नज़रिया: भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति का 'ओबीसी फ़ैक्टर'

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यूपी और हिंदी क्षेत्र के कुछ सूबों के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों पर नज़र डालें तो पिछड़े वर्गों के बीच 'हिंदुत्व' खेमे के प्रति झुकाव देखा जा सकता है.

पिछड़े वर्ग की ज्यादातर जातियों में शुरू के दौर में 'हिंदुत्व' की राजनीति करने वाली जनसंघ, भाजपा या इनके मार्गदर्शक संगठन-आरएसएस के प्रति कभी कोई ख़ास आकर्षण नहीं देखा गया.

सबसे पहले, यूपी और मध्य प्रदेश में 90 के दशक में कल्याण सिंह और उमा भारती के उदय के साथ भाजपा को लोध जाति का समर्थन मिलता नज़र आया.

शिवराज सिंह चौहान सहित कुछ अन्य नेताओं के चलते भी मध्यवर्ती जातियां भाजपा की तरफ झुकीं.

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मोदीराज में सेक्युलर राजनीति की जगह नहीं

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Image caption लालकृष्ण आडवाणी के साथ कल्याण सिंह

उन दिनों अविभाजित मध्य प्रदेश में यह स्थिति इसलिए भी बनी कि कांग्रेस की सूबाई राजनीति में पिछड़ों के लिए खास जगह नहीं थी.

कांग्रेस में तब राजपूत या ब्राह्मण समुदाय के नेताओं का संपूर्ण वर्चस्व था. वहां पिछड़ों के पास कोई तीसरा विकल्प नहीं था, लेकिन यूपी-बिहार में कांग्रेस के ख़िलाफ़ समाजवादी, वामपंथी और बाद के दिनों के लोकदली-जनता दली मज़बूत विकल्प बनकर उभरे थे.

दोनों सूबों में तब हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा उतनी मज़बूत नहीं थी इसलिए इन दोनों राज्यों में पिछड़ी जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा से अलग रहा, पूर्व के समाजवादियों, लोकदलियों या जनता दलियों के साथ बना रहा. अयोध्या में बाबरी-ध्वंस प्रकरण से पहले अगर हिंदुत्व की राजनीति करने वाले जनसंघियों को कहीं से कोई मदद मिली तो वह समाजवादी ही थे.

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ग़ैर-कांग्रेसवाद के नाम पर समाजवादियों ने कई सूबों में इनके साथ मिलकर सरकार बनाई. इमरजेंसी विरोधी अभियान में उभरी एकता का भी हिंदुत्ववादियों ने भरपूर फ़ायदा उठाया और बाद के दिनों में वे हिंदी क्षेत्र में ताकत बनते गए.

उन्हीं दिनों संघ नेतृत्व ने पहली बार महसूस किया कि हिंदी क्षेत्र की पिछड़ी जातियों में घुसपैठ किए बगैर वे अपनी राजनीति का दायरा नहीं बढ़ा सकते.

इस नए अहसास के साथ संघ-भाजपा ने अपने अयोध्या अभियान की शुरुआत की लेकिन बीच में एक बड़ी समस्या थी-'मंडल.'

'मंडल' की लहर को 'कमंडल' से रोकने में वे पूरी तरह भले कामयाब नहीं हुए पर शिलापूजन और बाबरी-ध्वंस से पहले के अपने अन्य अभियानों में उन्होंने हिंदी क्षेत्र में पिछड़ी जातियों के बीच 'राम' के नाम पर कुछ जगह ज़रूर बना ली.

पर पिछड़ों के बीच 'मंडल' का आकर्षण 'कमंडल' से हमेशा ज्यादा रहा. वीपी सिंह की टीम के लालू, शरद और पासवान 'मंडल' के बड़े ध्वजवाहक बनकर उभरे.

यूपी में पिछड़ों-अल्पसंख्यकों के बीच सक्रिय रहे मुलायम इस टीम का कभी हिस्सा नहीं बने. पर यूपी में वह चरण सिंह के बाद सबसे मज़बूत नेता बनकर उभरे थे, बाद के दिनों में यह सभी नेता और इनके दल एक ही तरह की समस्या से ग्रस्त हुए.

मंडल की मंडली के ख़िलाफ़ भाजपा के रथ

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कुछ समय तक 'मंडल' और 'सामाजिक न्याय' का ध्वज लहराने के बाद ये निजी और राजनीतिक-सांगठनिक स्तर पर सिमटते रहे. इनके पास ने तो बड़ा सांगठनिक नेटवर्क था और न ही विज़न. ऐसे में इनके बीच अहम का टकराव और परिवारवाद का दबदबा लगातार बढ़ता रहा. दूसरी तरफ, कांग्रेस भी अपनी राजनीतिक-भूलों और संकीर्ण सोच के चलते सिमट रही थी.

