सहारनपुर ग्राउंड रिपोर्ट: दलित-राजपूत टकराव

  • 8 मई 2017
राजपूत
Image caption राजपूतों के हमले के बाद दलितों के घर की यह तस्वीर

पिछले हफ़्ते सहारनपुर ज़िले के शब्बीरपुर गांव में दलितों के घर जलाए जाने के बाद भड़के जातीय संघर्ष से अब भी तनाव बना हुआ है. इस दलित बहुल गांव में राजपूतों का दबदबा है. राजपूतों ने महाराणा प्रताप की जयंती पर शोभायात्रा निकाली थी और इस दौरान हिंसक झड़प हुई थी.

आरोप है कि शुक्रवार को राजपूतों की एक भीड़ ने दलितों के 25 घर फूंक डाले. जय राजपूताना वाले गेट से थोड़ा पहले ही ऋषिपाल, राजपूत युवकों की एक टोली के साथ बैठे हैं.

ऋषिपाल आरोप लगाते हैं कि दलितों ने हंगामे का प्लान पहले से कर रखा था और उसके लिए पत्थर तक जमा कर रखे थे.

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बगल में बैठे राजकुमार कहते हैं, "राजपूत युवकों की टोली इधर से गुज़र रही थी जिसमें गांव के युवा भी शामिल हो गए. ऊंची आवाज़ वाले म्यूज़िक सिस्टम के साथ जब राजपूत नौजवानों की टोली शब्बीरपुर की गलियों से गुज़रने की कोशिश कर रही थी तो दलितों ने इस पर ऐतराज़ जताया."

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पुलिस ने मामले को सुलझाने की कोशिश की लेकिन इसी बीच कहीं से कुछ पथराव हुए और दलितों के 25 घर फूंक दिए गए. ख़बरें हैं कि शब्बीरपुर के दलितों ने महाराणा प्रताप जयंती यात्रा के गुज़रने पर गांव में तनाव होने की आशंका से प्रशासन को पहले ही अगाह किया था.

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प्रशासन ने माना है कि इस यात्रा के गांव से गुज़रने की आज्ञा राजपूत टोली के पास नहीं थीं. दलितों के जो 25 घर फूंके गए, उनमें से एक था कुसुम का घर- वहीं मौजूद हैं देशपाल सिंह, तीन घंटे तांडव जारी रहा जब पीएसी आई तब राजपूत वहां से गए.

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गांव की सड़क के किनारे पड़ने वाले दलितों के सभी घर कहीं न कहीं आग से प्रभावित दिखते हैं. कई घरों में अब भी कपड़े बिखरे नज़र आते हैं. चूड़ियों के टूटे टुकड़े भी दिखे. दलित और कथित ऊंची जाति वालों में तनाव पिछले कुछ महीने से जारी था. दलितों के ज़रिए आंबेडकर की प्रतिमा लगाए जाने का विरोध गांव में किया गया था.

देशराज कहते हैं कि दलित समाज ने रुपए दो रुपए जोड़कर प्रतिमा लगाने की कोशिश की लेकिन उसे राजपूतों ने सफल नहीं होने दिया.

कुसुम कहती हैं कि प्रतिमा के अलावा राजपूतों की दलितों से चिढ़ की एक और वजह गांव की प्रधान भी थी.

कुसुम कहती हैं, "गांव की प्रधानी पिछले 10 सालों से दलितों के पास थी जिससे गांव की ऊंची जाति वाले ख़ासे खफ़ा थे."

राजपूत युवक शक्ति की ये बात कि जबसे **र गांव का प्रधान बना है तब से गांव में राजनीति बढ़ गई है- इस बात को पुख़्ता करती नज़र आई.

पुलिस अधीक्षक रफ़ीक़ अहमद ने बताया कि इलाक़े के 15 गांवों में पुलिस की तैनाती की गई है क्योंकि ये सभी मिली-जुली आबादी वाले हैं, जहां तनाव का ख़तरा बना रहता है.

मेरठ यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रोफ़ेसर सतीश प्रकाश सवाल उठाते हैं कि संत रविदास के मंदिर में राजपूत और दूसरी ऊंची हिंदू जाति के लोग कबसे जाने लगे जो वो आंबेडकर की प्रतिमा प्रांगण में लगाए जाने का विरोध कर रहे थे.

सतीश प्रकाश इस मामले को एक राजपूत मुख्यमंत्री के लखनऊ की गद्दी पर बैठने से जोड़कर देखते हैं, योगी सरकार के बनने के तीन दिन के अंदर ही सूबे में कम से कम 14 ऐसे मामले आए जिनमें दलित ऊंची जाति के हिंदुओं के निशाने पर आए.

सतीश कहते हैं, "पहले जो मामले मुसलमान और हिंदू के नज़र आते थे वो अब उत्तर प्रदेश में ऊंची जाति के हिंदू और दलितों के बीच तब्दील हो गए हैं क्योंकि मुसलमान किसी मामले पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहे."

सहारनपुर और बुलंदशहर जैसे ज़िले मे दलितों की स्थिति आर्थिक तौर पर बेहतर रही है क्योंकि उनके पास ज़मीन है. महाराणा प्रताप जयंती का इस इलाके के गांव में होना नई बात है. सिमरान में इस बार इस आयोजन के प्रबंधक सहदेव सिंह ख़ुद मानते हैं कि वो इससे साल भर पहले ही जुड़े हैं.

अबतक महाराणा प्रताप से जुड़े आयोजन सहारनपुर जैसे ज़िला मुख्यालय में हुआ करते थे. हालांकि इन्हें अब गांवों तक ले जाने का मन बनाया गया है. जैसे इस साल ही महाराणा प्रताप से जुड़े आयोजन मुज़फ्फरनगर के अलावा हरियाणा के एक गांव में आयोजित किए गए हैं.

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