दौलत लुटाकर दरी के बिछौने पर सोने वाला राजा

  • 14 मई 2017
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अपने महँगे और आलीशान घोड़े पर सवार राजा अजित सिंह दिल्ली में दरियागंज के पास ख़ूनी दरवाज़े से होकर गुज़र रहे थे कि एक फ़क़ीर उनके पास आकर खड़ा हो गया.

और बोला, "मैंने आपकी दरियादिली के बहुत क़िस्से सुने हैं. मैं बहुत दूर से आया हूँ. अगर आप मेरी ख़्वाहिश पूरी कर देंगे तो मैं मानूँगा कि जो मैंने आपके बारे में सुना है वो ठीक है."

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राजा अजित सिंह ने उस फ़क़ीर से पूछा कि तुम क्या चाहते हो? फ़क़ीर ने कहा - ये घोड़ा मुझे दे दो. राजा ने तुरंत घोड़े से उतरकर उसकी लगाम फ़क़ीर को थमा दी और कहा - मैं तो सोच रहा था कि तुम कुछ और माँगोगे, ये घोड़ा तो कुछ नहीं है.

150 साल पहले की दिल्ली

पौराणिक कथाओं में कई काल्पनिक दानवीर राजाओं की ऐसी कहानियाँ आती हैं, लेकिन राजा अजित सिंह कोई पौराणिक कथा के पात्र नहीं हैं. आज से 150 साल पहले दिल्ली शहर — जिसे तब शाहजहाँनाबाद कहा जाता था — में उनकी दरियादिली के क़िस्से मशहूर थे.

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पटियाला की जागीर से जब उनके पास लाख डेढ़ लाख रुपए (आज के करोड़ों रुपए) आ जाते थे तो वो अपने घर के सब झाड़ फ़ानूस और क़ालीन बदलवा डालते थे, कई दर्ज़ी उनके घर पर बैठकर सोने-चाँदी के काम वाली पोशाकें और शाल बनाते थे जिन्हें राजा अजित सिंह अच्छे शेर कहने वाले शायरों को तोहफ़े में दे दिया करते थे.

जब ये रक़म ख़त्म हो जाती तो वो अपना काम चलाने के लिए क़र्ज़ लेना शुरू कर देते थे. दो तीन साल में जब क़र्ज़ की रक़म भी तीन-चार लाख तक चढ़ जाती तो लोग तगादा करने लगते थे, गली-कूचों में बदनामी शुरू हो जाती.

रास आ गई दिल्ली

और ये बदनामी जब पटियाला के महाराजा तक पहुँचती तो वो अपने भतीजे के लिए फिर से ढेर सारी रक़म, सोना चाँदी, हाथी और घोड़े आदि भिजवा देते थे. जिस ज़माने में सौ रुपए की भारी क़ीमत होती थी, राजा अजित सिंह एक ही बैठक में बीस-बीस हज़ार रुपए तक लुटा दिया करते थे.

156 साल बाद पड़दादी के क़दमों की तलाश

1857 के विद्रोह में ऐसा था ब्रिटिश औरतों का हाल

बहादुरशाह ज़फ़र के एक दरबारी और शायर ज़हीर देहलवी ने उस दौर के ऐसे कई दिलचस्प आँखों देखे ब्यौरे अपनी किताब 'दास्तान-ए-ग़दर' में दिए हैं. उन्होंने उस दौर में मुग़लिया सल्तनत को तार-तार होते और फिर 1857 में हुए सिपाही विद्रोह को देखा था और जो कुछ देखा उसे अपनी क़लम के ज़रिए काग़ज़ पर उतारा.

'दास्तान-ए-ग़दर' में ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ हुई सैनिक बग़ावत का ब्यौरा दर्ज है और उस वक़्त की दिल्ली में आम जीवन की तस्वीर खींची गई है. इस किताब के इतिहासकार का राना सफ़वी द्वारा किया गया अँग्रेज़ी अनुवाद हाल ही में प्रकाशित हुआ है.

राजा अजित सिंह भी बर्बादी की कगार पर बैठे दिल्ली शहर के ऐसे ही अमीरों में थे. वो पटियाला के महाराजा के भतीजे थे मगर उन्हें दिल्ली इतनी रास आ गई कि वो यहीं आकर रहने लगे.

Image caption ज़हीर देहलवी की किताब का अनुवाद करने वालीं राना सफ़वी के साथ बीबीसी के रेडियो संपादक राजेश जोशी

ज़हीर देहलवी लिखते हैं, "किसी महफ़िल में अगर शायरों और कलाकारों को तोहफ़े दिए जा रहे हों, वहाँ वो (राजा अजित सिंह) अपना सब कुछ लुटा देते थे और कुछ ही दिनों में फिर से भिखारी बन जाते थे. वो अपने पास हमेशा एक कंबल और दरी रखते थे और कहते थे मैं तो फ़क़ीर हूँ."

एक बार राजा अजित सिंह ने सोने के ज़ेवरात, चाँदी के हौदे सहित एक हथिनी शायर मोमिन ख़ान को तोहफ़े में दे दी, साथ में हथिनी के खाने के लिए एक हज़ार रुपए और दिए. उर्दू के मशहूर शायर दाग़ देहलवी को भी अजित सिंह ने हाथियों को पहनाए जाने वाले विशालकाय ज़ेवर तोहफ़े में दे डाले.

