नज़रिया: जेएनयू जैसा है, वैसा यूं ही नहीं है

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जेएनयू की एडमिशन पॉलिसी जैसी है वैसी नहीं होती तो मुझ जैसे लोअर मिडिल क्लास परिवार के छात्र का झारखंड के जादूगोड़ा से दिल्ली पहुंचना आसान नहीं होता.

एडमिशन मिल भी जाता तो मैं शायद पढ़ाई का ख़र्च नहीं उठा पाता, अगर जेएनयू जैसी व्यवस्था नहीं होती.

पहले तो कुछ फैक्ट्स हो जाएं, फिर मूल्यों की बात हो.

1. जेएनयू की स्थापना संसद के एक एक्ट से हुई थी.

2. सिर्फ़ जेएनयू में ही एडमिशन की ऐसी पॉलिसी रही है जिसमें पिछड़े ज़िलों से आने वालों को इसके लिए अतिरिक्त नंबर दिए जाते हैं. मसलन, आप उड़ीसा के कालाहांडी ज़िले से हैं तो आपको पांच नंबर मिलेंगे क्योंकि वो इलाक़ा पिछड़ा है.

3. जेएनयू में ये कोशिश की जाती है कि भारत के सभी राज्यों से छात्र पढ़ने आ सकें हालांकि बिहार और उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्यों के छात्र-छात्राओं की संख्या अधिक होती है.

4. जेएनयू संभवत पूरे भारत में सोशल साइंस के मल्टी डिसीप्लिनरी रिसर्च का एकमात्र संस्थान है.

5. यूनिवर्सिटी में अनेक विदेशी भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, अंडर ग्रैजुएट कोर्स सिर्फ़ विदेशी भाषाओं में होते हैं, बाक़ी सारे कोर्स मास्टर्स से शुरू होते हैं.

अब जेएनयू के मूल्य...

इन पर लंबी बहस की संभावना है. खास कर कन्हैया, उमर खालिद मामले के बाद.

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यूं तो कांग्रेस के शासन काल में जेएनयू की स्थापना हुई थी और नाम भी कांग्रेसी नेता पर रखा गया था लेकिन जेनयू कभी भी राजनीतिक रूप से कांग्रेसी नहीं रहा.

शुरुआती दौर में भी जेएनयू के छात्रों का झुकाव वामपंथी राजनीति की तरफ रहा.

सत्तर के दशक में आपातकाल के दौरान जेएनयू सरकारी दमन के विरोध में आगे रहा और बाद में इसी कैंपस से निकले सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने वामपंथी राजनीति में नाम कमाया.

आपातकाल का मशहूर किस्सा है कि जब इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं तो जेएनयू से छात्रों का एक दल सीताराम येचुरी के नेतृत्व में इंदिरा गांधी के पास गया और एक पर्चा पढ़ा जिसमें वर्णन था कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते आपातकाल के दौरान क्या क्या गलत हुआ.

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छात्रों की मांग थी कि वो जेएनयू के चांसलर पद से इस्तीफा दें और इंदिरा गांधी ने बाद में इस्तीफा दे दिया.

आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान जेएनयू में आरक्षण के विरोध में और समर्थन में आंदोलन चले लेकिन बाद में विश्वविद्यालय की छवि मूल रूप से आरक्षण समर्थक यूनिवर्सिटी के रूप में ही बनी.

छात्र चुनाव और बोलने की आज़ादी

जेएनयू के छात्र चुनाव कई वर्षों से अपने आप में यूनिक रहे हैं. कारण ये है कि ये चुनाव छात्र ही करवाते हैं और इन चुनावों में कभी किसी हिंसा या धांधली की ख़बर नहीं आई है.

कैंपस के छात्र ही एक चुनाव समिति बनाते हैं और वही समिति चुनावी प्रक्रिया को पूरा करती है. चुनाव के दौरान हर दल को पूरे कैंपस में जगहें दी जाती हैं जहां वो अपने पोस्टर बैनर लगा सकें.

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कैंपस में छपवा कर पोस्टर बैनर लगाने का चलन नहीं है, सारे बैनर पोस्टर हाथ से बनाए जाते हैं, और अगर कोई दल ऐसा करता है तो इसे बुरा माना जाता है.

छात्र चुनावों में जीत चुके कई छात्र बाद में राजनीतिक दलों में भी सक्रिय रहे हैं.

जेएनयू को धुर वामपंथी मानने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि कैंपस में 2001 में हुए चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संदीप महापात्र ने एक वोट से चुनाव जीता था.

कैंपस में छात्रों को बोलने की आज़ादी का आलम कुछ-कुछ ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज़ जैसा है जहां सरकार की, सरकारी नीतियों की आलोचना करने की पूरी छूट है.

सेना, राष्ट्र, राष्ट्रवाद, लोकतंत्र की अवधारणाओं पर स्वस्थ बहस को अच्छा माना जाता है और छात्रों को ऐसी बहसों में हिस्सा लेने के आमंत्रित किया जाता है.

इन विषयों पर जेएनयू में आए दिन पर्चे छपते हैं और कई बार दूसरे को आपत्तिजनक लगने वाली सामग्री भी छपती है जिसका जवाब लोग अपने पर्चों से दे सकते हैं.

