ले. फ़य्याज़ की हत्या पर चुप्पियों का मतलब?

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भारत प्रशासित कश्मीर में छुट्टी पर गए सेना के युवा अधिकारी की हत्या पर कश्मीर घाटी में मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है.

इस घटना ने कइयों को दुखी किया और सदमे में डाल दिया, लेकिन इसकी आलोचना बहुत ज़्यादा नहीं हुई.

दक्षिण कश्मीर के कुलगाम ज़िले के सड़सन गांव के 22 साल के लेफ्टिनेंट उमर फ़य्याज़ महज पांच महीने पहले सेना से जुड़े थे.

छुट्टियों के दौरान उमर एक शादी में भाग लेने के लिए अपने मामा के घर शोपियां के हरमीन इलाक़े गए हुए थे, जहां से चरमपंथियों ने उन्हें अगवा कर लिया था. अगले दिन उनका शव पड़ोस के गांव में मिला था.

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कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने हत्या को जायज़ ठहराने की कोशिश की है. ऐसे लोगों की नज़रों में उमर का भारतीय सेना का हिस्सा होना किसी अपराध से कम नहीं.

लेकिन बहुत लोग इस घटना से दुखी हैं. वे लोग सड़कों पर उतरकर अपना दुख नहीं जता रहे हैं लेकिन ये दुख और हताशा उनके चेहरों पर पढ़ी जा सकती है.

वे शांत हैं क्योंकि वे डरे हुए हैं. उन्हें डर उन अदृश्य बंदूकों का है, जिनसे लेफ़्टिनेंट उमर की हत्या हुई है.

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Image caption कुलगाम में लेफ़्टिनेंट उमर फ़य्याज़ का अंतिम संस्कार करते उनके क़रीबी लोग

हादसे का विरोध

घाटी में सोशल नेटवर्किंग साइट पर आधिकारिक पाबंदी के बावजूद जो लोग फ़ेसबुक का इस्तेमाल कर पा रहे हैं, उन्होंने इस हादसे पर कमेंट किया है.

यहां भी विचार बंटे हुए हैं. कई पोस्ट में इस घटना की आलोचना की जा रही है. वहीं कुछ पोस्ट ऐसे भी हैं जिनमें हादसे को सही ठहराने की कोशिश हो रही है.

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एक पोस्ट में लिखा गया है, "लोग कह रहे हैं कि वो हथियार के साथ नहीं था, छुट्टियों पर था. ऐसे लोगों से मेरा सवाल ये है कि अगर एक चरमपंथी बिना किसी हथियार के अपने घर जाता है और सेना उसे पकड़ लेती है तो क्या उसे छोड़ दिया जाएगा?"

कुछ पोस्ट में उमर के सेना में शामिल होने पर भी सवाल उठाए गए हैं. एक पोस्ट में लिखा गया है, "उसने हत्या करने वाली सेना में शामिल होने के बारे सोच भी कैसे लिया था?"

कुछ लोग ये भी कह रहे हैं कि जब हर दिन भारतीय सेना द्वारा कश्मीरी युवाओं को मारा जा रहा है, ऐसे में एक सेना अधिकारी की हत्या को इतना तूल क्यों दिया जा रहा है.

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लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो इस घटना का विरोध कर रहे हैं. एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा गया है, "कब तक हम अपने ही कश्मीरियों को मारते रहेंगे. एक शानदार करियर वाले कश्मीरी युवा की हत्या साथी कश्मीरियों ने कर दी- ये शर्मनाक है."

जागो कश्मीरियों....

कश्मीरी पुरुषों और महिलाओं की ऐसी सैकड़ों पोस्ट हैं, जिसमें हत्या की आलोचना की गई है.

सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर कुछ लोगों ने मार्टिन निमोलर के कथन को पोस्ट किया है:

"वो पहले सोशलिस्टों के लिए आए थे, मैं नहीं बोला क्योंकि मैं सोशलिस्ट नहीं था,

इसके बाद वो ट्रेड यूनियन वाले लोगों के लिए आए, मैं नहीं बोला क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन वाला नहीं था.

इसके बाद वो यहूदियों के लिए आए, और मैं नहीं बोला क्योंकि मैं यहूदी नहीं था.

इसके बाद वे मेरे लिए आए- और मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं बचा था.

जागो कश्मीरियों... किसी उमर को मत मरने दो, नहीं तो हममें से कोई नहीं बचेगा."

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मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दलों ने इस हत्या की निंदा की है, लेकिन अलगाववादी नेताओं ने इसपर चुप्पी साध रखी है.

सैय्यद अली गिलानी, मीरवाइज़ उमर फ़ारूख और मोहम्मद यासीन मलिक- तीनों शीर्ष अलगाववादी नेताओं ने हत्या के बारे में कुछ भी नहीं कहा है. उनकी चुप्पी से समाज में ऐसे अपराधों को एक तरह की सहमति मिल रही है.

सेना से कश्मीरियों का रिश्ता

यहां इस बात का ज़िक्र ज़रूरी है कि कश्मीरी, ख़ासकर घाटी के गांवों और सीमावर्ती इलाकों से लोग भारतीय सेना में जाते रहे हैं. जम्मू और कश्मीर की एक पूरी लाइट इन्फैंट्री (जेएकेएलआई) भी, लेकिन इनमें ज़्यादातर सैनिक स्तर और जूनियर स्तर के अधिकारी ही होते हैं.

कुछ ही कश्मीरी मुस्लिम ऐसे हैं, जो सेना में अधिकारी स्तर पर जुड़ पाते हैं और लेफ़्टिनेंट उमर उन कुछ लोगों में एक थे.

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यहां ये भी याद किया जा सकता है कि 1947 से अब तक, भारतीय सेना में केवल एक कश्मीरी मुस्लिम मेजर जेनरल हुए हैं- मोहम्मद आमीन नायक. संयोग ऐसा है कि वे भी दक्षिण कश्मीर से ही थे.

1990 के बाद से भारतीय सेना और कश्मीर की आबादी में काफी संघर्ष देखने को मिला है, काफी ख़ून बहा है लेकिन अभी भी कश्मीरी युवा सेना के भर्ती अभियान में शामिल होते हैं.

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हालांकि ज़्यादातर लोग यही मानते हैं कि पुलिस और नौकरशाही की तरह ही सेना, सरकार का हिस्सा है.

अगर सरकार के अन्य विभाग में शामिल होने में कोई मुश्किल नहीं है तो सेना में शामिल होना अपराध कैसे माना जा सकता है?

लेफ़्टिनेंट उमर की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इससे कश्मीरी युवाओं का सेना में शामिल होना रुक नहीं जाएगा.

ध्यान रहे, ये केवल बेरोजगारी का मसला नहीं है. कश्मीर में सब कुछ ब्लैक एंड व्हाइट नहीं है, काफ़ी कुछ है जो इन दोनों के बीच में है.

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