कला के मैदान की पुरानी खिलाड़ी हूँ: मधु किश्वर

  • 9 मई 2017
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सामाजिक कार्यकर्ता मधु किश्वर को जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी की अकादमिक परिषद का सदस्य घोषित किया गया है. इसका कैंपस में कुछ लोगों ने कड़ा विरोध किया है.

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उनकी नियुक्ति कला और सौंदर्यशास्त्र स्कूल के लिए हुई है जो आम तौर से दो साल के लिए की जाती है. इसमें 135 सदस्य होते हैं जिनमें से एक यूनिवर्सिटी से बाहर का होता है.

कला और सौंदर्यशास्त्र स्कूल के कुछ अध्यापक मधु किश्वर की नियुक्ति का विरोध दो कारणों से कर रहे हैं. उनके अनुसार कुलपति को बाहर वाली हस्तियों के जो छह नाम दिए थे, उनमें मधु किश्वर का नाम नहीं था.

दूसरी आपत्ति ये है कि अध्यापकों के मुताबिक मधु किश्वर का कला और सौंदर्यशास्त्र से कोई लेना-देना नहीं. इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने मधु किश्वर का विरोध करने वालों में से एक विष्णु प्रिया दत्त के हवाले से कहा कि "जो लिस्ट हमने भेजी थी उसमें मधु किश्वर का नाम नहीं था क्योंकि कला से उनका कोई लेना देना नहीं".

जेएनयू की छात्रा रही हैं

मधु किश्वर ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि उनकी नियुक्ति से कोई विवाद खड़ा होने का मतलब नहीं.

उन्होंने कहा कि वो जेएनयू की छात्रा रह चुकी हैं और लोग हर बात पर विवाद खड़ा कर देते हैं.

काउंसिल की सभा के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने बीबीसी को बताया कि वो इस नियुक्ति के लिए पूरी तरह से योग्य हैं.

मधु किश्वर एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो बीजेपी की क़रीबी समझी जाती हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समर्थन में कई बार बयान दिए हैं.

मधु किश्वर का कहना था कि उन्होंने अब तक 12 डॉक्यूमेंट्री बनाई हैं और बॉलीवुड पर एक किताब लिख रही हैं. उनके अनुसार कला के मैदान में वो एक पुरानी खिलाड़ी हैं.

मोदी की समर्थक

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मधु किश्वर की नियुक्ति जेएनयू के कुलपति जगदीश कुमार ने की है. इस नियुक्ति का विरोध करने वालों के अनुसार कुलपति को इस नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं.

लेकिन जेएनयू रेक्टर प्रोफेसर चिंतामणि महापात्र कहते हैं कि कुलपति को बाहर के उमीदवार को नियुक्त करने का पूरा अधिकार है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि कुलपति सिफारिश किए गए नामों को ख़ारिज कर सकते हैं और किसी दूसरे नाम को नियुक्त कर सकते हैं. उन्होंने कहा,"कुलपति ने क़ानून तोड़ा नहीं इसका पालन किया है."

मधु किश्वर ने महिलाओं के मुद्दों पर कई लेख लिखे हैं. वो राजनीति पर भी अक्सर लिखती रहती हैं. उन्होंने अपने मैगज़ीन मानुषी में मोदीनामा के नाम से कई लेख लिखे, जिसमें उन्होंने 2002 में गुजरात दंगों के सिलसिले में नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वालों को आड़े हाथों लिया था.

बाद में उन्होंने इन लेखों को मोदी, मुस्लिम और मीडिया नामी किताब की शक्ल में छापा .

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