कश्मीरियों को इंजीनियर बना रहे हैं बिहारी

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Image caption श्रीनगर में राइज़ कोचिंग सेंटर चलाने वाले युवा शिक्षक

श्रीनगर के जवाहर नगर की रहने वाली 20 वर्ष की क़ाज़ी फ़ातिमा ने हाल ही में आईआईटी मेंस की परीक्षा पास की है.

लेकिन फ़ातिमा के लिए ये सफ़र तय करना इतना आसान नहीं रहा. फ़ातिमा कहती हैं कि कश्मीर के ख़राब हालात से उन्हें मुश्किलों का सामना तो रहा लेकिन इस दौरान भी उन्होंने वह सब रास्ते खोजे जिनसे उन्हें आगे बढ़ने का मौक़ा मिला.

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फ़ातिमा फ़िलहाल आईआईटी एडवांस की तैयारी कर रही हैं जो इसी महीने के आख़िर में होने वाला है. श्रीनगर के इंदिरा नगर में रहने वाली 20 साल की महरीन ने भी पिछले महीने अप्रैल में आईआईटी मेंस की परीक्षा पास की है. और वो भी आईआईटी एडवांस की तैयारी कर रही हैं.

फ़ातिमा और महरीन की इस कामयाबी में उन दोनों की मेहनत के अलावा बिहार के तीन लड़कों का भी हाथ हैं. एक कश्मीरी लड़के के साथ मिलकर तीनों मिलकर एक कोचिंग सेंटर (द राइज) चलाते हैं.

बिहार के तीन शिक्षक

ये चारों ख़ुद भी आईआईटी के पासआउट हैं. फ़ातिमा और महरीन की तरह इस साल इस कोचिंग सेंटर के कुल 42 बच्चों ने आईआईटी मेंस की परीक्षा पास की है जिसमें छह लड़कियां भी हैं.

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फ़ातिमा कहती हैं, "बीते साल जब कश्मीर में कई महीनों तक हालात ख़राब रहे तो उस बीच हमारे शिक्षक हमारे लिए उपलब्ध रहते थे और हम फ़ोन पर पूछ सकते थे जब किसी तरह की मुश्किलात का सामना होता था. इस तरह से मैंने अपनी तैयारी का सफ़र जारी रखा."

इस कोचिंग सेंटर में पढ़ाई का अनुभव बताते हुए वह कहती हैं, "यहाँ जिस अंदाज़ से शिक्षकों ने पढ़ाया वह एक वजह रही एंट्रेंस पास करने की. जिन्होंने मुझे पढ़ाया वह ख़ुद भी आईआईटी ग्रेजुएट हैं और वह जानते हैं कि एंट्रेंस की तैयारी कैसे करनी है. उन्होंने खुद भी एंट्रेंस पास किया है."

उम्मीद की वजह

महरीन कहती हैं, "यहाँ टीचिंग से मुझे कोई ज़्यादा फ़र्क़ तो नहीं पड़ा, लेकिन जिस तरह से टेस्ट का एक तरीक़ा यहाँ है, उससे मुझे बहुत मदद मिली. यहाँ के टेस्ट के तरीक़ों से मुझे जो दूसरी मदद मिली वह ये कि परीक्षा में छात्र के अंदर जो एक निराशा होती है, वह दूर हो जाती है.''

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महरीन कहती हैं कि कश्मीर के हालात से मुश्किलें तो होती हैं लेकिन उसके बावजूद घर में जिस तरह हो सकता है वह तैयारी कर लेती हैं. आतीर शिफ़ात अभी 11वीं क्लास में हैं लेकिन उन्हें भी आईआईटी करने का शौक़ है और इसीलिए वो अभी से ही यहाँ कोचिंग करने आती हैं.

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आतीर को लग रहा है कि कश्मीर में लड़कियां अब हर मैदान में आगे आ रही हैं. उनका कहना था, "कश्मीर में लड़कियों के अंदर अब ज़्यादा आत्मविश्वास पैदा हो रहा है. लड़कियां अब खेल, शिक्षा हर मैदान में दिखाई दे रही हैं."

श्रीनगर के रहने वाले मुबीन मसूदी ने बिहार के अपने तीन दोस्तों इंबिसात अहमद, सलमान शाहिद और सैफ़ई करीम के साथ मिलकर 2012 में इसकी शुरुआत करने का फ़ैसला किया था.

दिलचस्प रहा है सफ़र

मुबीन कहते हैं कि कश्मीर में छात्रों को पढ़ाई के लिए सही राह दिखाने की ज़रुरत है और ये एक मुख्य कारण था कि वह कश्मीर में इस तरह का कुछ करें, जिससे बच्चों को आईआईटी जैसी परीक्षा में दिलचस्पी बढ़े.

मुबीन कहते हैं की राइज़ कोचिंग सेंटर को चलाने के लिए कश्मीर के कई लोगों ने उनकी मदद की. 25 साल के इंबिसात का कश्मीर में आने जाने और फिर यहाँ पढ़ाने का सफ़र दिलचस्प रहा है.

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इंबिसात कहते हैं, "मैं अक्सर छुट्टियों में दोस्तों के साथ कश्मीर आता था. 2012 में भी मैं आया था. कश्मीर में हमने पाया कि यहाँ छात्रों के अंदर काफ़ी हुनर है लेकिन जानकारी की कमी है. बच्चे वहां नहीं जा पाते हैं, जहां उनकी जगह है. इस बात को हमने एक प्रॉब्लम की तरह लिया और मन बनाया कि जब हम ग्रेजुएट हो जाएंगे तो यहाँ हम फुल टाइम क्लासेज़ शुरू करेंगे."

27 साल के सैफ़ई करीम कहते हैं, "मुझे यहाँ देखने को मिला कि लड़कियां यहां ख़ूब पढ़ती हैं, जबकि हमारे बिहार में लड़कियां अभी काफ़ी पीछे हैं.'' 24 वर्ष के सलमान शाहिद कहते हैं कि कश्मीरी बच्चों में पढ़ने का काफ़ी शौक़ है लेकिन उनके लिए यहाँ वह सुविधाएं नहीं हैं जो दूसरे बड़े शहरों में हैं.

छात्रों का कमाल

पिछले साल यानी 2016 में भी इस कोचिंग सेंटर से चार छात्रों ने आईआईटी क्लियर किया था जबकि 30 से ज़्यादा छात्रों ने एनआईआईटी में दाख़िला लेने में सफलता पाई थी.

इसके अलावा इसी सेंटर से पढ़े एक और छात्र 19 साल के शेख़ मोअज़्ज़िन ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है. मोअज़्ज़िन को अमरीका के प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग विभाग से एडमिशन का ऑफ़र मिला है.

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वो जल्द ही एडमिशन लेने के लिए अमरीका जाने वाले हैं. कोचिंग सेंटर का दावा है कि शेख़ मोअज़्ज़िन कश्मीर घाटी के पहले ऐसे छात्र हैं जिन्हें प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से दाख़िले का ऑफ़र मिला है.

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