मापा जा रहा है अबूझमाड़ के जंगलों को

  • 3 मई 2017
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छत्तीसगढ़ में माओवादियों का गढ़ कहा जाने वाला नारायणपुर ज़िले का अबूझमाड़, देश का ऐसा इलाका है, जहां 15वीं शताब्दी के बाद पहली बार राजस्व सर्वेक्षण का काम शुरू किया गया है.

लेकिन इस सर्वेक्षण से माओवादी नाराज़ हैं. ज़िले के कलेक्टर का कहना है कि माओवादी गांव वालों को धमकाने की कोशिश कर रहे हैं.

कलेक्टर टामन सिंह सोनवानी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पिछले सप्ताह भर में तीन गांवों में राजस्व सर्वेक्षण का काम आरंभ किया गया है. लेकिन ख़बर है कि माओवादियों ने गांव वालों को इस सर्वेक्षण से दूर रहने के लिये आदेश जारी किया है."

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सोनवानी का कहना है कि किसी भी स्थिति में सर्वेक्षण का काम पूरा किया जाएगा.

अक़बर और ब्रिटिश राज की कोशिशें नाकाम रही

असल में जीपीएस और गूगल मैप के इस दौर में भी अबूझमाड़ में कुल कितने गांवों में किसके पास कितनी ज़मीन है, चारागाह या सड़कें हैं या नहीं या जीवन के दूसरी ज़रूरी चीजों की उपलब्धता कैसी है, इसका कोई रिकार्ड कहीं उपलब्ध नहीं है. ये गांव कहां हैं या इनकी सरहद कहां है, यह भी पता नहीं है.

इतिहास के पन्नों को पलटने से पता चलता है कि बस्तर के चार हज़ार वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले हुए नारायणपुर ज़िले के अबूझमाड़ में पहली बार अकबर के ज़माने में राजस्व के दस्तावेज़ एकत्र करने की कोशिश की गई थी. लेकिन घने जंगलों वाले इस इलाके में सर्वे का काम अधूरा रह गया.

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ब्रिटिश सरकार ने 1909 में लगान वसूली के लिये इलाके का सर्वेक्षण शुरू किया लेकिन वह भी अधूरा रह गया.

हालत ये हुई कि अबूझमाड़ के इलाकों में बसने वाली आदिवासी आबादी आदिम हालत में जीवन जीती रही. 80 के दशक में माओवादियों ने इस इलाके में प्रवेश किया और फिर इसे अपना आधार इलाका बनाना शुरू किया.

यही वो दौर था, जब अबुझमाड़ के इलाके में प्रवेश के लिये कलेक्टर से अनुमति लेने का नियम बना दिया गया. प्रवेश के इस प्रतिबंध को कई सालों बाद 2009 में ख़त्म किया गया.

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ज़ाहिर है, विकास के तमाम आंकड़े और दावे अबूझमाड़ की सरहद से बाहर ही आ कर खत्म हो जाते रहे हैं.

80 के दशक में माओवादियों का गढ़ बना

पिछले कई सौ सालों से इस इलाके के भीतर 237 गांव बसे हैं लेकिन इन गांवों में रहने वाले किसी भी आदिवासी के पास उसकी ज़मीन या मकान का कोई कागज़ नहीं है. सरकार के पास भी इनकी जानकारी नहीं है.

आज़ादी के बाद भी यह इलाका अबूझा रह गया, जहां धीरे-धीरे माओवादियों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया.

आज की तारीख में इसे माओवादियों का गढ़ कहा जाता है.

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ज़िले के कलेक्टर टामन सिंह सोनवानी कहते हैं," इस इलाके में जिसकी लाठी, उसकी भैंस जैसा हाल है. कोई किसी की भी ज़मीन पर कब्जा कर लेता है और दस्तावेज़ नहीं होने के कारण मामला अदालत में भी नहीं पहुंच पाता. आदिवासियों को विकास की योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल पाता. लेकिन अब सर्वेक्षण के बाद ऐसा नहीं होगा."

नारायणपुर ज़िले में भारतीय जनता पार्टी की उपाध्यक्ष प्रमिला प्रधान चाहती हैं कि सर्वेक्षण का काम जल्द से जल्द पूरा हो, जिससे इलाके का विकास हो सके.

प्रमिला कहती हैं, "नारायणपुर में जितना विकास हुआ है, उससे अबूझमाड़ अभी भी बचा हुआ है. हज़ारों आदिवासियों को इसका लाभ मिलना चाहिए. अबूझमाड़ के लोगों के लिए भी सड़कें बनेंगी. "

सरकार की नीयत पर सवाल?

आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय संयोजक और बस्तर के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम का कहना है, '' अबूझमाड़ में माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने में इस सर्वेक्षण से ज़रूर कोई मदद मिल सकती है. इसके अलावा औद्योगिक घरानों के लिए चरागाह बनाने में भी सुविधा होगी. लेकिन इससे अबूझमाड़ के विकास में कोई मदद मिलेगी, इसमें शक़ है.''

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मनीष कहते हैं, "जगदलपुर शहर से कोई 25-26 किलोमीटर दूर एक गांव हैं बुरुंगपाल, जहां कोई माओवादी गतिविधि नहीं हैं. हम लोगों ने कई बार प्रदर्शन किया लेकिन आज तक वहां सड़क नहीं बनी. सरकार अगर कहती है कि अबूझमाड़ में विकास के लिए वह सर्वेक्षण करवा रही है तो उसे विकास के मामले में ईमानदार होना पड़ेगा. "

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सरकार की नीयत पर सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन अबूझमाड़ का सर्वेक्षण कितना मुश्किल है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि सरकार ने दो सालों में केवल सौ गांवों के सर्वेक्षण का लक्ष्य रखा है. यानी सभी 237 गांवों के सर्वे के लिये अभी कम से कम चार-पांच साल तो प्रतीक्षा करनी ही होगी. इसके बाद कहीं जा कर विकास की योजनाएं लागू की जाएंगी.

मतलब साफ़ है कि अबूझमाड़ में विकास की पहेली को बूझना अभी भी सरल नहीं होगा.

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