कावड़ की यात्रा चित्तौड़गढ़ से लंदन तक

  • 7 मई 2017
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कावड़ यानी लकड़ी की डिब्बे जैसी कलाकृति, जिसके परत दर परत पट खुलते जाते हैं और साथ ही खुलती जाती है एक चित्रकथा.

इन्हें लेकर कावड़िया भाट समुदाय में लोगों के घर जा-जाकर कथा सुनाने की परम्परा है.

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ का बस्सी गाँव इस अद्भुत काष्ठ कला के लिए जाना जाता है वहीं उदयपुर में भी कुछ कलाकार इस ऐतिहासिक कला को जीवित रखे हुए हैं.

रेत पर कला उकेरता कलाकार

बादलों पर अनोखी कला

ऐसा माना जाता है कि बस्सी के रावत गोविंददास ने 1652 में सुथार कलाकारों को मालपुरा टोंक से यहाँ स्थापित किया, कुछ कलाकार यहाँ से उज्जैन भी गए.

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पारंपरिक रूप से कावड़ की दीवारों पर धार्मिक एवं ऐतिहासिक कथाओं का लोक चित्रण होता आया है, पर बदलते समय में कलाकार नए-नए विषयों पर भी काम कर रहे हैं.

नए कलाकारों की झोली में नए मौके

आम प्रचलित कावड़ 12 इंच की और लाल रंग की होती है पर अब अन्य रंगों का प्रयोग भी होने लगा है.

दो कपाट से शुरू हुई कावड़ परंपरा में अब 16 कपाट तक की कावड़ बनती है. कलाकार चित्रण के लिए रंग भी खुद ही बनाते हैं.

उदयपुर के मांगीलाल मिस्त्री की बनाई हुई 'अल्पबचत की कावड़' शीघ्र ही लंदन के म्यूजियम में प्रदर्शित की जाने वाली है.

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उन्होंने सबसे छोटी माचिस की आकार भी कावड़ भी बनाई है तो 8 फ़ुट ऊँची और 20 फ़ुट लम्बी भी जो उदयपुर के वेस्टजोन कल्चर सेंटर में प्रदर्शित है. वे अब तक 117 कावड़ बना चुके हैं.

सबसे महंगी कावड़ सागवान की लकड़ी की होती है पर अमूमन अडूसा, आम, जामुन आदि की लकड़ी का इस्तेमाल अधिक होता है.

धार्मिक और पौराणिक कथाएं कावड़ के सबसे प्रचलित विषय हैं, पर अब प्रयोगधर्मी कलाकार जागरूकता संदेश के लिए भी इस कला का प्रयोग कर रहे हैं.

बाइबिल से लेकर ए बी सी डी, बाल विवाह, साक्षरता और दहेज़ प्रथा उन्मूलन पर भी कावड़ बनाई जा रही हैं. कुछ लोग अपनी वंशावली की कावड़ बनवाना भी पसंद करते हैं.

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कावड़ की चित्रकारी इतनी सशक्त होती है कि जैसे जैसे एक-एक पट खुलता जाता है, दर्शकों के सामने कथा साकार होती जाती है.

राजस्थान के कावड़ कलाकारों को बहुत से पुरस्कार और सम्मान भी मिल चुके हैं.

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