नज़रिया: 'आप: सपना टूटा और राजनीति का कीचड़ सामने आया'

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कांग्रेस और भाजपा भारतीय राजनीति के यथार्थ हैं और 'आप' इन्हीं दोनों पार्टियों के इस यथार्थवाद के बीच एक असली सी दिखने वाली कहानी थी. ये एक सपना था जिस पर भरोसा करना आसान नहीं था. एक ऐसा सपना जिसने इस देश में वैकल्पिक राजनीति में लोगों का भरोसा जताया.

लोग 'आप' रूपी इसी कल्पना के साथ देश और समाज में दैनिक जीवन में शुचिता आने का भरोसा करना चाहते थे. और, आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता अरविंद केजरीवाल राजनीति में निपुण होने की जगह एक काल्पनिक किरदार पीटर पैन के देशी वर्ज़न हैं.

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Image caption दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

सबसे खूबसूरत बात ये है कि भारतीय राजनीति ने अब तक इस बात पर भरोसा किया कि रोजमर्रा की ज़िंदगी में आदर्शवाद संभव है.

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'आप' ने स्टूडेंट्स, संन्यास ले चुके पेशेवर, आईआईटी पास आउट इंजीनियर और गांधीवादी भारत का सपना देख रहे राष्ट्रवादियों, समाजसेवियों और शिष्टता की मांग करती महिलावादियों से मिलकर आम आदमी पार्टी नामक नामुमकिन सा दिखने वाला गठजोड़ तैयार किया.

Image caption योगेंद्र यादव

'आप' की परीकथा

'आप' लोगों को भरोसा दिलाती हुई एक ऐसी ही परीकथा थी. दुख की बात ये है कि ये एक खराब कहानी में बदल गई. सपना टूट गया और राजनीति का कीचड़ सामने आ गया.

कोई इस बात को कैसे समझा सकता है जब एक आदर्श दुनिया का सपना मनहूसियत में बदल जाए. ये एक दो सालों में खत्म होने वाली सपने जैसी दिखने वाली फ़िल्म थी.

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सबसे पहले ये समझने की ज़रूरत है कि आप की शक्ति इसका उत्साह और विविधता थी. कोई भी पार्टी में मौजूद लोगों की ईमानदारी देखकर खुश हो सकता था.

विदेश सेवा से सेवानिवृत्त मधु भादुड़ी, एडमिरल रामदास और अरुण मित्र चिनॉय को छोटी-छोटी बातों को फुर्ती से सुलझाते हुए देखना अपने आप में खास था. इन लोगों ने साफ सुथरी पार्टी को घरों में बात किए जाने वाला आइडिया बनाया.

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अगर इस पार्टी में खतरे की घंटी बजाने की पूर्व नियोजित व्यवस्था थी तो इन लोगों का रंग उतरना सबसे पहली चेतावनी होनी चाहिए थी.

आप ने अपने मूल्यों को ताक पर रख दिया लेकिन असली नुकसान तब शुरू हुआ जब इस पार्टी ने शक्ति के समीकरण की खातिर अपने ही लोगों को भाव देना बंद कर दिया. आप ने जैसे ही ईमानदारी और सच्चाई से नाता तोड़ा तो उसके पतन का रास्ता खुल गया.

पार्टी को दूसरा नुकसान अपनी प्रयोगात्मक शैली की वजह से हुआ. भारतीय राजनीति में भ्रम को पसंद किया जाता रहा है. लोग दो प्रतिद्वंद्वी विचारों पर चर्चा करते हैं. वे इसे अव्यवस्था के तौर पर नहीं देखते.

चौराहों से लेकर मोहल्लों में लोग अड्डे लगाकर राजनीतिक अटकलबाजी के मजे लेते हैं, लेकिन एक वैकल्पिक और असंभव राजनीति के सपने पर सब भरोसा करते थे.

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देश के सक्रिय नागरिकों के असंभव विचारों की पंचायत के रूप में शुरू होने वाली 'आप' ने जल्द ही अपने आदर्शवाद की चमक खो दी.

काल्पनिकता से आदर्शवाद से होते हुए यथार्थवाद और कुटिलता पर उतरना काफी जल्दी हुआ. कसौटी अरविंद केजरीवाल थे. वे जिस साफ और सरल राजनेता वाली छवि को पेश करते हैं अब वह गायब हो चुकी है.

वे किसी तरह की नैतिक जिम्मेदारी लेने के संकेत नहीं देते. उनके चरित्र में जिस चीज़ को शालीनता के रूप में देखा गया, वो चीज दिखावा करने वाले लक्षण के रूप में बदल गई.

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दिल्ली में पार्टी की हार बीजेपी की जीत नहीं थी, बल्कि उन लोगों की हार थी जो अपने सपनों की दुनिया को लुटते हुए देखकर तंग आ चुके थे.

