नज़रिया: लालू की मुश्किल से नीतीश की चांदी?

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चारा घोटाला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी बाधा रही है.

इसी घोटाले के कारण लालू यादव को जेल जाना पड़ा, वे चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं और इसी वजह से उन्हें नीतीश कुमार की अगुआई में सरकार बनाने को तैयार भी होना पड़ा.

लालू यादव पर चलेगा आपराधिक साज़िश रचने का मामला- सुप्रीम कोर्ट

चारा घोटाला मामले में लालू को हाई कोर्ट का झटका

अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव पर आपराधिक मामला चलाने का आदेश दे दिया है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से बिहार की राजनीति में क्या असर पड़ेगा, ये आने वाले समय में पता चलेगा. ये बात ज़रूर है कि विपक्षी बीजेपी को ज़रूर एक मुद्दा मिल गया है.

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जब से बिहार में महागठबंधन की सरकार बनी है, विपक्षी भारतीय जनता पार्टी इसे ख़ारिज करती रही है. इस गठबंधन को अवसरवादी गठबंधन, मजबूरी का गठबंधन और पता नहीं क्या-क्या कहा गया.

क्या है चारा घोटाला जिसमें लालू पर चल रहा है केस?

बिहार में भाजपा और जनता दल (यू) के बीच गठबंधन का टूटना भाजपा के लिए मुश्किल भरा साबित हुआ है. लोकसभा चुनाव में भारी जीत करने वाली भाजपा विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हारी. नीतीश कुमार ने समय रहते बिहार की राजनीति की नस पकड़ ली और महागठबंधन कर लिया.

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ऐसा नहीं है कि पिछले एक-डेढ़ साल में इस महागठबंधन पर सवाल नहीं उठे हैं. जब सिवान के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन ने जेल से छूटने के बाद नीतीश कुमार को परिस्थितियों का मुख्यमंत्री कहा और उन्हें अपना नेता मानने से इनकार कर दिया, तो दोनों पार्टियों के रिश्ते थोड़े तल्ख़ हुए. लेकिन न तो लालू प्रसाद और न ही नीतीश कुमार ने इस आग को हवा दी.

भाजपा ने ज़रूर गठबंधन पर तीखा हमला किया. सुशासन की दुहाई दी और नीतीश पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाया. नीतीश कुमार ने कार्रवाई भी की. मामला सुप्रीम कोर्ट गया और शहाबुद्दीन तिहाड़ पहुँच गए. लेकिन महागठबंधन को कोई नुक़सान नहीं हुआ.

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इस साल के शुरू में जब बिहार की राजधानी पटना में प्रकाश पर्व का आयोजन हुआ तो सियासत भी ख़ूब गर्म हुई. सीएम नीतीश कुमार का पीएम नरेंद्र मोदी के साथ बैठना और फिर पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव का मंच पर जगह नहीं मिलना, ख़ूब चर्चा में रहा.

दरअसल ये सिर्फ़ एक उदाहरण है, जब बिहार में जनता दल (यू) और राष्ट्रीय जनता दल के बीच बने गठबंधन पर सवाल उठे. जब से बिहार में नीतीश कुमार ने लालू यादव के समर्थन से सरकार बनाई है, इस महागठबंधन पर गाहे-बगाहे सवाल उठते रहे हैं.

मसलन महागठबंधन अंतर्विरोध का गठबंधन है, परिस्थितियों का गठबंधन है और न जाने क्या-क्या. कई बार मामला गंभीर भी हुआ है. जानकारों की मानें तो नीतीश कुमार बयानबाज़ी से नाराज़ भी हुए हैं. लेकिन न कभी लालू प्रसाद यादव और न ही कभी नीतीश कुमार ने खुलकर एक-दूसरे पर सवाल उठाए हैं.

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बिहार के उप मुख्यमंत्री और लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव ऐसी पस्थितियों में सरकार के बचाव में ही उतरे हैं और दोनों पार्टियों के नेताओं के अलग-अलग राग को संभालने की भी कोशिश की है.

दरअसल बिहार में महागठबंधन शुरू से ही बीजेपी की आँखों की किरकिरी रहा है. बीजेपी को पता है कि अगर अगले लोकसभा चुनाव तक ये महागठबंधन अस्तित्व में रहा, तो बीजेपी पिछले लोकसभा चुनाव वाला करिश्मा दिखा पाएगी, इसमें शक है.

इसलिए बीजेपी इशारों-इशारों में लालू यादव के साथ गठबंधन तोड़ने की स्थिति में नीतीश को समर्थन देने की बात करती रही है. बिहार बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा कि नीतीश कुमार बीजेपी के साथ 17 साल रहे हैं और राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है.

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यानी बीजेपी नीतीश कुमार पर डोरे डालने का कोई मौक़ा नहीं गँवाती. बीजेपी की मजबूरी समझी जा सकती है. बिहार की राजनीति का ताना-बाना ऐसा है कि इस गठबंधन के रहते बीजेपी का बिहार में करिश्मा दिखाना मुश्किल लगता है. ये तो रही बीजेपी की बात.

दूसरी ओर बिहार की राजनीति के धुरंधर माने जाने वाले नीतीश के नज़रिए से देखें, तो सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले से गठबंधन में उनकी स्थिति और मज़बूत होगी.

राजद का एक तबका गाहे-बगाहे नीतीश के नेतृत्व पर सवाल उठाता रहा है. पार्टी के सीनियर नेता रघुवंश प्रसाद सिंह कई महीनों से ये मोर्चा खोले हुए हैं.

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परिस्थितियों ने जब भी गठबंधन पर सवाल उठाया है, तो रघुवंश बाबू ख़ूब मुखर हुए हैं. लेकिन चारा घोटाला मामला लालू यादव को नीतीश कुमार से हाथ मिलाने को मजबूर कर रहा है.

बिहार विधानसभा चुनाव में राजद ने सबसे ज़्यादा सीटें जीती थीं. नतीजे आने के बाद भी ये सवाल उठे थे कि राजद को बड़ी पार्टी होने के नाते मुख्यमंत्री का पद मिलना चाहिए.

लेकिन नीतीश मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार थे और लालू प्रसाद यादव मजबूर थे. उन्हें भी पता था कि वर्षों से बिहार की राजनीति से सरक चुकी उनकी ज़मीन को अगर मज़बूत करना है, तो नीतीश के नेतृत्व में सरकार ही एकमात्र रास्ता है.

अब सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले से महागठबंधन में नीतीश और मज़बूत होंगे. लालू यादव जब-जब कमज़ोर पड़ेंगे, तब-तब राजद खेमे से नीतीश के नेतृत्व पर उठने वाले सवाल की धार भी कम होगी.

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