'आप का विश्वास' क्यों डगमगा रहा है?

  • 10 मई 2017
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अन्ना आंदोलन से आठ साल पहले की बात है. नोएडा स्टेडियम में एक छोटे से कवि सम्मेलन का संचालन एक दुबला-पतला नौजवान कर रहा था. उसकी ठिठोली और नुक़्ताचीनी काव्य पाठ से ज़्यादा पसंद की जा रही थी. ख़ुद पर भी व्यंग्य करते हुए वह कहता था, 'मेरी त्वचा से मेरी उम्र का अंदाज़ा नहीं लगता.'

कॉलेज के छात्र जैसे दिखने वाले डॉक्टर कुमार विश्वास नाम कमाएँगे ये तो दिखने लगा था लेकिन सियासत की राह लेंगे इसका अंदाज़ा तब नहीं था.

मंच के 'विश्वास'

अन्ना आंदोलन से पहले मंचों पर कुमार विश्वास अधिक लापरवाह दिखते थे.'कोई दीवाना कहता है' तब वायरल नहीं हुई थी और वह 'बस्ती बस्ती घोर उदासी, पर्वत पर्वत ख़ालीपन' ज़्यादा सुनाया करते थे. लेकिन उन्हें असल लोकप्रियता उनकी हाज़िरजवाबी और लतीफ़ों से मिल रही थी, जिनकी आंच से न सोनिया गांधी सुरक्षित थीं, न अटल बिहारी वाजपेयी.

लोगों को हंसाने के कुमार के कुछ तय फॉर्मूले थे. मंच पर अगर कोई वृद्ध कवि, मसलन संतोष आनंद मौजूद हों तो वह कहते थे, 'संतोष आनंद जी को ध्यान से सुन लीजिएगा. हमारा क्या है, हम तो अगले साल भी आ जाएंगे.'

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जब तक श्रोता कुछ सेकेंड लगाकर इसे समझते और हंसना शुरू करते, कुमार अपनी हास्य प्रतिभा पर मुस्कुराते हुए कहते, 'कोई बात नहीं, आप इस पर परसों भी हंस सकते हैं.' कविता के मंचों पर थोड़ी-बहुत छेड़छाड़ चला करती है, लेकिन इसे धृष्टता की श्रेणी में रखा जा सकता था. कई बार बुज़ुर्ग कवि नाराज़ भी हो जाते थे. लेकिन अपने भाषाई कौशल से कुमार उन्हें मना लेते थे.

संतोष आनंद को नाराज़ करने के बाद जब कुमार ने उन्हें कविता पढ़ने के लिए बुलाया तो कहा, 'मैं अभी विदेश में कवि सम्मेलन पढ़कर आया हूं. हम लोग उस दौर के कवि हैं, जब हमें बिकना अच्छा आता है. संतोष आनंद जी उस दौर के कवि हैं, जब उन्हें लिखना अच्छा आता है. एक बार ज़ोरदार तालियों से स्वागत कीजिए....'

कुमार के विचार

कुमार तब भी राष्ट्रवादी थे, जो कि अब भी हैं. हैरत की बात है कि श्रृंगार की कविताओं के बीच में वह पाकिस्तान पर अपने चुटकुलों को किस तरह फिट कर लेते थे. धीरे-धीरे इल्म हुआ कि यह कवि राष्ट्रवादी मिज़ाज की गंभीर राजनीतिक टिप्पणियां भी करता है, लेकिन अपने स्वभाव में 'कुछ अतिरिक्त देसी' है.

दक्षिण भारतीय नर्सों के रंग पर उनकी टिप्पणी सवालों के घेरे में रही. उन्होंने 'चौधरियों' की अंग्रेज़ी पर चुटकुले सुनाए. कई बार मंचों से उन्होंने ख़ुद को 'ब्राह्मण पुत्र' कहा, जिसका यह अर्थ भी निकाला गया कि वह जातिगत श्रेष्ठता को मानते हैं इसलिए ज़्यादातर वामपंथियों और नारीवादियों ने उन्हें कभी पसंद नहीं किया.

