नज़रिया: 'आम आदमी पार्टी की हत्या होगी या पार्टी आत्महत्या करेगी?'

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अगर कोई कहे अरविंद केजरीवाल घमंडी हो गए हैं, अगर कोई कहे कि वो सत्ता के लालची हो गए हैं, राजनीति में अवसरवादिता करते हैं तो मैं इन आरोपों को मान सकता हूं.

लेकिन अगर कोई कहे कि उन्होंने पैसा लिया, रिश्वत ली है, तो मैं कहूंगा कि भाई थोड़ा प्रमाण चाहिए. इसको मान लेने से पहले कुछ प्रमाण होना चाहिए.

राजनीति में ये संस्कार हो गया है कि जिसका आप विरोध करते हैं, उसके बारे में कुछ भी कह दें, कुछ भी स्वीकार कर लें, लेकिन ये मर्यादा नहीं हैं.

एक मंत्री महोदय ये कह दें कि कल तक जो मेरे मुख्यमंत्री थे, उन्हें अपनी आंखों से मैंने इतना पैसा लेते हुए देखा है, ये सामान्य परिस्थिति में भी गंभीर हो सकता है.

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लेकिन जिस तरह की वहां इस वक्त उथल पुथल चल रही है, जिस तरह से खुली और नंगी सत्ता की लड़ाई चल रही है, वैसी परिस्थिति में केवल किसी के कहने पर विश्वास करना, पर्याप्त नहीं होगा.

जो हो रहा है वो दुखद है

आम आदमी पार्टी में जो हो रहा है वो बहुत दुखद है. दुखद इसलिए है क्योंकि आम आदमी पार्टी ने तीन संभावनाएं जगाई थीं.

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पहली संभावना तो सच्ची और ईमानदार राजनीति की थी, जिसे दो साल पहले ही ख़त्म कर दिया गया था.

दूसरी संभावना सुशासन की थी, जिसे धीरे धीरे ख़त्म किया जा रहा है.

तीसरी संभावना एक उम्मीद की थी कि पार्टी नरेंद्र मोदी या वैसी शक्तियों का जमकर मुक़ाबला करेगी. वो संभावना भी पंजाब में ख़त्म हो गई. ऐसे सपने की मौत कुछ अच्छी तो नहीं ही लगेगी.

ऐसे में हम लोग जो न्यूनतम चीज़ कर सकते हैं, वो है कि आम आदमी पार्टी का जहाज भले ही डूब रहा हो, लेकिन हमें अपना संतुलन नहीं भूलना चाहिए. सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का संतुलन रखना होगा.

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त्रासदी इस वक्त यही है कि एक तरफ़ तो देश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी हर तरह के क़ानूनी और गैर क़ानूनी, वाजिब, गैर-वाजिब हथकंडों से आम आदमी पार्टी को ख़त्म करने पर तुली है.

ये लोकतंत्र में बिलकुल ग़लत चीज़ है, इसका विरोध होना चाहिए.

हत्या होगी या आत्महत्या?

लेकिन दूसरी तरफ़ आम आदमी पार्टी का नेतृत्व है, जो ख़ुद अपनी पार्टी को ख़त्म करने पर अमादा है.

दुर्भाग्य ये है कि आज बाज़ी इस बात की ही लगा सकते हैं कि हत्या पहले होगी या आत्महत्या पहले होगी. जो भी होगा बहुत दुखद होगा.

ये एक सपने की मौत होगी और एक सपने की मौत पर आप ताली नहीं बजा सकते हैं. उस पर आप जश्न नहीं मना सकते हैं.

सोच सकते हैं, अवसाद कर सकते हैं, सबक सीख सकते हैं, आगे बढ़ सकते हैं.

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वैकल्पिक राजनीति की जो संभावना आम आदमी पार्टी से पैदा हुई थी, उसको निस्संदेह बहुत बड़ा झटका लगा है. लेकिन ये कोई आज नहीं लगा है. ना पंजाब में हार से लगा है.

ये झटका तो उस दिन लगा जिस दिन आम आदमी के नेतृत्व पर ऐसे लोगों का कब्जा हो गया जिनकी ना तो विकल्प में दिलचस्पी थी और ना लोकतंत्र में कोई दिलचस्पी थी.

