छत्तीसगढ़ः फ़ेसबुक पोस्ट के लिए डिप्टी जेलर निलंबित

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फ़ेसबुक पर बस्तर में सुरक्षा बलों की आलोचना करने वाली रायपुर सेंट्रल जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को छत्तीसगढ़ सरकार ने निलंबित कर दिया है.

राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने कहा है कि वर्षा डोंगरे ने फ़ेसबुक पर जो कुछ लिखा है, वह काफी संदेहास्पद है. गृहमंत्री पैकरा ने कहा कि वर्षा डोंगरे के माओवादी विचारधारा से संबंध होने की भी जांच कराई जा रही है.

छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (जेल) गिरधारी नायक ने बीबीसी से कहा, "उनके ख़िलाफ़ कई गंभीर शिकायतें थीं, जिसके कारण उन्हें निलंबित किया गया है. पूरे मामले में उन्हें नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा गया है."

रायपुर सेंट्रल जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने पिछले सप्ताह फेसबुक पर एक टिप्पणी करते हुए बस्तर में सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ कई गंभीर आरोप लगाये थे.

वर्षा ने बस्तर में रहने के दौरान के अपने अनुभव फ़ेसबुक पर साझा भी किए थे.

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हालांकि जब सरकार ने वर्षा की इस पोस्ट की जांच शुरु की तो इस पोस्ट को हटा लिया गया. लेकिन तब तक फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप समेत दूसरे सोशल मीडिया पर यह पोस्ट वायरल हो गई थी और इस पर बहस भी शुरु हो गई है.

जेल पदाधिकारियों के अनुसार इसके बाद वर्षा डोंगरे ने ई-मेल से अवकाश पर जाने की सूचना दी. लेकिन अवकाश ख़त्म होने के बाद भी वे काम पर नहीं लौटीं.

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क्या लिखा था पोस्ट में

वर्षा डोंगरे की वो फेसबुक पोस्ट, जिस पर विवाद हुआ, जिसे बाद में हटा लिया गया, उसका विवरण नीचे दिया गया है. वर्षा डोंगरे ने लिखा था-

"मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सच्चाई खुद--खुद सामने आ जाएगी. घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं…भारतीय हैं. इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है. लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना… उनकी जल, जंगल,ज़मीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं, इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनका स्तन निचोड़कर दूध निकालकर देखा जाता है.

टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान के अनुसार 5 वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सैनिक सरकार को कोई हक नहीं बनता. आदिवासियों के जल-जंगल और ज़मीन को हड़पने का….आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है. नक्सलवाद ख़त्म करने के लिए… लगता नहीं.

सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं, जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल-जंगल-ज़मीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है. वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केसों में चारदीवारी में सड़ने भेजा जा रहा है.

तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जायें. ये सब मैं नहीं कह रही सीबीआई रिपोर्ट कहती है, सुप्रीम कोर्ट कहती है, जमीनी हकीकत कहती है.

जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं, चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार, उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है. अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है. ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता.

मैंने स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था, जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था.

उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था, जिसके निशान मैंने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए. मैंने डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा.

राज्य में 5 वीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए. उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जाये. आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं. हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक…

पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझें …किसान जवान सब भाई-भाई हैं. अतः एक दूसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा. संविधान में न्याय सबके लिए है, इसलिए न्याय सबके साथ हो.

अब भी समय है, सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे. ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे. जय संविधान, जय भारत."

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