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साहित्यिक पत्रिका 'पाखी'को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, 'हमारे सपनों तक हमारे अतीत, हमारे बचपन का साया है. (शुरुआत में) मुझ तक जो सूचनाएं आईं उनमें दक्षिणपंथी प्रभाव बहुत ज़्यादा था. मेरे चारों तरफ यही लोग थे. लेकिन मैं 'हंस' भी पढ़ रहा था तो एक दूसरी चेतना भी समानांतर सक्रिय थी.'

कुमार विश्वास पहले विश्वास शर्मा थे. पिलखुआ के एक प्राध्यापक के बेटे, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर हिंदी साहित्य पढ़ने चला आया था. 'कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना' विषय पर पीएचडी की और कॉलेज में पढ़ाने लगे. यूट्यूब का चलन बढ़ा तो इंजीनियरिंग के खोजी लड़कों ने ही उन्हें सितारा बना दिया. तब कुमार कहने लगे, 'हम पहले चिरकुटों में खोजे जाते थे. अब ऑर्कुट में खोजे जाते हैं.'

यह सवाल निराधार नहीं था कि राष्ट्रवाद के लिए प्रतिबद्ध एक कवि देश के सबसे ताकतवर राष्ट्रवादी नेता नरेंद्र मोदी का विरोधी कैसे हो सकता है? एक समय वह विरोधी थे भी नहीं.

15 सितंबर 2009 को गुजरात के एक कवि सम्मेलन में कुमार ने नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में न सिर्फ उनकी तारीफ़ की, बल्कि उनके प्रधानमंत्री बनने की कामना भी कर डाली थी.

इसके बाद उन्होंने बाल कवि वैरागी की एक कविता पढ़ी, जिसकी आख़िरी पंक्ति थी,

'तब-तब मुझको लगता है कि यह ये जीवन जी लेंगे

और नीलकंठ की तरह यहां का सारा विष पी लेंगे'

नरेंद्र मोदी पर नरमी?

इसी कवि सम्मेलन में कुमार ने कहा, 'मैं पाकिस्तान गया था वहां आपके मुख्यमंत्री (मोदी) बड़े लोकप्रिय हैं. वहां किसी को कब्ज़ हो जाए तो हक़ीम दवा नहीं देता, इनका पोस्टकार्ड साइज़ फोटो दे देता है. इतनी लोकप्रिय टैबलेट देखी है आपने कहीं.' यह सुनकर श्रोता पंक्ति में सबसे आगे बैठे नरेंद्र मोदी मुंह पर हाथ रखकर हंसते रहे.

और फिर कुमार ने वह विस्फोटक बात कही, जिस पर आज वह शायद अफसोस करते हों. उन्होंने कहा, 'मोदी जी, मैं आपको बता रहा हूं आपका भविष्य उज्ज्वल है. दिल्ली में तो आप बैठोगे ही, मुझे पता है. कहा जाता है कि कवि की जिह्वा पर 24 घंटे में एक बार सरस्वती बैठती है और ईश्वर करे कि इस क्षण मेरी जिह्वा पर सरस्वती बैठी हो.'

यही कुमार विश्वास तीन साल बाद एक ऐसी पार्टी के शीर्ष चेहरों में थे, जिसे कांग्रेस के पतन के दौर में सबसे मुखर मोदी विरोधी पार्टी कहा गया. लेकिन कुमार के पुराने बयान कभी भुलाए नहीं जा सके.

'आप' बनने के बाद कुमार मोदी पर हमलावर हो गए. जब मीडिया ने उन्हें उनका पुराना बयान याद दिलाया तो वह बोले, 'मैंने 2009 के एक कवि सम्मेलन में उनकी तारीफ की. वह एक शुभ अवसर था. मुझसे आप पूछिए मैं स्वीकार कर रहा हूं. तब तक राजनीति में कोई बेहतरी थी नहीं. राजनाथ सिंह को सांसद बनाने में एक वोट मेरा भी है.'

बाद के दिनों में वह नरेंद्र मोदी और भाजपा पर हमलावर होते गए. 'पाखी' को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, 'नरेंद्र मोदी हिंदू राष्ट्रवादी हैं. मैं राष्ट्रवादी हिंदू हूं. मैं पहले राष्ट्रवादी हूं. यदि आज देश की सामरिक सुरक्षा मेरे हिंदू होने से प्रभावित होगी तो मैं हिंदू धर्म छोड़ दूंगा. मैं बिना धर्म के रह सकता हूं. मेरे लिए देश पहले है.'

