किसी की ज़िंदगी लेने में यक़ीन नहीं: बिलकीस बानो

  • 8 मई 2017
बिलकीस बानो इमेज कॉपीरइट chirantana bhatt

बिलकीस बानो के साथ 2002 में गुजरात दंगों के दौरान गैंग रेप हुआ और उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने परिवार के 14 लोगों का क़त्लेआम देखा.

15 साल से इंसाफ की लड़ाई लड़ रहीं बिलकीस को पिछले हफ़्ते गुरुवार को उस वक़्त सुकून मिला होगा जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने रेप और हत्या के मामले में 11 दोषियों की उम्रक़ैद की सज़ा बरकरार रखी.

कोर्ट ने इस मामले में पांच पुलिसकर्मियों और दो डॉक्टरों को भी दोषी पाया है. इन्हें पहले निचली अदालत ने सुनवाई के दौरान बेगुनाह पाया था.

इन सभी पर सबूतों को मिटाने के आरोप थे.

नहीं कहलाना बिलक़ीस बानो की औलाद

इमेज कॉपीरइट chirantana bhatt
Image caption बिलकीस बानो अपने बच्चों के साथ

'न्यायपालिका में यकीन'

बिलकीस बानो ने बीबीसी से कहा कि इस फ़ैसले के साथ इंसाफ मिला है और इसने उम्मीद जगाई है.

उन्होंने कहा, "मुझे हमेशा से न्यायपालिका में पूर्ण विश्वास रहा है. मैं इस फ़ैसले के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट की आभारी हूं. यह अच्छा फ़ैसला है. मैं इस फ़ैसले से खुश हूं."

उन्होंने आगे कहा, "मुझे लगता है कि राज्य सरकार और पुलिस दोनों ही इस गुनाह में शरीक है. गुनाहगारों को रेप और लूट-खसोट करने की पूरी छूट मिली हुई थी. कोर्ट ने पुलिस और डॉक्टर दोनों को दोषी बताया है. अब मुझे लग रहा है कि मुझे न्याय मिल गया है. उम्मीद है अब मुझे शांति मिल सकेगी."

बिलकीस बानो की इंसाफ की लड़ाई लंबी और भयावह थी, लेकिन उनका कहना है कि इस लड़ाई को छोड़ने के बारे में कभी भी नहीं सोचा.

सुनिए बिलकीस बानो से बातचीत

इमेज कॉपीरइट chirantana bhatt
Image caption बिलकीस बानो अपने पति और बच्चों के साथ.

'जान से मारने की धमकी भी मिली'

पुलिस और प्रशासन ने उन्हें रोकने के लिए सब कुछ किया. उन्हें डराया-धमकाया, सबूत मिटाए, मारे गए लोगों को बिना पोस्टमार्टम के दफ़ना दिया.

डॉक्टरों ने यहां तक कहा कि बिलकीस बानो का रेप नहीं हुआ था. उन्हें जान से मारने की धमकी भी मिली.

अपराध की गंभीरता और हमलावरों को पहचानने के बावजूद इस मामले में पहली गिरफ़्तारी 2004 में हुई.

यह गिरफ़्तारी तब हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को मामला सौंपा.

सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस मांग को भी माना कि गुजरात की अदालतों में उन्हें इंसाफ नहीं मिल सकता और केस को मुंबई की अदालत में भेज दिया.

इमेज कॉपीरइट chirantana bhatt

'दस बार घर बदलना पड़ा'

इंसाफ की इस लड़ाई में उनका परिवार बर्बाद हो गया. उन्हें और उनके पति याकूब रसूल को अपने पांच बच्चों के साथ गुजरात और गुजरात के बाहर 10 बार घर बदलना पड़ा.

उनके पति रसूल कहते हैं, "हम अब भी घर नहीं जा सकते हैं क्योंकि हम डरे हुए है. पुलिस और प्रशासन ने हमेशा हम पर अत्याचार करने वालों का साथ दिया है. जब हम गुजरात में होते हैं तो अब भी अपने चेहरे ढँक कर रखते हैं. हम कभी भी अपना पता किसी को नहीं देते हैं."

