अब लौट चले नन्हे ओलिव रिडले

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ओडिशा के समुद्री तट पर दुनिया के सबसे छोटे समुद्री कछुए ओलिव रिडले हर साल जाड़ों में अंडे देने आते हैं और गर्मियों में लौट जाते हैं.

पत्रकार सुप्रिया वोहरा और मीशा होले ने इन कछुओं के आगमन को अपने कैमरे में क़ैद किया. इन कछुओं के आने को आरिबाडा कहा जाता है.

नन्हे जीवों की अजब ग़ज़ब दुनिया

सैकड़ों ओलिव रिडले कछुओं की मौत

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क़रीब सात हफ़्तों तक अंडे सेने के बाद नन्हे ओलिव रिडले अंडों से बाहर निकलते हैं.

अंडों के खोल में मौजूद पोषक पदार्थ उन्हें रेत से चलकर समंदर के पानी तक पहुंचने में मदद करते हैं. नवजात ओलिव रिडले के लिए ये यात्रा बहुत अहम होती है.

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ओलिव रिडले समुद्री कछुओं की उन पांच प्रजातियों में से एक है जो प्रजनन के लिए भारतीय तटों का रुख करते हैं. भारत के वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 के तहत उनकी सुरक्षा की गारंटी की गई है.

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ओडिशा के गंजाम ज़िले में मछुआरों के तीन गांवों- पोडमपेट्टा, गोखरगुड़ा और पुरुनाबंधा से सटे 4.1 किलोमीटर में फैले समुद्र तट पर ये कछुए प्रजनन के लिए आते हैं.

ये जगह ऋषिकुल्या नदी के मुहाने पर है, जहां नदी बंगाल की खाड़ी में मिलती है.

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वैज्ञानिकों के अनुसार, धरती के चुंबकीय क्षेत्र और समंदर की लहरें इन कछुओं को यहां आने में मदद करते हैं. चुंबकीय क्षेत्र उन्हें उस जगह आने को प्रेरित करता हैं, जहां की रेत को उन्होंने पहली बार देखा था.

मादा ओलिव रिडले प्रजनन की प्रक्रिया पूरी करने के बाद फिर बंगाल की खाड़ी में लौट जाती हैं.

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ओलिव रिडले के प्रजनन की जगहों को पहली बार 1990 के दशक में चिन्हित किया गया था. उसके बाद उनकी सुरक्षा के लिए सरकार और गैर सरकारी संगठन आगे आए.

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घायल मादा कछुओं की मदद के लिए वन विभाग स्थानीय लोगों से मदद लेता है.

36 साल के रवींद्र नाथ साहू ने कछुओं को बचाने की मुहिम में अहम भूमिका निभाई है. पुरुनाबंधा निवासी साहू 14 साल की उम्र से ही आरिबाडा के बारे में जानते हैं.

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अंडों से निकलने वाले एक हज़ार छोटे कछुओं में से कुछ ही ज़िंदा बच पाते हैं.

साहू बताते हैं कि पहले इन अंडों को लोग खाते थे और बेचते थे, लेकिन जबसे उन्हें पता चला है कि ये प्रजाति लुप्त होने की कगार पर है, लोग अब इनकी सुरक्षा करने लगे हैं.

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ओलिव रिडले को बचाने के लिए बीच पर सुरक्षा गार्डों को गश्त के लिए रखा जाने लगा है और वन विभाग इन्हें बचाने के उपाय करने लगे हैं.

ऋषिकुल्या में अन्य जानवरों से इन जीवों का ख़तरा होता है.

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अंडों से बाहर निकलने के बाद चूंकि नन्हें ओलिव रिडले कछुओं को पानी में जाने तक काफी दूरी तय करनी पड़ती है इसलिए स्थानीय लोग बाल्टी में उन्हें रख कर पानी में छोड़ते हैं.

समुद्र के इस हिस्से के 10 किलोमीटर के दायरे में मशीन से चलने वाली मछली पकड़ने की नावें प्रतिबंधित हैं.

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हालांकि इससे स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर भी असर पड़ता है लेकिन सरकार उन्हें राशन के रूप में मुआवज़ा देती है.

मछुआरों के जाल में फंसने से भी कछुओं को काफी नुकसान होता है.

लेकिन स्थानीय लोग, ओलिव रि़डले कछुओं के सैकड़ों साल से चलते आ रहे इस मौसमी अप्रवासन में उनकी मदद करते हैं.

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