उन्होंने एक से अधिक मौकों पर कहा कि मुझे दुख है कि मेरा प्रधानमंत्री ट्विटर पर उन लोगों को फॉलो करता है जो महिलाओं को मां-बहन की गालियां देते हैं.

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अन्ना आंदोलन से जुड़ाव

अन्ना के आंदोलन में जो ज़बरदस्त भीड़ आई, उसका अंदाज़ा न अन्ना को था, न केजरीवाल को. अलग-अलग विधाओं के लोकप्रिय चेहरों को आंदोलन से जोड़ा जा रहा था. कुछ इस मंच पर स्वत: आए और कुछ लाए गए.

कुमार विश्वास को उनके बचपन के दोस्त मनीष सिसोदिया आंदोलन में लेकर आए. कुमार एकाधिक मौकों पर कह चुके हैं कि मनीष से उनकी दोस्ती, उनकी उम्र के बराबर ही है. पहली कक्षा में दोनों का परिचय हुआ था.

कुमार ने 2015 में 'आज तक' को बताया था, 'जब मेरी बेटी होनी थी तो मैं यहां नहीं था. तब मनीष और भाभी ही मेरी पत्नी को अस्पताल ले गए थे. ऐसे ही जब मनीष के बेटा होने वाला था, तब वह असम में था. तब मैं अस्पताल में रहा था.'

कुमार को अन्ना के मंच पर लाने के पीछे दोस्ती तो थी ही, इसकी एक रणनीतिक वजह भी थी क्योंकि कुमार अपने गीतों, भाषण और टिप्पणियों से काफी भीड़ खींच सकते थे. मनीष ने ही कुमार को केजरीवाल से मिलवाया. 'टीम अन्ना' को एक बढ़िया मंच संचालक मिल गया, जो जंतर मंतर पर 'होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो' गाता था और किरण बेदी एक विशालकाय तिरंगा लहराती थीं.

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पार्टी में जगह

जब केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला किया तो अन्ना इससे अलग हो गए. लेकिन कुमार विश्वास ने ज़्यादा चौंकाया. वह पार्टी के स्थापना मंच पर आए और कह गए कि वह इस पार्टी के साथ नहीं हैं लेकिन बाद में उन्हें मनाकर पार्टी में ले लिया गया.

इसके बावजूद पार्टी के भीतर और बाहर भी, उनके पाला बदल लेने का एक डर बना रहा. उनसे 'तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर' वाले सवाल पूछे जाते रहे. जिस आप को शुरू में दिल्ली में वामपंथी पार्टियों ने समर्थन दिया, जिसके पक्ष में बहुत सारे वामपंथी बुद्धिजीवी रहे, जिसने लोकसभा चुनावों में बड़े पैमाने पर गांधावादियों को टिकट दिया, वहां कुमार विश्वास कई लोगों की आंखों में खटकते रहे. अपने विचारों और अतीत की वजह से वह शक की निगाह से देखे गए.

हालांकि पार्टी बनने के बाद कुमार की लोकप्रियता और कवि के तौर पर उनकी कमाई भी बढ़ी. वह गर्व से कहने लगे कि मैं हिंदी का सबसे महंगा कवि हूं. मैं सारे टैक्स भरता हूं. अच्छे कपड़े पहनता हूं. क्या यह अपराध है?

लेकिन पार्टी में कुमार की भूमिका कभी स्टार प्रचारक से आगे नहीं बढ़ी. पद के नाम पर उनके पास राष्ट्रीय कार्यसमिति और राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) की सदस्यता भर रही.

क्या कुमार की अनदेखी की गई? इसमें दो मत हैं. कुछ मानते हैं कि कुमार विश्वास जानबूझकर पार्टी के रोज़मर्ऱा के कामों से अलग रहना चाहते थे, क्योंकि वह कविता के मंचों से दूर जाने का जोखिम 'मन और धन' से नहीं ले सकते थे. जबकि पार्टी को उस दौर में ऐसे नेताओं की ज़रूरत थी जो अपना पूरा समय दे सकें.