जेएनयू का माहौल और स्वच्छंद लड़कियां

बीजेपी के विधायक ज्ञान आहूजा को वो विवादित बयान पर लोग अक्सर चर्चा करते हैं कि जेएनयू में कंडोम फेंके जाते हैं. बता दूं कि जेएनयू पहली यूनिवर्सिटी थी जहां पर कंडोम की वेंडिंग मशीन लगाई गई थी. हालांकि इस्तेमाल न होने के कारण वो हटा ली गई.

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जेएनयू का माहौल ऐसा है कि रात के बारह बजे तक लड़कियां आराम से घूमती फिरती हैं. छेड़छाड़ की घटना शायद ही कभी हुई हो रात में.

हां लेकिन जैसे कि यौन शोषण की घटनाएं हर जगह होती हैं वैसे ही जेएनयू में भी होती हैं और इनसे निपटने का जेएनयू का अपना तरीका है.

जीएसकैश नाम का एक आयोग जेएनयू में ही सबसे पहले बना था जहां कोई भी लड़की यौन शोषण या छेड़छाड़ की शिकायत कर सकती है.

इस आयोग में शिक्षक, छात्र और प्रशासन के लोग होते हैं और शिकायतों की बकायदा सुनवाई कर के सज़ा का प्रावधान होता है. ये अपने आप में अनोखा कहा जा सकता है.

जेएनयू के माहौल में लड़कियों के साथ छेड़छाड़ पर अनकहा प्रतिबंध हैं और शायद यही कारण है कि यहां पढ़ने वाली लड़कियों का प्रतिशत किसी भी और यूनिवर्सिटी की तुलना में ज्यादा ही होगा कम नहीं.

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यूनिवर्सिटी के लोकप्रिय गंगा ढाबे पर रात के दो बजे भी लड़के लड़कियों को गंभीर विषयों पर बहस करते आसानी से देखा जा सकता है.

कई लोग यह पूछते हैं कि जब वामपंथ पूरे देश में ढलान पर है तो फिर जेएनयू में इस विचारधारा को मानने वाले लोग बढ़ क्यों रहे हैं.

इसके कई जवाब हो सकते हैं मसलन:-

1. पिछड़े इलाकों से आने वाले गरीब छात्रों को वामपंथ के नारे अच्छे लगना स्वाभाविक है जो गरीब-गुरबा की बात करते हैं. उनकी राजनीति कितनी अव्यवहारिक है ये छात्रों को दो चार साल में समझ में आता है और यही कारण है कि कैंपस से निकल के ज्यादातर छात्र वाम राजनीति में सक्रिय नहीं होते.

2. अकादमिक तौर पर देखें तो पूरी दुनिया की अकादमी में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव है. अमरीका में बाज़ारवादी व्यवस्था को लेकर अकादमिक लेखन अधिक है पर पिछले कई दशकों में वामपंथी विचारधारा हावी रही है तो जेएनयू में भी इसका हावी होना आसान लगता है.

3. वामपंथी विचारधारा का अर्थ जेएनयू में व्यापक है. चीन और रूस से इतर जेएनयू में वामपंथ दरअसल व्यवस्था विरोधी सोच है. इस हिसाब से हर छात्र कभी न कभी वामपंथी हो जाता है.

वर्तमान सरकार चिढ़ती क्यों है जेएनयू से?

किसी भी राजनीतिक दल के लिए दूसरे दल की विचारधारा को खत्म करना एक चुनौती होता ही है.

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यह कहना गलत नहीं होगा कि दक्षिणपंथी मानी जाने वाली बीजेपी के लिए सेक्युलर दल और खासकर वामपंथी विचारधारा एक चुनौती रही है.

और राजधानी दिल्ली में जेएनयू उस वामपंथी विचारधारा के प्रतीक के रूप में उभरी है जहां हर उस बात की आलोचना संभव है जो दक्षिणपंथी दलों के लिए पवित्र है- मसलन, कश्मीर, गाय, देशभक्ति, राष्ट्रवाद आदि.

जब से मोदी सरकार बनी है तब से किसी न किसी रूप में जेएनयू सरकार और सरकार समर्थकों के निशाने पर रही है.

कश्मीर की आज़ादी को लेकर नारेबाज़ी और बहसें जेएनयू में पहले भी होती रही हैं और इसे किसी सरकार ने उतना तूल नहीं दिया जितना इस सरकार ने दिया है.

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अब जेएनयू की एडमिशन नीतियों में बदलाव की यदाकदा कोशिशें चल ही रही हैं और इसकी आलोचना भी हो रही है.

लेकिन ये तो कहा ही जा सकता है कि आने वाले समय में जेएनयू पर दबाव बढ़ेगा और डर है कि देश की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटियों में गिना जाने वाला जेएनयू पहले जैसा आज़ाद और प्रगतिशील न रह जाए.

वर्तमान सरकार की ही कई रिपोर्टों में जेएनूय को बेहतरीन शोध संस्थान मान गया है और जेएनयू सिर्फ़ किताबें पढ़ने से बेहतरीन नहीं बना है, वहाँ का बौद्धिक खुलापन छात्रों को अलग ढंग से गढ़ता है जो अक्सर दक्षिणपंथी राजनीति को चुनौती देते हैं.

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