'आप' का गिरावट का ग्राफ आदर्शवादियों के गायब होने के साथ शुरू हुआ.

केजरीवाल का नैतिक करियर इसका तीसरा कारण था. उन्होंने एक 'लार्जर देन लाइफ' चरित्र के साथ अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया. उन्होंने इस बात को नहीं समझा कि वह लोगों के भरोसे का प्रतीक है. उन्हें जिस चीज ने इतना ताकतवर बनाया वो उनका चरित्र नहीं, बल्कि लोगों का उनके ऊपर भरोसा था.

इसी भरोसे को तोड़ते ही उन्होंने खुद के ग्राफ को कम कर लिया. हीरो से ज़ीरो बनने का उनका सफ़र काफी तेज़ था. एक नैतिक आदमी से भूसे के पुतले, विरोध प्रदर्शन के प्रतीक से असहनीय व्यक्ति बनने का सफर बेहद तेज था.

केजरीवाल ने सत्ता और शक्ति की जिम्मेदारी नहीं समझी. उन्हें अपनी महिलावादी आलोचकों के साथ थोड़ा विनम्र होना चाहिए था और नेतृत्व से जुड़ी जिम्मेदारी को साझा करने के लिए तैयार होना चाहिए था.

आखिरकार वह एक सामूहिक सपने के प्रतिनिधि थे. लेकिन इसे एक आत्ममोहक सपने में बदलकर केजरीवाल ने नैतिक कल्पना और पार्टी के कद को घटा दिया.

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उनका दूसरा अपराध था अपनी ही पार्टी में जारी भ्रष्टाचार से नज़रें फेर लेना. फर्जी डिग्री से केजरीवाल आसानी से बच सकते थे.

असल में इन्हीं लोगों ने केजरीवाल को दूषित कर दिया. और, जैसे ही पार्टी ने आंतरिक भ्रष्टाचार के मामलों पर नजरें फेरना शुरू कर दिया. वैसे ही यह पार्टी कांग्रेस और बीजेपी जैसी कोई पार्टी बन गई.

आप का पतन स्व: प्रेरित और आंतरिक था. पार्टी के दांव-पेचों और रणनीतियों पर जाने से पहले लोगों को ये समझना होगा. आप ने अपने ही वादों का गला घोंट कर स्व: पतन को न्योता दिया.

शिकायती स्वभाव

सबसे पहले तो केजरीवाल की स्टाइल में समस्या थी. किसी ने भी इससे पहले इतनी शिकायतें करने वाला नेता नहीं देख. उनके अस्थमा से लेकर तबियत खराब होने से जुड़ी चिंता उनकी राजनीति में आ गई.

वो एक तरह से वैकल्पिक राजनीति के शानदार बीज बनने की जगह शिकायतों की पोटली बन गए. उम्मीद की किरण की जगह एक पुरानी याद के हिस्से हो गए.

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Image caption दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ मनीष सिसोदिया

'आप' की अराजकता

शिक्षा से लेकर पर्यावरण तक उनके पास खराब रणनीतिकार थे. सिसोदिया को उप मुख्यमंत्री बनाने से कोई फायदा नहीं हुआ. आप में अराजकता बेहद ज्यादा थी.

'आप' ने अपने भड़कीले अंदाज में नगर निगम चुनाव में मतदाताओं को भ्रम में डाल दिया. बीजेपी ने इसका फायदा उठाया और अरविंद ने दोनों की परवाह नहीं की.

'आप' ने बीजेपी की बढ़ती प्रसिद्धि पर ध्यान नहीं दिया और न ही सुधार के बारे में सोचा. एक पूर्व राजस्व अधिकारी होने के बावजूद केजरीवाल ने किसी तरह के जिम्मेदार चरित्र का प्रदर्शन नहीं किया. 'आप' मतदाताओं के प्रति अपनी बड़ी जिम्मेदारी से भी बेपरवाह हो गई.

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नैतिक पतन से राजनीतिक मूर्खता तेज हुई. लेकिन सबसे ज्यादा खराब बात ये रही कि 'आप' अपनी ही पार्टी के पतन से बेपरवाह रही.

कुमार विश्वास इस पूरे घटनाक्रम में आखिरी एपिसोड हैं. कुमार विश्वास ने राजनीतिक कवि के रूप में अपनी शुरुआत की और ताकत बढ़ाने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा लिया.

'आप' ने जब ये कहा कि सब ठीक है तो ये भी बेहद खोखला है. आप में खोखलापन स्पष्ट है और पार्टी का खात्मा हो सकता है.

दुख की बात ये नहीं है कि 'आप' चुनाव में हार गई थी, बल्कि दुख की बात ये है कि लोगों के सपनों के साथ विश्वासघात हुआ है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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