धक्का उस दिन लगा जिस दिन पार्टी ने ख़ुद ही लोकपाल को दरवाजा दिखा दिया. धक्का उस दिन लगा जिस दिन पार्टी ने 526 करोड़ रुपये का विज्ञापन बजट रख लिया और अपने राजनीतिक विज्ञापन शुरू कर लिए.

जब कोई ईमानदारी की बात करेगा

धक्का उस दिन लगा जब पार्टी को अपने मंत्रियों को एक के बाद एक करके करप्शन, दुराचार के आरोप में हटाना पड़ा.

तो धक्का एक दिन में नहीं लगा. अफ़सोस की बात ये है कि इस धक्के की सज़ा उन सब लोगों को भुगतनी पड़ती है, जिनका इससे कोई संबंध नहीं होता.

कहीं ना कहीं ये बाबा भारती और खड्ग सिंह का किस्सा हो गया है. लोगों को लगता है कि आने वाले दिनों में कोई ईमानदारी की बात करेगा तो लोग जल्दी भरोसा नहीं करेंगे.

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लेकिन दीर्घकाल में देखें तो इसे केवल धक्का नहीं मानना चाहिए. आम आदमी पार्टी के प्रयोग से हज़ारों नए लोग, हज़ारों कार्यकर्ता राजनीति में आए.

नए विचार भी आए. ये सबके सब आम आदमी पार्टी के जहाज़ में बैठ नहीं सकते थे.

अब ये जहाज डूबता है, कम से कम नैतिक रूप से तो ये डूब रहा है, तो लोग नए जहाज की तैयारी करेंगे. लोकतंत्र में, राजनीति में नए प्रयोग असफ़ल होते हैं, फिर नया प्रयोग होता है, ये सिलसिला चलता रहता है.

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जहां तक आम आदमी पार्टी में करेक्शन की कोई बात है, तो हम लोगों ने कभी वो रास्ता नहीं छोड़ा है, जहां हम रामलीला मैदान से चले थे. लोगों ने छोड़ा, फिसल गए, सिद्धांतों को तिलाजंलि दे दी.

हमारी तो मन की तैयारी है

हमने कठिनाई का रास्ता नहीं छोड़ा, आरामदेय रास्ता नहीं पकड़ा. दिल्ली के एमसीडी चुनाव में हम सफल नहीं हुए. लेकिन हमने ख़ुद से कठिन रास्ता चुना है, जिसे दुनिया लंबे समय तक असफलता कहेगी, लेकिन हमने अपने मन की तैयारी की है.

जिन लोगों को कुर्सी पसंद आ गई, थोड़ा आरामदेय लगने लगी, उन्हें सोचना है कि क्या दोबारा वो कठिन रास्ता पकड़ना है?

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दरअसल, राजनीति में सबसे बड़ी चुनौती होती है, जो शुभ है, सुंदर है, उसे आप व्यावहारिक और प्रभावी कैसे बनाएं. हमारे आज के लोकतंत्र में पैसे की भूमिका आ गई है.

उसमें मीडिया तंत्र की भूमिका आ गई है, दुर्भाग्य यही है कि मीडिया ख़ुद पैसे से जुड़ा है.

इनके चलते भले विचार, अच्छे लोग, सही मुद्दे, एक बहुत बड़े पैमाने पर कायम नहीं रह पाते. जिसके चलते उन्हें बार बार झटके लगते रहते हैं.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम उन प्रयोगों को छोड़ दें. दुनिया में अच्छाई को हक़ीकत बनाना, शुभ को सच बनाना, इस दुनिया की शाश्वत लड़ाई है.

राजनीति केवल उसका एक मैदान है. मैं बीते तीस सालों से ये लड़ाई लड़ रहा हूँ, अगले बीस साल भी यही करना पड़े तो क्या बुरा है?

(दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप नेता अरविंद केजरीवाल पर लगे आरोपों को उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने बेबुनियाद और अर्थहीन बताते हुए ख़ारिज कर दिया है.)

( अरविंद केजरीवाल की पार्टी के कभी अहम सदस्य रहे योगेंद्र यादव, अब स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. बीबीसी संवाददाताप्रदीप कुमार से बातचीत पर आधारित. ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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