2002 में हुए गुजरात दंगों में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. इनमें से ज्यादातर मुस्लिम थे.

इन दंगों की शुरुआत गोधरा में 60 हिंदू तीर्थ यात्रियों की मौत के बाद हुई थी. इनकी मौत साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगने के कारण हुई थी.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इस ट्रेन में आग लगने के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया गया. इसकी प्रतिक्रिया में हिंदुओं की भीड़ ने गुजरात के कई शहरों में मुसलमान आबादी पर हमला कर दिया.

तीन दिनों तक दंगाइयों को कोई रोकने वाला नहीं था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने इस नरसंहार को रोकने के लिए कुछ नहीं किया.

लेकिन उन्होंने हमेशा सरकार की तरफ से किसी भी कोताही से इनकार किया और ना ही दंगों के लिए कभी कोई माफी मांगी.

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने साल 2013 में उन्हें दोषमुक्त कर दिया और कहा कि उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं है.

इमेज कॉपीरइट Reuters

'घर छोड़कर भागना पड़ा'

बिलकीस अब भी उन दिनों को याद कर के सहम जाती हैं. वो अपने मां-बाप के घर रंधिकपुर गई हुई थीं जो गोधरा के पास ही है.

उस वक्त वो 19 साल की थी और तीन साल की एक बेटी की मां थीं.

उस वक्त वो गर्भवती थीं और उन्हें दूसरा बच्चा होने वाला था.

वो उस दिन की घटना को याद करती हैं, "ट्रेन में आग लगने के बाद की अगली सुबह थी. मैं रसोई में थी और दोपहर का खाना बना रही थी. तब तक मेरी चाची और उनके बच्चे दौड़ते हुए आए. वो चिल्लाते हुए कह रहे थे कि उनके घर में आग लगा दी गई है. हमें जल्दी से जल्दी घर छोड़कर भागना पड़ेगा."

"हमने जो कपड़े पहन रखे थे, उन्हीं कपड़ों में हम बिना समय गंवाए भागे. यहां तक कि हमारे पास चप्पल पहनने तक का समय नहीं था."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कुछ ही मिनटों में आस-पास के सभी मुसलमान परिवार अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थान की तलाश में भाग खड़े हुए थे.

बिलकीस बानो अपने परिवार के 17 लोगों के साथ थीं. उनके साथ तीन साल की उनकी बेटी, एक गर्भवती चचेरी बहन, उनके छोटे भाई-बहन, भतीजियां और भांजे, और दो वयस्क पुरुष थे.

बिलकीस बताती हैं, "हम सबसे पहले गांव के सरपंच के पास सुरक्षा के लिए गए, लेकिन जब भीड़ ने सरपंच को भी मारने की धमकी देने लगे तो हम गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए."

अगले कुछ दिनों तक वो अपने परिवार के साथ गांव दर गांव भटकती रहीं. कभी मस्जिदों में तो कभी किसी हिंदू परिवारों के रहमो-करम पर वो भटकते रहे.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

तलवार और डंडों से हमला

ऐसे ही समय बीतता गया. तीन मार्च की सुबह जब वो बगल के एक गांव में जाने की तैयारी में थे. तब दो जीपों में सवार कुछ लोग आ धमके और उन पर हमला कर दिया.

बिलकीस बताती हैं, "उन्होंने हमारे ऊपर तलवार और डंडों से हमला कर दिया. उनमें से एक ने मेरी बेटी को मेरी गोद में से छीन लिया और उसे ज़मीन पर पटक दिया. वो सिर के बल पत्थर पर जाकर गिरी."

उन पर हमला करने वाले 12 लोग गांव के उनके पड़ोसी ही थे. वो हर रोज उन्हें देखते हुए पली-बढ़ी थीं.