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कुछ लोग मानते हैं कि कुमार की इस इच्छा से पार्टी को ज़रा भी आपत्ति नहीं हुई और उन्हें बड़े फैसलों और अंदरूनी मंत्रणा से वंचित रखकर पार्टी प्रसन्न ही रही. कुमार ज़रूरत से ज़्यादा बेबाक और लोकप्रिय थे और ताकत मिलने पर सार्वजनिक जीवन में और ज़्यादा लोकप्रियतावादी हो सकते थे. एक नई पार्टी सिर्फ एक ही 'अत्यंत लोकप्रिय' नेता को बर्दाश्त कर सकती थी.

हालांकि राजनीतिक चेहरा बनने के बाद जो बड़ा परिवर्तन कुमार के व्यक्तित्व में आया कि वह कुछ संभलकर बोलने लगे. जो लोग उन्हें पुराने वीडियोज के आधार पर स्त्री विरोधी, मुस्लिम विरोधी, भाजपा प्रेमी और आरक्षण विरोधी बताते थे, उन्हें बाद के वर्षों में कुमार ने ज़्यादा मौक़े नहीं दिए. इससे वे आरोप ख़त्म तो नहीं हुए पर थोड़े समय के लिए कालीन के नीचे ज़रूर चले गए.

जब 2013 के दिल्ली चुनावों के नतीजे आ रहे थे कुमार भी केजरीवाल के साथ पार्टी दफ्तर पर मौजूद थे. शुरुआती रुझानों से उत्साहित कुमार माइक पर बार-बार अपने प्रत्याशियों के भारी अंतर से आगे चलने की ख़बरें सुनाते और नीचे खड़े कार्यकर्ताओं की भीड़ जोश से भर उठती. इस चुनाव में पार्टी ने 28 सीटें जीती थीं.

2015 के दिल्ली चुनावों से पहले मुस्लिम बहुल इलाकों में भी कुमार की सभाओं में ख़ासी भीड़ आई. 67-3 से मिली रिकॉर्ड जीत का जश्न मनाने के लिए इस बार भी वह केजरीवाल के साथ मौजूद थे.

नाराज़गी की शुरुआत

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जो अमेठी की हार से भी नहीं हुआ, वह पंजाब चुनाव से शुरू हो गया. पंजाब में 'आप' के लिए सबसे उपजाऊ ज़मीन थी और कुमार को वहां भी स्टार प्रचारक बनाकर भेजा गया था. लेकिन आप विरोधी मशीनरी ने कुमार का एक वीडियो वायरल करवा दिया, जिसमें वह भिंडरावाले के लिए तीखे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे.

'आप' के पंजाब प्रभारी संजय सिंह और दुर्गेश पाठक को लगा कि धार्मिक मुद्दों पर बेहद संवेदनशील पंजाब में कुमार की मौजूदगी नुकसान पहुंचा सकती है. इसलिए उन्हें फिलहाल पंजाब से दूर रहने को कह दिया गया. यहां से कुमार की नाराज़गी शुरू हुई.

पंजाब चुनावों से लेकर दिल्ली एमसीडी चुनावों तक कुमार ने बड़े आप नेताओं को रिट्वीट करना छोड़ दिया. इसी बीच उनका 'वी द नेशन' वाला वीडियो आया, जिसमें उन्होंने मोदी और राहुल के साथ-साथ अरविंद केजरीवाल पर भी छिटपुट तीर चलाए. उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने की आलोचना की.

एमसीडी मतदान वाली सुबह कुमार ने ट्विटर पर 'स्वच्छ राजनीति' के लिए वोट देने की अपील ज़रूर की, पर किसी पार्टी का नाम नहीं लिया. चुनाव के बाद क्या हुआ, आप जानते हैं.

व्यक्तित्व और भविष्यवाणियां

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कुमार विश्वास ने सार्वजनिक जीवन में जो कुछ हासिल किया है, आम आदमी पार्टी उसका एक हिस्सा भर है. वह कई मौक़ों पर कह चुके हैं कि पार्टी उनके लिए सब कुछ नहीं है.

