शिवपाल यादव बनाएंगे सेक्युलर मोर्चा

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शिवपाल यादव ने दो दिन पहले ही इटावा में कहा था कि अगर अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद नहीं छोड़ते तो एक महीने के भीतर वो सेक्युलर मोर्चे का गठन करेंगे.

लेकिन दो दिन भी नहीं बीते और शिवपाल यादव ने इटावा में ही सेक्यूलर मोर्चे की घोषणा कर दी. उन्होंने मुलायम सिंह यादव को इस सेक्युलर मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी घोषित कर दिया.

मुलायम सिंह यादव ने इस मोर्चे के अध्यक्ष पद पर अपनी स्वीकृति दी है या नहीं, इस सवाल के जवाब में शिवपाल का कहना था, "क्या ये नेताजी की राय लिए बिना ही हो गया? उनकी मंज़ूरी ली गई है."

शिवपाल ने दो दिन पहले इटावा में इस बात के संकेत दिए थे और माना जा रहा था कि देर-सबेर वो नई पार्टी की घोषणा कर देंगे. लेकिन दो दिन के भीतर ही ऐसा हो जाएगा, इस बात का अंदाज़ा लोगों को नहीं था.

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'शकुनि और आस्तीन का सांप'

दो दिन पहले इटावा में शिवपाल यादव ने रामगोपाल यादव पर भी निशाना साधा था और उन्हें 'शकुनि' तक कह दिया था.

शुक्रवार को जब सेक्युलर मोर्चे की घोषणा हुई उसके बाद अखिलेश यादव से इस बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने इससे अनभिज्ञता जताई.

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लेकिन अखिलेश यादव ने ये ज़रूर कहा कि पार्टी में कुछ लोग 'आस्तीन का सांप' हैं. हो सकता है कि उनका इशारा शायद चाचा शिवपाल यादव की ओर रहा हो.

सेक्यूलर मोर्चे के गठन के बारे में इटावा के स्थानीय पत्रकार दिनेश शाक्य ने बताया, "मुलायम सिंह यादव इटावा आने के बाद शुक्रवार की सुबह अपने बहनोई डॉक्टर अजंट सिंह और बहन कमला देवी के घर उनसे मिलने के लिए गए थे. वहीं पर शिवपाल भी उनसे मिलने के लिए जा पहुंचे. दोनों के बीच सेक्युलर मोर्चा बनाने को लेकर क़रीब 30 मिनट तक बातचीत हुई और शायद मुलायम ने सेक्युलर मोर्चे का अध्यक्ष पद ग्रहण करने की हामी भर दी. मुलायम की हामी के बाद शिवपाल सिंह यादव बेहद उत्साहित नज़र आए और उन्होंने इसकी घोषणा कर दी."

हालांकि जब इस बारे में मुलायम सिंह यादव से पूछा गया तो वो बिना कोई जवाब दिए निकल गए.

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कौन कौन होगा मोर्चे में?

इस मोर्चे का स्वरूप क्या होगा, इसमें किन दलों को जोड़ने की योजना है, ख़ुद समाजवादी पार्टी की इसमें क्या भूमिका होगी, जैसे तमाम सवाल अभी भी हवा में हैं.

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वहीं मोर्चे को लेकर अखिलेश यादव की बेरुखी से ये भी साफ़ हो गया है कि कम से कम अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की इसमें शायद ही कोई भूमिका हो.

वैसे शिवपाल यादव ने समाजवादी पार्टी से अलग होने का संकेत विधानसभा चुनाव से पहले ही दे दिया था.

चुनाव के बाद इस बात का ज़िक्र उन्होंने कई बार किया कि अखिलेश यादव ने तीन महीने का समय मांगा था और अब उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ देना चाहिए.

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