उन लोगों ने उनके कपड़े फाड़ दिए और उनमें से कई उनके साथ बलात्कार करने के लिए आगे बढ़े. वो उनसे रहम की भीख मांगती रहीं.

वो उन लोगों से कहती रही कि वो पांच महीने की गर्भवती है लेकिन उन लोगों ने उनकी एक नहीं सुनी.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

उनकी बहन जिसने भागने से दो दिनों पहले ही एक लड़की को जन्म दिया था, उसके साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई. उसके नवजात बच्चे को भी मार दिया गया.

बिलकीस बच गईं क्योंकि वो बेहोश हो गई थीं और हमलावरों ने उन्हें मरा हुआ समझकर छोड़ दिया था.

जब वो होश में आईं तो उन्होंने ख़ुद को खून में सने पेटीकोट से ढँका और नज़दीक की एक पहाड़ी पर किसी तरह पहुंचीं. वहां एक गुफा में वो छिप गईं.

बिलकीस बताती हैं, "अगले दिन मुझे जब बहुत जोर की प्यास लगी तो मैं नीचे उतर कर एक आदिवासी गांव में पहुंची. पहले तो गांव वालों ने मुझे शक की नज़र से देखा और डंडों के साथ आए, लेकिन फिर मेरी मदद की. उनहोंने मुझे एक ब्लाउज दिया और शरीर ढकने के लिए दुपट्टा दिया."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

वहां उन्हें एक पुलिस जीप दिखी. गांव वाले उन्हें पुलिस स्टेशन ले गए जहां उन्होंने पुलिस के सामने अपनी आपबीती सुनाई.

वो बताती हैं, "मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं इसलिए पुलिसवालों को कही कि वो मेरी शिकायत पढ़ कर सुनाए लेकिन उन्होंने सुनाने से मना कर दिया और मेरे अंगूठे का निशान ले लिया. उन्होंने अपनी मर्जी से जो चाहा, लिखा. मैं सभी दंगाइयों को जानती थीं. मैंने पुलिस को उनके नाम बताए थे लेकिन पुलिस ने किसी का नाम नहीं लिखा."

अगले दिन उन्हें गोधरा के एक कैंप में भेज दिया गया. वहां उनकी मुलाकात अपने पति से हुई. वो उस कैंप में अगले चार-पांच महीने तक रहे.

पिछले कुछ दिनों से बिलकीस बानो के मामले की तुलना दिल्ली में 2012 में हुए निर्भया गैंगरेप से हो रही है. बिलकीस बानो मामले में फ़ैसले के एक दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली गैंगरेप मामले में चार दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई है.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption दिल्ली गैंग रेप के बाद दिल्ली के सड़कों पर होता विरोध प्रदर्शन.

क्या फांसी होनी चाहिए?

अब कई लोग यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या बिलकीस बानो के मामले में दंगाइयों को फांसी की सज़ा नहीं होनी चाहिए? क्या उनका मामला दिल्ली गैंगरेप के मामले से कम भयावह था?

बिलकीस बानो मामले में अभियोक्ता पक्ष ने तीन लोगों के लिए मौत की सज़ा मांगी थी.

बिलकीस बानो का कहना है कि वो बदले में यकीन नहीं रखती.

वो कहती हैं, "दोनों ही मामले एक जैसे भयावह थे. लेकिन मैं किसी की ज़िंदगी लेने में यक़ीन नहीं रखती. मैं उनके लिए मौत की सज़ा नहीं चाहती. मैं चाहती हूं कि वो पूरी ज़िंदगी जेल में बिताए. मैं उम्मीद करती हूं कि एक दिन उन्हें अपने गुनाहों का अहसास होगा कि कैसे उन्होंने छोटे-छोटे बच्चों को मारा और औरतों के साथ बलात्कार किया. मैं बदला नहीं लेना चाहती. मैं चाहती हूं कि उन्हें अहसास हो कि उन्होंने क्या किया है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे