फ़्लैट खरीदने का प्लान है तो अच्छी ख़बर

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क्या आपके किसी जानने वाले ने फ़्लैट खरीदा था और अभी तक उस पर कब्ज़ा नहीं मिला?

कब्ज़ा मिलने में हफ़्तों, महीनों या वर्षों का विलंब भी होता जा रहा है और आपके दोस्त, पड़ोसी या रिश्तेदार दूसरी जगह किराए पर रह रहे हैं?

बिल्डर ने समय पर फ़्लैट का कब्ज़ा देने के नाम पर हाथ खड़े कर दिए हैं या अपने को दिवालिया घोषित कर चुके है?

और इन तमाम चीज़ों के चलते आपने फ़्लैट/घर खरीदने का प्लान ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

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हो सकता है आप बिल्डर ही हों और अपने हितों के लिए एक क़ानून के इंतज़ार में रहे हों?

हर सूरत में आप सभी के लिए खबर अच्छी है क्योंकि एक मई से भारत में रियल एस्टेट डेवेलपमेंट एंड रेग्युलेशन एक्ट (रेरा) लागू हो चुका है.

हालांकि रेरा को लागू करने की अधिसूचना सिर्फ एक दर्जन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने की है लेकिन अनुमान है कि ज़्यादा से ज़्यादा प्रदेश इसमें थोड़े बहुत संशोधनों के बाद लागू कर देंगे.

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रेरा को विशेष बनाने वाली ख़ास बातें क्या हैं:

  • इस क़ानून के तहत बिल्डर को नए प्रोजेक्ट का 70 फीसदी पैसा एक अलग अकाउंट में रखना होगा जिसमें ज़मीन की कीमत भी शामिल होगी. साथ ही ज़मीन का बीमा कराना भी अनिवार्य होगा.
  • बिल्डर एक प्रोजेक्ट की रकम दूसरे के लिए नहीं इस्तेमाल करेंगे और नए प्रोजेक्ट शुरू के करने के पहले कई स्तर पर अनुमोदन लेना होगा.
  • नए क़ानून को लागू करने के लिए हर राज्य में एक रियल एस्टेट रेग्युलेटर अथॉरिटी बनने का प्रावधान है और सभी नए प्रोजेक्टों से जुड़ी मंज़ूरी इस संस्था से ही मिलेगी.
  • वादा पूरा न करने पर हर्जाने के साथ-साथ धोखाधड़ी के आरोप साबित होने पर बिल्डर को दो से पांच साल तक की सज़ा का प्रावधान है.

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केंद्र सरकार के मुताबिक़ इस क़ानून के बाद 'खरीददार किंग बन जाएगा और साथ ही साथ आने वाले बदलावों के बाद बिल्डरों को भी ज़्यादा खरीददार मिलेंगे'.

जानकारों का मत है कि इस नए कानून के लागू हो जाने के बाद घरों के प्रस्तावित ख़रीददारों के मन में तसल्ली बढ़ेगी.

ग्राहकों के पास अपनी शिकायतें लेकर सीधे एक रेग्युलेटर के पास जाने का अधिकार रहेगा.

ज़ाहिर है बिल्डर और ग्राहकों के बीच पारदर्शिता में भी बढ़ोतरी दिखने की उम्मीद है.

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