क्या भाजपा 'हिंदू पुनरुत्थान' की ओर बढ़ रही है?

  • 3 मई 2017

सोमवार को दिल्ली के कई अख़बारों में मध्य प्रदेश में आदि शंकराचार्य प्रकटोत्सव के आयोजन के इश्तिहार छपे.

मध्य प्रदेश में आदि शंकराचार्य से जु़ड़ा ये पहला आयोजन था.

इससे पहले वर्ष 2016 में हरियाणा की भाजपा सरकार ने अंतरराष्ट्रीय गीता दिवस का आयोजन किया था.

हिंदू हितों की बात करने वाली भाजपा क्या हिंदू पुनरुत्थान के तहत ये आयोजन कर रही है? और इसमें आम टैक्सदाता के धन का इस्तेमाल क्यों किया जाए?

हिंदू दर्शनशास्त्र में आदि शंकराचार्य का महत्वपूर्ण स्थान है. उन्होंने चारों धाम की स्थापना की थी.

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हिंदुत्व की राजनीति को सेक्युलर करने की कोशिश

आदि शंकराचार्य ने माधवाचार्य और रामानुजाचार्य के साथ मिलकर सनातन परंपरा के पुनरुत्थान के लिए काम किया.

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मध्य प्रदेश जनसंपर्क विभाग की वेबसाइट पर 'ब्लॉगर' मुख्यमंत्री शिवराज सिंह लिखते हैं, "आज से लगभग 1,200 वर्ष पूर्व यानी 792 ईस्वी में आदि शंकराचार्य मध्य प्रदेश में नर्मदा तट पर ज्ञान प्राप्ति के लिए आए थे."

ब्लॉग के मुताबिक सरकार ने फ़ैसला लिया है कि मध्य प्रदेश में आदि शंकराचार्य के पाठ शिक्षा की पुस्तकों में जोड़े जाएंगे, साथ ही ओंकारेश्वर में शंकर संग्रहालय, वेदांत प्रतिष्ठान और शंकाराचार्य की बहुधातु मूर्ति स्थापित की जाएगी.

लेकिन भारत जैसे सेक्युलर देश में राज्य सरकार का किसी धर्म विशेष के व्यक्ति से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन क्या सही है, खासकर जब धर्म को मानने वाले बहुसंख्यक है.

क्या ये हिंदू पुनरुत्थानवाद की ओर पहला कदम है और नए हिंदू उत्सवों, धार्मिक व्यक्तियों का महिमामंडन किया जा रहा है?

राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद कहते हैं, "भारत में दूसरे धर्मों को मानने वालों को संदेश मिल रहा है कि राज्य अपने आपको हिंदू धर्म के संरक्षक, समर्थक के तौर पर प्रस्तुत कर रहा है. इससे उनका अलगाव भारतीय राज्य से बढ़ेगा. ये सामाजिक जीवन के लिए शुभ नहीं है."

आयोजन पर सवाल क्यों?

वो कहते हैं, "मध्य प्रदेश सरकार ये जो कर रही है वो गलत है. लेकिन ये पहली बार नहीं है. इससे पहले सरकार ने कुंभ का आयोजन किया. उसमें पैसा खर्च किया गया. राज्यों को धार्मिक गतिविधियों से खुद को अलग रखना चाहिए."

उधर धार्मिक मामलों के जानकार एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार इसमें कोई गलत नहीं है. उनके अनुसार भारत में जहां कई धर्मों के लोग रहते हैं वहां सरकारें हज से लेकर सिखों के एसजीपीसी से जुड़ी हैं, फिर गीता उत्सव और आदि शंकराचार्य प्रकटोत्सव के आयोजन में क्या गलत है?

गांधी से जुड़ी एक वेबसाइट के मुताबिक महात्मा गांधी ने भी राज्यों को धर्म के मामलों में किसी मदद को लेकर चेताया था.

मध्य प्रदेश सरकार में संस्कृति मंत्रालय में राज्य मंत्री सुरेंद्र पटवा किसी भी धर्म विशेष का पक्ष या उसे अनदेखा करने के आरोप का खंडन करते हैं.

वो कहते हैं, " हम ओंकारेश्वर में मुख्यमंत्री जी के नेतृत्व में शंकराचार्य की मूर्ति की स्थापना की कोशिश कर रहे हैं. वो तो पूरे देश के हैं, सिर्फ़ मध्य प्रदेश के नहीं. उन्होंने चारों धाम की स्थापना की है. इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिए."