वह अपने विचार, अपने स्टैंड को लेकर स्वाभिमानी हैं, भावुक भी हैं. उन्हें आदेशों का पालन भी ख़ास पसंद नहीं इसलिए जहां उनका 'अहम्' टकराव की आख़िरी सीमा पार कर जाएगा, जहां वह उपेक्षित या अपमानित महसूस करेंगे, वहां से वह विदा ले सकते हैं.

जो 'पारंपरिक राजनीतिक कौशल' कहा जाता है, कुमार अब तक उसमें स्वयं को सिद्ध नहीं कर पाए हैं. वह अब तक अल्पकालिक राजनेता ही ज़्यादा रहे. किसी भी पार्टी से ज़्यादा 'अपने राष्ट्रवाद' और उन प्रशंसकों के लिए वफ़ादार नज़र आते हैं जो बीते दो दशकों में उन्होंने कमाए हैं. फेसबुक पर उनके 33 लाख और ट्विटर पर 20 लाख फॉलोअर हैं.

इसलिए अरविंद केजरीवाल पर उनके क्षणिक सुतली बम ज़्यादा चौंकाते नहीं हैं. कुमार अपनी छवि को लेकर बहुत सतर्क रहे हैं और हाल के वर्षों में यह सतर्कता बढ़ी ही है. वह गर्व से बताते हैं कि वह रियलिटी शोज के प्रस्ताव कई बार ठुकरा चुके हैं. वह गर्व से बताते हैं कि उन्होंने 'बिग बॉस 8' में बुलाए जाने पर उन्होंने शो के निर्माताओं से 21 करोड़ रुपये शहीदों के विधवा कोश में जमा कराने की शर्त रखी थी.

'एबीपी न्यूज़' के कार्यक्रम में पत्रकार अभय दुबे ने कुमार से पूछा था कि आपके अतीत या आचरण में ऐसा क्या है कि भाजपा को आप अनुकूल संभावना लगते हैं?

राष्ट्रवाद

कुमार ने जवाब दिया था, 'हिंदुस्तान में आज भी राष्ट्रवाद चलता है. चौराहे पर 'भारत माता की जय' बोलो, लोग इकट्ठे होते हैं. भाजपा को लगातार ख़तरा और स्नेह दोनों बने रहते हैं. कि इस पार्टी में ये एक व्यक्ति ऐसा है जो हमारे उन्हीं मर्मस्थलों पर प्रहार करता है, जो छद्म हमारा है.'

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न्यूज़ 24 पर मोदी सरकार के दो साल पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, 'उस पाठशाला का एजेंडा ही ये है कि भारत को एकता नहीं चाहिए, एकरूपता चाहिए. कांग्रेस ने इतने वर्षों तक 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द के साथ जो बदतमीज़ियां कीं, वहीं अभद्रताएं 'राष्ट्रवाद' के साथ भाजपा ने कीं. मैं दावा करता हूं कि भाजपा का कोई मंत्री ऋग्वेद की वह ऋचा बता दें, जहां से 'राष्ट्रवाद' शब्द आया है. ये अनपढ़ों और कुपढ़ों की लड़ाई है.'

हालांकि अब राष्ट्रवाद के मसले पर उनके केजरीवाल से ख़ास मतभेद नहीं हैं. सिर्फ इसके सही परिमाप को लेकर है. केजरीवाल की पार्टी भी एक 'धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी' विकल्प की ओर बढ़ रही है जो कश्मीर और सेना पर सवाल नहीं उठाती, लेकिन इन मुद्दों पर नरेंद्र मोदी को घेरने से नहीं चूकती.

कुमार संभवत: राष्ट्रवाद की इस मात्रा के साथ काम चला लेंगे, लेकिन वह पार्टी में थोड़ा सम्मान ज़रूर चाहते हैं. अमानतुल्लाह को हटाने के लिए वह जिस तरह अड़े, उससे यही सिद्ध हुआ. कुमार को अतिरिक्त उपहार के तौर पर राजस्थान का प्रभारी बना दिया गया. लेकिन जानने वाले जानते हैं कि यह कोई पद नहीं है. सिर्फ कुमार को पार्टी में सक्रिय रखने के लिए यह काम दिया गया.

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