ये वो दौर था जब मुग़लिया सल्तनत का सूरज डूबने वाला था, बहादुरशाह ज़फ़र की सत्ता लालक़िले की दीवारों के भीतर सिमट कर रह गई थी, ईस्ट इंडिया कंपनी ने मद्रास से लेकर कलकत्ता और बंबई से लेकर गुजरात तक हिंदुस्तान के एक बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा जमा लिया था.

जब विद्रोही सैनिक लालक़िले पहुंचे

इतिहासकार विलियम डैलरिम्पल ने अपनी किताब 'द लास्ट मुग़ल' में उस दौर का ख़ूबसूरती से ज़िक्र किया है कि एक ओर जब अँग्रेज़ी फ़ौजें सुबह चार बजे से परेड के लिए निकल मैदान में जा रही होती थीं, लालक़िले के अंदर रात भर मुशायरों में हिस्सा लेने के बाद बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र, उनके दरबारी और शहर के अलसाये शायर उबासियाँ लेते हुए महफ़िल ख़त्म करके सोने जाते थे. मुग़लिया सल्तनत का सूरज डूब रहा था तो ब्रिटिश हुकूमत का सूरज चढ़ रहा था.

ज़हीर देहलवी ने उन घटनाओं का आँखों देखा हाल बयान किया है जब कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी के सवाल पर भड़के फ़ौजी मेरठ से बग़ावत करके 11 मई 1857 को अपने घोड़े दौड़ाते हुए लालक़िले पहुँचे.

और बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र से विद्रोह की अगुआई करने को कहा तो बूढ़े, हताश और दयनीय हो चुके बादशाह ने उनसे कहा, "सुनो भाई! मुझे बादशाह कौन कहता है? मैं तो फ़क़ीर हूँ जो किसी तरह क़िले में अपने ख़ानदान के साथ रहकर एक सूफ़ी की तरह वक़्त गुज़ार रहा हूँ. बादशाही तो बादशाहों के साथ चली गई. मेरे पूर्वज बादशाह थे जिनके हाथ में पूरा हिंदुस्तान था. लेकिन बादशाहत मेरे घर से सौ साल पहले ही कूच कर गई है."

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"मैं अकेला हूँ. तुम लोग मुझे परेशान करने क्यों आए हो? मेरे पास कोई ख़ज़ाना नहीं है कि मैं तुम्हारी पगार दे पाऊँ. मेरे पास कोई फ़ौज नहीं है जो तुम्हारी मदद कर सके. मेरे पास ज़मीनें नहीं हैं कि उसकी कमाई से मैं तुम्हें नौकरी पर रख सकूँ. मैं कुछ नहीं कर सकता. मुझसे कोई उम्मीद मत करना. ये तुम्हारे और अँग्रेज़ों के बीच का मामला है."

लूट और हिंसा का बोलबाला

मेरठ में बग़ावत के दौरान ग़ुस्से में भरे सिपाहियों ने जेल पर हमला करके वहाँ क़ैद आठ सौ अपराधियों, हत्यारों, जेबतराशों और दूसरे बदमाशों को भी आज़ाद कर दिया था. उनमें से बहुत से लोग सैनिकों के साथ दिल्ली पहुँच गए और अगले कुछ दिनों में पुरानी दिल्ली के बाज़ारों में अराजकता, लूट और हिंसा का बोलबाला रहा. ज़हीर देहलवी ने इस मंज़र को कुछ इस तरह बयाँ किया:

जहाँ में जितने थे ओबाश रिंद ना फ़रजाम

दग़ाशियार, चुग़लख़ोर, बदमाश तमाम

हुए शरीक सिपाह-ए-शरर बद अंजाम

किया तमाम शरीफ़ों के नाम को बदनाम

ज़ाहिर है, ज़हीर देहलवी सिपाहियों की बग़ावत से ख़ुश नहीं थे और न ही वो दिल्ली वालों की ज़िंदगी में अचानक आए एक तूफ़ान का स्वागत करने को तैयार थे.

उनकी किताब का अनुवाद करने वाली राना सफ़वी को अंदाज़ा है कि ज़हीर देहलवी कोई इतिहासकार नहीं थे और न ही उन्होंने इतिहास को दर्ज करने की मंशा से ये किताब लिखी. इसलिए इसमें कई खोट भी हैं.

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लेकिन ये किताब बताती है कि पिछले डेढ़ सौ साल में हमने दिल्ली का क्या हाल कर दिया. देहलवी के बयान से पता चलता है कि लालक़िले के पीछे बहने वाली यमुना नदी इस क़दर साफ़ थी कि सुबह के सूरज की किरणें उसपर पड़कर सोना-चाँदी परावर्तित करती थीं, शहर की लड़कियाँ सुबह-सुबह नहाने के लिए आती थीं और पुजारी वहीं बैठकर स्नान करने वालों का टीका करते थे.

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ये किताब बताती है कि उस दौर में लालक़िले के भीतर दीवान-ए-आम और दीवान-ए-ख़ास की दमक कैसी रही होगी. अपने शौर्य के दिनों में मुग़ल दरबार की तहज़ीब, दरबारियों के कोर्निश का तरीक़ा, बादशाह के प्रति इज़्ज़त और डर का मिलाजुला भाव, अथाह मुग़लिया दौलत, कलाएँ और लवाज़मात- ये सब मिलकर मुग़ल दौर की ऐसी दिलकश तस्वीर बनाते हैं जिसे दुनिया के गिने चुने बड़े साम्राज्यों में गिना जाता था.

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