पटवा के मुताबिक, "चाहे गुरुनानक जयंती हो या ईद हो, मुख्यमंत्री जी के निवास पर इस तरह के कार्यक्रम होते रहे हैं."

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राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद सोमनाथ मंदिर और महात्मा गांधी के दिनों की याद दिलाते हैं.

वो कहते हैं, "महात्मा गांधी जो कि सनातनी हिंदू थे, उन्होंने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में भारतीय राज्य के संसाधन लगाने का विरोध किया था. राजेंद्र प्रसाद ने उनकी बात नहीं मानी लेकिन राजेंद्र प्रसाद महात्मा गांधी से बड़े हिंदू तो नहीं थे. गांधी ने बहुत स्पष्ट कहा था कि सोमनाथ के जीर्णोद्धार में भारतीय राज्य का पैसा नहीं लगना चाहिए."

भारत जैसे देश में जहां धर्म एक नाज़ुक विषय है, वहां क्या ज़रूरी नहीं कि वो खुद को किसी भी धर्म के बहुत ज़्यादा नज़दीक जाने से रोके?

इसका उलटा तर्क है कि धर्म और राज्य को अलग करने की बात करना तो सही है लेकिन ज़मीन पर इसे अमल में लाना कितना आसान है?

सरकारी संरक्षण का विरोध

उधर अपूर्वानंद के मुताबिक जब पश्चिमी देशों में धर्म और राज्य ने खुद को एक दूसरे से अलग रखा है, तो भारत में ये संभव क्यों नहीं.

वो कहते हैं, "भारत के बारे में एक गलतफ़हमी है कि वो ही एकमात्र धार्मिक है. इंग्लैंड और अमरीका कहीं ज़्यादा धार्मिक देश हैं. खुद सिखों को विचार करना पड़ेगा कि धर्म और राजनीति को मिलाने से अच्छे परिणाम निकले हैं या नहीं."

हज में सरकारी सब्सिडी की बात पर अपूर्वानंद का तर्क है कि हज यात्रियों को ही शिकायत है कि इससे यात्रा का खर्च बढ़ता है. वो कहते हैं, "हज का जहां उदाहरण दिया जाता है वहां लोग मानसरोवर का उदाहरण भूल जाते हैं." वो किसी भी धार्मिक गतिविधि को सरकारी संरक्षण का विरोध करते हैं.

अपूर्वानंद के मुताबिक, "अगर सरकार खुद कुंभ का आयोजन करने लगे, वो साधुओं को बुलाने लगे, उनके आने जाने का खर्च देने लगे, जैसे कि सिंहस्थ कुंभ में मध्य प्रदेश सरकार ने किया तो ये बहुत स्पष्ट था कि वो संरक्षक की भूमिका निभा रहा है. इसका मतलब ये कि राज्य और धार्मिक संस्था एक हो गए हैं. ये गलत है. ये संवैधानिक नैतिक मूल्यों का हनन है."

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अपूर्वानंद किसी भी धार्मिक यात्रा में सरकारी मदद का विरोध करते हैं.

वो कहते हैं, "धार्मिक लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए कि मैं तीर्थयात्रा क्यों करता हूं. हज भी तीर्थयात्रा है, मानसरोवर और वैष्णव देवी भी तीर्थयात्रा है. तीर्थयात्राओं में कष्ट शामिल है. आपको अपने आपको कष्ट देना है. यदि आप खुद को कष्ट नहीं दे रहे हैं और सुविधाजनक तरीके से तीर्थ कर रहे हैं तो तीर्थ हुआ ही नहीं. तो फिर उससे लोग कौन सा पुण्य उठा रहे हैं."

वरिष्ठ वकील और संविधान मामलों के जानकार अरविंद दातार के मुताबिक संविधान में ऐसा कुछ नहीं है जो सरकार को कोई धार्मिक आयोजन करने से रोके.

संविधान मामलों के जानकार एक अन्य व्यक्ति के मुताबिक पहले की सरकारें मुस्लिम वोटबैंक को ध्यान में रखकर फ़ैसले लेती थीं. उनके अनुसार मौजूदा सरकार के कई कदम उन्हीं फ़ैसलों की प्रतिक्रिया लगते हैं.

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