था कि उनकी सरकार जम्मू-कश्मीर के मसले पर पूरी तरह से पाकिस्तान के साथ है.

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उन्होंने ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन के प्रतिनिधिमंडल के कश्मीर की घाटी के दौरे पर जाने की पाकिस्तान की मांग का भी समर्थन किया.

यह प्रतिनिधिमंडल घाटी में कथित मानवाधिकार के उल्लंघन की जांच करता.

तुर्की ने भारत के परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल होने के मुद्दे पर पिछले साल भारत का विरोध किया था क्योंकि पिछले साल पाकिस्तान के आवेदन पर विचार नहीं किया गया था.

इसके अलावा एर्दोआन का यह दावा कि पिछले कई सालों में तुर्की का लोकतंत्र मज़बूत हुआ है, इस पर यक़ीन करना मुश्किल है.

इससे शायद ही इनकार किया जा सकता है कि यह अब अप्रत्याशित संकट में है.

हाल ही में विवादास्पद संवैधानिक जनमत संग्रह में एर्दोआन को नई शक्तियां हासिल हुई हैं जिससे देश में उनका प्रभाव काफी बढ़ गया है और अधिनायकतंत्र के क़रीब पहुंच गया है.

लाख कमियों के बावजूद भारत का लोकतंत्र तुर्की के लोकतंत्र से बेहतर है.

भारत एक देश के तौर पर ख़ुद को वैश्विक स्तर पर धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा है जिसका बहुत बड़ा श्रेय यहां के लोकतंत्र को जाता है.

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अगर भारत वाकई में लोकतांत्रिक दुनिया में एक ताक़त के रूप में अपने आप को स्थापित करना चाहता है तो उसे अपने तुर्की जैसे होने वाले मानवाधिकार उल्लंघन को नज़रअंदाज नहीं करना होगा खासतौर पर जब बड़े पैमाने पर भारतीय भी इससे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हों.

तुर्की में तख़्तापलट की कोशिश के समय 15 विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए थे. इनमें पढ़ने वाले कई भारतीय छात्रों को पढ़ाई बीच में छोड़कर वापस भारत लौटना पड़ा था.

इन विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले कई भारतीय प्रोफ़ेसरों की नौकरी चली गई.

कई महीनों तक इनके बैंक अकाउंट तुर्की सरकार की ओर से बंद कर दिए गए थे.

इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि तुर्की में मौलिक अधिकारों को लेकर बनी गंभीर स्थिति के कारण ही एर्दोआन के पश्चिमी देशों के साथ रिश्तों में मतभेद पनप उठे हैं.

अब वो भारते के रूप में ख़ुद के लिए एक नए दोस्त की तलाश में हैं, लेकिन भारत के नेतृत्व को यह पता होना चाहिए कि पाकिस्तान के साथ तुर्की के क़रीबी रिश्ते उसे भारत का सच्चा दोस्त नहीं होने देंगे और दुनिया में अलग-थलग पड़े इस देश को मदद देने से भारत का कोई हित सधेगा.

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