बाइयों के काम को काम क्यों नहीं मानती सरकार?

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'अतिथि तुम कब जाओगे' फिल्म के एक सीन में कोंकणा सेन शर्मा कहती हैं कि पति चला जाए तो दूसरा मिल सकता है लेकिन बाई चली जाए तो दूसरी आसानी से नहीं मिलती.

जाहिर है इनकी हमारी जिंदगी में बहुत अहमियत है. पर क्या उन्हें उतने पैसे और इज्जत मिलती है, जिसकी वो हकदार हैं?

बाई, कुक और आया जैसी सेवाएं उपलब्ध कराने वाली वेबसाइट 'बुक माय बाई' के फाउंडर अनुपम सिंहल कहते हैं, ''हाल के दिनों में इंटरनेट और तमाम वेबसाइटों की मदद से बाई ढूंढना आसान हुआ है. इससे काम की तलाश कर रही महिलाओं की भी मदद हुई है.''

अगर आप गूगल पर डोमेस्टिक हेल्प प्लेसमेंट एजेंसी सर्च करेंगे तो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों में मौजूद ढेरों एजेंसियों की लिस्ट दिखेगी.

35 साल की मंजू ने 'बुक माय बाई' के जरिए अंधेरी (मुंबई) के एक घर में बेबी सिटर यानी आया का काम ढूंढा.

उन्हें यहां काम करते हुए सात महीने हुए हैं और वह इससे काफी ख़ुश भी हैं. इसके लिए उन्हें हर महीने 15 हजार रुपये मिलते हैं.

34 साल की हसीना को 'माय दीदी' वेबसाइट के जरिए साफ-सफाई का काम मिला है.

उन्होंने बताया,"कंपनी हमें पिकअप और ड्रॉप देती है. उन्होंने हमारा बैंक अकाउंट भी खुलवाया. अगर हमारे साथ बुरा बर्ताव होता है तो हमें वहां दोबारा नहीं भेजा जाता."

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"माय दीदी" के फाउंडर जॉनी झा ने बताया, "हम अपने यहां काम करने वाली महिलाओं को मोबाइल फोन देते हैं. उनका मेडिकल चेकअप कराते हैं, साथ ही सेविंग और इन्वेस्टमेंट की ट्रेनिंग भी देते हैं.''

हालांकि असंगठित क्षेत्र के कामगरों के हक की लड़ाई लड़ने वाले वकील और एक्टिविस्ट सुभाष भटनागर का मानना है कि भारत में ज्यादातर प्लेसमेंट एजेंसियां फ्रॉड हैं और वे काम ढूंढ रहे गरीबों का शोषण करती हैं.

सुभाष बताते हैं कि घरेलू कामकाज करने वाले लोगों को हमारे देश में कामगर ही नहीं माना जाता.

यानी आपके घर में काम करने वाली बाई और आपके बीच एंप्लॉयर और एंप्लॉयी का रिश्ता ही नहीं है. इसलिए घरों में काम करने वाली ये महिलाएं कानूनी अधिकारों से वंचित हैं.

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