नज़रिया: केजरीवाल की कितनी प्राण रक्षा करेगी ईवीएम?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

आम आदमी पार्टी ने रिश्वतखोरी के आरोपों से मुँह मोड़ने के लिए ईवीएम की गड़बड़ी का रास्ता अपनाकर अपरिपक्व समझ का परिचय दिया है. साफ़ है कि पार्टी बचकर भागना चाहती है. देश के बड़े उद्योगपतियों, राजनेताओं और भ्रष्टाचारियों को चुनौती देने वाली पार्टी की यह राजनीति समझ से बाहर है.

परम्परागत की राजनीति की नक़ल और वही लटके-झटके. एमसीडी के चुनाव परिणाम आने के पहले से अरविंद केजरीवाल ने ईवीएम का नाम लेना शुरू कर दिया था. अब जब उनपर भ्रष्टाचार का आरोप लगा तो वे फिर ईवीएम की शरण में चले गए हैं. ईवीएम कितनी प्राण-रक्षा करेगी?

नज़रिया: 'आप: सपना टूटा और राजनीति का कीचड़ सामने आया'

दिल्ली में हार के बाद आप में मचा घमासान

इमेज कॉपीरइट EPA

क्यों ख़ामोश हैं केजरीवाल?

इस बार अरविंद केजरीवाल पर आरोप उनके ही एक पुराने सहयोगी ने लगाए हैं. ये आरोप व्यक्तिगत हैं, राजनीतिक नहीं. यह आरोप किसी दूसरी पार्टी के नेता पर लगता, तब भी यह इतनी बड़ी ख़बर नहीं होती. यह ख़बर केजरीवाल के बारे में है, जो पिछले कुछ वर्षों में इसी प्रकार के आरोप दूसरों पर लगाते रहे हैं और ख़ुद को शुद्ध-पवित्र साबित करते रहे हैं.

हैरत इस बात पर है कि आरोप लगने के तीन दिन बाद तक वे ख़ामोश हैं. और जब बोले तो ईवीएम पर. जब से कपिल मिश्रा ने अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाए हैं, वे चुप थे. उनकी ओर से मनीष सिसौदिया सामने आए.

इमेज कॉपीरइट FACEBOOK

आरोपों पर चर्चा क्यों नहीं कर रहे केजरीवाल?

इमेज कॉपीरइट Twitter

सोमवार को कपिल मिश्रा ने जब आरोपों को और ज़्यादा धार दी और क़ानूनी कार्रवाई शुरू की तो अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया, 'जीत सत्य की होगी. कल दिल्ली विधान सभा के विशेष सत्र से इसकी शुरुआत.' इससे लगा कि वे शायद आरोपों का जवाब विधानसभा में देना चाहेंगे.

इसके बाद मंगलवार की सुबह उनका ट्वीट आया, 'देश में चल रहे एक बहुत बड़े षड्यंत्र का सच आज सदन में सौरभ भारद्वाज देश के सामने रखेंगे. उन्हें ज़रूर सुनिएगा. सत्यमेव जयते.'

उम्मीद थी कि विधानसभा के विशेष सत्र में रिश्वतखोरी के आरोपों पर चर्चा होगी या हो सकता है कि 'आप परिवार' किसी सनसनीखेज तथ्य को पेश करेगा.

इमेज कॉपीरइट Twitter
इमेज कॉपीरइट TV GRAB

ऐसा नहीं हुआ, बल्कि सौरभ भारद्वाज ने एक डेमो मशीन दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की कि ईवीएम से छेड़छाड़ कर के वोटों की गड़बड़ी की जा सकती है. मान लिया हो सकती है, पर यहाँ ईवीएम का मसला आ कहाँ से गया? आपके पास इतनी पुख़्ता जानकारी है, तो कुछ समय इंतजार कर लीजिए. वास्तव में जीत सत्य की होगी.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

ईवीएम पर कोर्ट क्यों नहीं गए?

अरविंद केजरीवाल ने अपना मौन तोड़ा भी तो ईवीएम के प्रसंग पर तोड़ा, कपिल मिश्रा के आरोपों पर वे फिर भी कुछ नहीं बोले. विधानसभा के बाहर भी उन्होंने यही कहा कि मशीन के मदरबोर्ड को आसानी से बदला जा सकता है. नब्बे सेकंड लगते हैं. ये देश के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है. लोकतंत्र के लिए ख़तरा है. उन्हें अपनी पार्टी के सिर पर खड़ा ख़तरा क्यों नहीं दिखाई पड़ रहा है?

केजरीवाल या सौरभ भारद्वाज की बातों को पहली नज़र में ख़ारिज नहीं भी करें, पर उसके लिए दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र की क्या जरूरत थी? मशीन की ख़राबी साबित करने के लिए उन्हें चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

चुनाव आयोग ने यों भी संकेत किया है कि इसी महीने इन मशीनों के दोष को साबित करने का मौक़ा दिया जाएगा. आम आदमी पार्टी का कहना है कि चुनाव आयोग ने अभी तक आधिकारिक रूप से अपने कार्यक्रम को घोषित नहीं किया है.

आयोग ने 12 मई को सर्वदलीय बैठक बुलाई है, उसमें यह माँग की जा सकती है कि आयोग तारीख़ घोषित करे. उस प्रक्रिया को भी तय करना होगा जो इस परीक्षा में अपनाई जाएगी. बहरहाल हफ्ते-दो हफ्ते में गाड़ी छूट नहीं जाएगी.

इमेज कॉपीरइट AFP

शायद केजरीवाल देख पा रहे हैं कि आम आदमी पार्टी की दीर्घकालीन राजनीति अधर में है. इस वक़्त उन्हें ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए कि उनकी राजनीति में ऐसा क्या ग़लत हुआ जो उनके सहयोगी ही टूटकर जा रहे हैं.

कपिल मिश्रा उन्हें छोड़कर जाने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं. वे केवल केजरीवाल पर ही आरोप नहीं लगा रहे हैं, पार्टी के कुछ दूसरे लोगों पर भी आरोप लगा रहे हैं. ऐसे ही आरोप शुंगलू रिपोर्ट में भी हैं.

अगले कुछ ही दिनों में चुनाव आयोग पार्टी के 21 विधायकों की सदस्यता को लेकर फैसला सुनाने वाला है. फैसला जो भी हो, वह मामला आगे ऊँची अदालत में जाएगा, पर पार्टी घिरती जा रही है.

माना कि इस घेराबंदी में बीजेपी की योजना है. कांग्रेस भी उसका साथ दे रही है. पर क्या आम आदमी पार्टी ने इस विपदा को खुद ही न्योता नहीं दिया है?

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे