जाधव मामले में क्यों मजबूत है भारत का पक्ष

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अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) में सोमवार को कुलभूषण जाधव के मामले पर सुनवाई चल रही है. भारत ने आख़िरी फ़ैसला आने तक जाधव की फांसी पर रोक लगाने की मांग की है.

भारतीय नागरिक जाधव को पाकिस्तान की एक अदालत ने कथित जासूसी के लिए मौत की सज़ा सुनाई है.

भारत इस मामले को अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में ले गया है, जहां उसने जाधव की सज़ा पर तत्काल रोक लगाने की दरख़्वास्त की है.

भारत का कहना है कि जाधव को सज़ा सुनाकर पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून और वियना कन्वेंशन का उल्लंघन किया है.

कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय अदालत में सुनवाई

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Image caption कुलभूषण जाधव

अलग होते हैं अंतरराष्ट्रीय क़ानून

अंतरराष्ट्रीय क़ानून किसी देश की क़ानून व्यवस्था से अलग होते हैं. देश में संसद क़ानून बनाती है, जो उसकी सरहदों के भीतर, उसके नागरिकों पर लागू होता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय कानूनों से देशों के बीच रिश्ते संचालित होते हैं और उन्हें देशों की सहमति से ही स्वीकार किया जाता है.

वहीं विवादों के निपटारे के लिए अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का अधिकार क्षेत्र भी देशों की सहमति पर ही निर्भर है.

इस मामले में लागू होने वाले अंतरराष्ट्रीय क़ानून वियना संधि में निहित हैं, जिसमें भारत और पाकिस्तान दो पक्षकार हैं.

दोनों देश 'ऑप्शनल प्रोटोकॉल ऑन कम्पल्सरी सेटलमेंट ऑफ डिसप्यूट्स' में भी पक्षकार हैं, जिसके मुताबिक वियना संधि की व्याख्याओं और इस्तेमाल को लेकर होने वाले विवाद भी आईसीजे के ही अधिकार क्षेत्र में आते हैं.

कुलभूषण जाधव के बारे में सब कुछ

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Image caption इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस की इमारत नीदरलैंड्स में है

वियना संधि के तहत, भारत ने लगातार अपने दूतावास के ज़रिये कुलभूषण जाधव से मिलने की कोशिश की, ताकि हिरासत में उनकी स्थिति पता की जा सके और सुनवाई में उन्हें क़ानूनी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके.

लेकिन अंतत: जब मौत की सज़ा के साथ सुनवाई पूरी हो गई तो भारत के पास अंततराष्ट्रीय कोर्ट में जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा.

कैसे काम करता है आईसीजे

अंतरराष्ट्रीय अदालत के काम करने का तरीका यह है कि अगर किसी मामले पर तुरंत हस्तक्षेप की ज़रूरत हो तो उस पर अस्थायी आदेश सुनाया जाता है.

ज़ाहिर है, यह अस्थायी आदेश किसी एक पक्ष के ख़िलाफ होता है, ताकि सुनवाई पूरी होने तक दूसरे पक्ष के हित का हनन न हो.

तात्कालिक आदेश देने के लिए आईसीजे को इसे लेकर बहुत पुख़्ता होने की ज़रूरत नहीं रह जाती कि वह विवाद उसके अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं.

इतना ही काफ़ी होता है कि विवाद पर 'प्रथम दृष्टया' उसका अधिकार क्षेत्र है.

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Image caption अटॉर्नी हरीश साल्वे ने रखा भारत का पक्ष

भारत की स्थिति क्यों है मजबूत

कुलभूषण जाधव के मामले में, उपरोक्त मानदंड पूरे होते हैं. यह मामला बिना देर किए सुनवाई के क़ाबिल है, क्योंकि मौत की सज़ा का ऐलान हो चुका है, जिसे कभी भी पूरा किया जा सकता है.

ज़ाहिर है, अगर इस बीच जाधव को फ़ांसी दे दी गई तो भारत के हितों को सीधा नुकसान होगा. लिहाज़ा कोर्ट इस पर अस्थायी रोक लगा सकता है.

आईसीजे के पास मामले पर पूरा न्यायिक हक़ भी है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों वियना संधि और ऑप्शनल प्रोटोकॉल के भी पक्षकार हैं.

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में क्या होगा कुलभूषण जाधव का

ऐसा पहले भी हो चुका है

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दो उदाहरण देखते हैं. अंतरराष्ट्रीय कोर्ट इससे पहले अमरीका के ख़िलाफ़ जर्मनी और मेक्सिको की अपील पर अस्थायी उपायों के आदेश दे चुका है.

1999 में जर्मनी एक ऐसे ही मामले के साथ आईसीजे पहुंचा था. उसके दो नागरिकों कार्ल और वॉल्टर लाग्रैंड को अमरीका में फांसी की सज़ा सुना दी गई थी.

उन दोनों को यह नहीं बताया गया था कि उन्हें जर्मन दूतावास से मिलने का अधिकार है. जबकि वियना संधि के आर्टिकल 36 के तहत यह ज़रूरी है.

जर्मनी को भी उसके नागरिकों की गिरफ़्तारी की सूचना नहीं दी गई. इस तरह अमरीकी कोर्ट में सुनवाई और अपील दोनों ही स्तरों पर जर्मनी को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा का मौक़ा ही नहीं मिला.

2003 में मैक्सिको भी अमरीका के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय कोर्ट पहुंचा था. उसके 54 नागरिकों को अमरीका की अलग-अलग अदालतों ने मौत की सज़ा सुनाई थी.

मेक्सिको ने कोर्ट से अपील की थी कि उसके नागरिकों की गिरफ़्तारी, कोर्ट में सुनवाई, दोष सिद्धि और उन्हें सज़ा सुनाकर अमरीका ने अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी दायित्वों का पालन नहीं किया और न ही दूतावास संबंधी सुरक्षा के हक़ का पालन करने का मौक़ा दिया गया.

जर्मनी और मैक्सिको दोनों ने ही यथास्थिति बहाल करने और अस्थायी उपायों की मांग की थी.

आख़िरी फ़ैसला भी अमरीका के ख़िलाफ़

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अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने दोनों ही मामलों में आख़िरी फैसला आने तक जर्मनी और मैक्सिको के नागरिकों की मौत की सज़ा पर अमल किए जाने पर रोक लगा दी थी.

कोर्ट ने कहा था कि सज़ा-ए-मौत को रोकने के लिए अमरीका को अपने वश में सारे क़दम उठाने चाहिए.

फिर आख़िरी फैसला आया. कोर्ट ने पाया कि अमरीका ने वियना संधि के अपनी क़ानूनी ज़िम्मेदारियों का पालन नहीं किया.

कोर्ट के मुताबिक, अमरीका ने यह उल्लंघन तीन आधारों पर किया. पहला, गिरफ़्तार किए गए लोगों को बिना देरी के आर्टिकल 36 के तहत उनके अधिकारों के बारे में नहीं बताया गया.

दूसरा, जर्मनी के लाग्रैंड बंधुओं के मामले में वियना संधि का उल्लंघन साबित होने के बाद भी उन्हें सज़ा-ए-मौत पर समीक्षा और पुनर्विचार की इज़ाजत नहीं दी गई.

तीसरा, अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के आख़िरी फ़ैसले तक अमरीका को लाग्रैंड बंधुओं की सज़ा-ए-मौत पर अमल नहीं होने देना था, लेकिन वह इसमें नाकाम रहा. लिहाज़ा अमरीका ने कोर्ट के अस्थायी उपाय का पालन नहीं किया.

ये उदाहरण बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कोर्ट जिस निश्चित प्रक्रिया से काम करता है, यह उम्मीद है कि कुलभूषण जाधव मामले पर आख़िरी फैसले तक उनकी फ़ांसी की की सज़ा पर रोक लगाई जा सकती है.

(लेखक विदेश मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव रहे हैं और वर्तमान में इंडियन लॉ सोसाइटी के महासचिव हैं.)

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