कौन हैं CJI को सज़ा सुनाने वाले जस्टिस करनन?

  • 8 मई 2017
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भारत के चीफ़ जस्टिस समेत सुप्रीम कोर्ट के सात न्यायाधीशों को पांच साल की सज़ा सुनाने वाले कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सी एस करनन पिछले कुछ समय से ख़बरों में रहे हैं.

दलित होने के कारण प्रताड़ना का शिकार होने का आरोप लगाने वाले जस्टिस करनन ने कहा है कि इन जजों ने एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध किया है.

हालांकि उनके पास ऐसा करने का न्यायिक अधिकार नहीं है क्योंकि उनके न्यायिक और प्रशासनिक काम करने पर रोक लगा दी गई है. लेकिन वो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से भिड़ने को लेकर अक्सर सुर्खियां बटोरते हैं.

कौन हैं जस्टिस करनन

कुछ महीने पहले जस्टिस करनन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था.

जस्टिस करनन ने प्रधानमंत्री को 20 जजों की सूची दी थी, जिन पर उन्होंने 'भ्रष्टाचार' का आरोप लगाया है. न्यायमूर्ति करनन का विवादों से सामना होता रहा है.

मद्रास हाई कोर्ट से न्यायमूर्ति करनन का जब कलकत्ता हाई कोर्ट तबादला हुआ तो उन्होंने ख़ुद ही इस पर रोक लगा ली. इतना ही नहीं उन्होंने अपने चीफ़ जस्टिस को ही नोटिस जारी कर दिया था.

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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा और फ़रवरी 2016 के बाद दिए गए उनके सभी निर्देशों पर रोक लगा दी गयी. फिर राष्ट्रपति के निर्देश के बाद उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में अपना पदभार संभाला.

मद्रास हाई कोर्ट का जज रहते हुए न्यायमूर्ति करनन ने सबको अचंभे में तब डाल दिया था, जब उन्होंने अपने साथी जजों पर गाली देने का आरोप लगाया था. उन्होंने अनुसूचित जाति और जनजाति के राष्ट्रीय आयोग में जजों के ख़िलाफ़ शिकायत भी की थी.

भेदभाव का आरोप

उन्होंने एक जज पर जूते से छूने का आरोप भी लगाया था.

यह आरोप उन्होंने अपने चेंबर में संवाददाता सम्मलेन आयोजित कर लगाया था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके साथ जजों का भेदभाव इसलिए हो रहा था क्योंकि वो एक दलित हैं.

न्यायमूर्ति करनन एक बार फिर चर्चा में तब आए, जब उन्होंने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि दो वयस्कों के बीच अगर शारीरिक संबंध हो तो उन्हें पति-पत्नी के रूप में देखा जाना चाहिए.

दिमाग़ी हालत की जाँच

एक मई को सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सीएस करनन की दिमागी हालत की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड के गठन के आदेश दिए. लेकिन जस्टिस करनन ने ये जांच नहीं होने दी थी.

साथ ही सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश में कहा गया कि अगर जस्टिस करनन कोई जवाब दाख़िल नहीं करते तो सर्वोच्च न्यायालय मान लेगा कि उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं है.

बेंच ने अपने पहले के उस आदेश का ज़िक्र किया जिसमें जस्टिस करनन को प्रशासनिक और न्यायिक अधिकार इस्तेमाल करने से रोक दिया गया था.

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इससे पहले बेंच ने देश की सभी अदालतों, ट्रिब्यूनल और आयोगों को निर्देश किया था कि आठ फ़रवरी के बाद जस्टिस करनन के दिए गए आदेश न माने जाएं.

बेंच में जस्टिस दीपक मिश्रा, जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, एमबी लोकुर, पीसी घोषण और कूरियन जोसेफ़ शामिल थे.

इससे पहले जस्टिस करनन सर्वोच्च न्यायालय के सामने पेश हुए थे और अपने न्यायिक और प्रशासनिक अधिकारों से रोक हटाने की मांग की थी. कोर्ट के इनकार करने के बाद उन्होंने दोबारा पेश होने से मना कर दिया.

क्या था मामला

असल में जस्टिस करनन ने मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के ख़िलाफ़ कई चिट्ठियां लिखी थीं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसका स्वतः संज्ञान लिया. इसके बाद उन्हें अवमानना का नोटिस दिया गया.

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भारतीय अदालती इतिहास में पहली बार किसी जज को सुप्रीम कोर्ट के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़ा था. बेंच ने उनसे कहा था कि जस्टिस करनन बिना शर्त माफी मांगें और अपनी पहले लिखी चिट्ठियों को वापस लें.

इसके बाद उन्हें कई सम्मन जारी किए लेकिन वो जानबूझकर पेश होने नहीं गए.

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