जाने-माने समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर रजनी कोठारी इसे सत्ता-राजनीति का 'कांग्रेस-सिस्टम' कहते हैं. इस सिस्टम के पराभव का फायदा इन मंडलवादी संगठनों की बजाय भाजपा ने उठाना शुरू किया

नौकरशाही, कॉरपोरेट और अन्य प्रभावशाली सवर्ण समुदायों के लिये भाजपा ज्यादा स्वीकार्य थी. इस तरह 'कांग्रेस-सिस्टम' की जगह 'हिंदुत्व-आधारित संघ-भाजपा सिस्टम' बड़ी आसानी से पढ़े-लिखे शहरी लोगों की पसंद बन गया.

पर इस सिस्टम का पिछड़ों के समर्थन के बगैर टिकना नामुमकिन था, मतदाताओं की इस विशाल आबादी में भाजपा ने सेंध लगाने के लिए मंडलवादी राजनीति के मठाधीशों से नाराज नेताओं को क्रमशः तोड़ना शुरू किया. इसके लिए उसने हर तरह के हथकंडे अपनाए.

कहीं 'राजभरों के परमपूज्य सुहेलदेव' के नाम पर यात्री-ट्रेन चलवा दी तो कहीं कुर्मी, कुशवाहा, बिन्द और मल्लाह जाति के नेताओं को बड़े-बड़े आॉफर दिए. हिंदी क्षेत्र में लालू-मुलायम-नीतीश से नाराज़ ऐसे अनेक नेताओं को भाजपा की तरफ मुड़ना बेहतर लगा.

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इनमें से कुछ उल्लेखनीय नाम हैं, ओमप्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल और उपेंद्र कुशवाहा, जो भाजपा गठबंधन में शामिल हुए. स्वामीप्रसाद मौर्य सहित पिछड़े वर्ग के अनेक नेता सीधे भाजपा में शामिल हुए.

भाजपा की कामयाबी के पीछे एक और बड़ा कारण है. पिछड़े वर्ग के नेताओं और दलों के मुकाबले संघ-भाजपा ने हाल के दिनों में वैचारिक नएपन और मोलतोल में अपनी दक्षता का परिचय दिया है.

अस्सी-नब्बे दशक के बाद उसने संगठन और नेतृत्व के स्तर पर नये प्रयोग किए. अटल-आडवाणी के बाद उसने मोदी-शाह को आगे किया.

प्रदेशों में उसके पास नेताओं की बड़ी कतार है, जिसमें पिछड़े वर्गों से शिवराज और केशव मौर्य जैसे कई नाम हैं. लेकिन अन्य पार्टियों के पिछड़े वर्ग में वही पुराने चेहरे हैं- लालू, मुलायम, शरद यादव आदि. इनमें ज्यादातर नेता अपने उत्तराधिकारी के नाम पर अपने परिजनों को सामने लाए, इससे आम लोगों में सवाल भी उठे.

गवर्नेंस के स्तर पर नीतीश के अलावा पिछड़े वर्ग के ज्यादातर नेताओं की छवि बहुत अच्छी नहीं बनी, यह भी भाजपा के फ़ायदे में गया.

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सत्ता राजनीति के मौजूदा सामाजिक समीकरणों को देखें तो एक बात आईने की तरह साफ है कि हिंदुत्व-आधारित भाजपा की राजनीति को सबल चुनौती वही दे सकता है, जिसके साथ पिछड़े वर्गों के बड़े हिस्से का समर्थन हो.

न केवल इस वर्ग की आबादी ज्यादा है बल्कि इसमें बदलाव की राजनीतिक प्रखरता भी ज्यादा रही है.

सवर्ण-वर्चस्व की 'हिंदुत्व राजनीति' को चुनौती देने का माद्दा भी अन्य पिछड़े वर्ग में ही है, दलित-अल्पसंख्यकों के साथ मिलकर यह अपराजेय समीकरण बनाता है पर यह तभी संभव है जब पिछड़े वर्गों के बीच से नई राजनीति, नई समझदारी और नए नेतृत्व का आगाज हो, जिसके लिए क्षेत्रीय-स्थानीय स्तर पर इस वक्त कई नए प्रयोग और प्रयास चल रहे हैं.

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