नज़रिया: यूपी में लाल बत्ती कल्चर ख़त्म लेकिन वीआईपी कल्चर को कैसे रोकेंगे योगी आदित्यनाथ?

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रियों और राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों से लाल बत्ती के इस्तेमाल को बंद करने को कहा है.

एक तरह से देखें तो योगी आदित्यनाथ का ये क़दम देश में सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में वीआईपी कल्चर को ख़त्म करने की शुरुआत है. वैसे यूपी की एक पहचान सामंती संस्कृति वाली भी रही है.

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मोदी ने इससे भी आगे बढ़कर ये दावा किया है कि वे देश में एक नई संस्कृति लाना चाहते हैं- ये ईपीआई (एवरी पर्सन इज इंपोर्टेंट- यानी- हर आदमी ख़ास है) की संस्कृति होगी.

मंत्रियों पर नकेल

हालांकि करने के मुक़ाबले कहना आसान होता है, लेकिन कोई भी ये देख सकता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, उनके दो उप मुख्यमंत्री और 43 अन्य मंत्री, मोदी के निर्देशों के मुताबिक लाल बत्ती का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनकी भावना ऐसी ही हो, ये नहीं कहा जा सकता.

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तथाकथित वीआईपी लोग या कहें प्रत्येक वीआईपी ने अपने वाहनों से लाल बत्ती हटा ली और इसका ख़ूब प्रचार प्रसार भी किया.

राज्य के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की तो गाड़ी से लाल बत्ती को हटाने वाली तस्वीर भी आ गई. जिसे सभी स्थानीय दैनिक अख़बारों ने प्रमुखता से छापा भी. हालांकि उन्होंने उतनी ही चतुराई से, लालबत्ती की जगह अपनी कार में बड़ा लाल झंडा लगा लिया.

अगर इससे उनके आने का पता नहीं चल पाए तो उनकी एसयूवी में लगे हूटर की आवाज़ से लोगों को पता चल ही जाएगा, वैसे भी वो करीब आधे दर्जन गाड़ियों के काफ़िले में चलते हैं.

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मौर्य ख़ुद को सुपर वीआईपी मानते हैं, इसकी झलक तो सरकार में आने के पहले ही दिन देखने को तब मिली जब वे यूपी सचिवालय एनेक्सी के पांचवें तल पर बने मुख्यमंत्री चैंबर में बैठने पहुंच गए थे.

मौर्य का कमाल

हालांकि उन्हें पुराने विधान भवन की इमारत में दफ़्तर अलॉट किया गया था. ये बात जब योगी आदित्यनाथ की जानकारी में आई तो उन्होंने यूपी सचिवालय एनेक्सी का ख़ुद ही दौरा किया, इसे दफ़्तरों में होने वाला औचक निरीक्षण ही कहा गया, लेकिन इसकी वास्तविक वजह ये थी कि योगी आदित्यनाथ ने मौर्य को ये बताया कि वे मुख्यमंत्री के लिए बने दफ़्तर का इस्तेमाल कर रहे हैं.

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इस मामले में शर्मिंदा हुए मौर्य के पास कोई विकल्प नहीं बचा था, वे शांति से अपने दफ़्तर पहुंच गए. लेकिन अपनी ग़लती छुपाने के लिए उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि उन्हें लगा कि मुख्यमंत्री स्थायी तौर पर नए बनाए गए लोकभवन से काम काज देखेंगे.

लोकभवन का निर्माण पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 600 करोड़ रुपये की लागत से कराया था. वास्तविकता ये है कि योगी आदित्यनाथ ने केवल पहला दिन ही लोक भवन में बिताया. मौर्य ये नहीं बता पाए कि अपना ऑफ़िस छोड़कर वे उस ऑफ़िस को काबिज करने कैसे पहुंच गए जो 1980 से मुख्यमंत्री दफ़्तर के रूप में मशहूर रहा है.

लेकिन वीआईपी की ग्रंथि केवल मौर्य तक सीमित नहीं है. योगी के मंत्रिमंडल में शामिल कई मंत्री गाड़ियों के काफ़िले में चलते हैं और कारों में लाल झंडे लगाकर चलते हैं. इसके साथ वे ऊंची आवाज़ वाले हूटर लगा कर चलते हैं. यह सब लालबत्ती के मुक़ाबले लोगों को कहीं ज़्यादा प्रभावित करते हैं.

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यहां तक कि योगी आदित्यनाथ भी अखिलेश की तरह से 12-18 गाड़ियों के काफ़िले में चलते हैं. दिलचस्प ये भी है कि अख़िलेश यादव कई बार ये कहा करते थे कि वे मुख्यमंत्री के काफ़िले को 30-34 गाड़ियों के काफ़िले को घटाकर 17-20 गाड़ियों के काफ़िले तक ले आए थे.

हालांकि आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने जब वीआईपी संस्कृति को ख़त्म किया तब जा कर ही अखिलेश यादव ने अपने गाड़ियों के काफ़िले को कम किया. लेकिन उन्होंने चतुराई से एंबेसडर की जगह मर्सिडीज़ एसयूवी का इस्तेमाल शुरू कर दिया.

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इतना ही नहीं, सुरक्षा के नाम पर, मुख्यमंत्री का काफ़िला जब सड़कों से निकलता है तो भी उसे आम लोगों के लिए बंद कर दिया जाता है, वास्तव में मुख्यमंत्री का काफ़िला आने से पहले ही रास्ता बंद कर दिया जाता है.

काफ़िला गुजरने के तुरंत बाद पुलिस वाले भी ग़ायब हो जाते हैं और सड़कों पर अस्त व्यस्त हाल दिखता है और इसकी जानकारी शायद ही मुख्यमंत्री को हो. उन्हें इस बात की जानकारी भी नहीं होगी कि किस तरह से पुलिस बल साइकिल सवार, रिक्शा चालकों इत्यादि को धक्का दे कर किनारे कर देते हैं.

हालांकि राज्य के नए मुख्यमंत्री को ये समझना होगा कि केवल लाल बत्ती पर रोक लगाने से वीआईपी संस्कृति ख़त्म नहीं होगी. ये अच्छी शुरुआत है, लेकिन बस यही काफ़ी नहीं है.

( ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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