'प्रेस फ्रीडम मिथक और मज़ाक है'

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तीन मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है. इस मौक़ै पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर प्रेस की आज़ादी के महत्व को बताया है.

पीएम मोदी ने ने ट्वीट किया, ''विश्व प्रेस फ्रीडम डे पर हम स्वतंत्र और बहुमुखी पत्रकारिता का दृढ़ समर्थन करते हैं. यह लोकतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी है.''

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हालांकि दुनिया भर में पत्रकारिता के लिहाज़ के भारत में कई मुश्किलें हैं. 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने 180 देशों की सूची जारी की है जिसमें प्रेस स्वतंत्रता के हिसाब से भारत का स्थान 136वां है.

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भारत ज़िम्बॉब्वे और म्यांमार जैसे देशों से भी पीछे है. निर्भीक पत्रकारिता करने के मामले में नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड अव्वल हैं. इस मामले में चीन 176वें और पाकिस्तान 139 नंबर पर है.

मई 2014 में मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे. तब भारत 140वें नबंर पर था. 2015 में भारत 136वें नंबर पर आया. 2016 में 133वें नबंर आया और 2017 में 136वें पायदान पर आ गया.

2010 में भारत इस सूची में 122वें नंबर पर था और तब यूपीए सरकार सत्ता में थी. इसके बाद भारत 2014 तक 140वें नबंर पर रहा.

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ''भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा है और मीडिया डर की वजह से ख़बरें नहीं छाप रही है.''

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रिपोर्ट में कहा गया है, "भारतीय मीडिया में सेल्फ़ सेंशरशिप बढ़ रही है और पत्रकार कट्टर राष्ट्रवादियों के ऑनलाइन बदनाम करने के अभियानों के निशाने पर हैं. सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को रोकने के लिए मुक़दमे तक किए जा रहे हैं.''

जबकि मोदी ने अपने ट्वीट में कहा है, "आज के दौर में सोशल मीडिया लोगों से जुड़ने के एक सक्रिय माध्यम के रूप में उभरा है और इसने स्वतंत्र प्रेस को और अधिक ताक़त दी है."

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई इस पर लिखते हैं, "आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है. भारत 136वें और पाकिस्तान 139वें नंबर पर है. बहुत कुछ कहा जा चुका है. उन चुनिंदा लोगों को सलाम जो अब भी आवाज़ उठा रहे हैं."

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अपने अगले ट्वीट में राजदीप ने लिखा, "सच ये है कि भारत में प्रेस स्वतंत्रता की महान परंपरा रही है. बिज़नेस मॉडलों और निजी हितों की वजह से इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग हुआ है."

वहीं पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने फ़ेसबुक पर लिखा, "विश्व प्रेस स्वंत्रता दिवस दुनिया का सबसे बड़ा छलावा है. प्रेस स्वतंत्रता एक मिथक और जनता के साथ एक क्रूर मज़ाक है."

उन्होंने लिखा, "दुनियाभर में मीडिया कार्पोरेट के हाथ में है जिसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक फ़ायदा कमाना है. वास्तव में कोई प्रेस स्वतंत्रता है ही नहीं".

काटजू ने लिखा, "बड़े पत्रकार मोटा वेतन लेते हैं और इसी वजह से वो फैंसी जीवनशैली के आदी हो गए हैं. वो इसे खोना नहीं चाहेंगे और इसलिए ही आदेशों का पालन करते हैं और तलवे चाटते हैं."

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