15 लाख का इनाम लेने वाले कुंदन पाहन कौन हैं ?

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कौन है माओवादी कमांडर कुंदन पाहन

झारखण्ड उच्च न्यायलय ने झारखण्ड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी नेता कुंदन पाहन को 15 लाख रुपये बतौर पुनर्वास राशि दिए जाने पर खुद ही नोटिस लिया है.

अदालत की कार्यवाही शुरू होते ही हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव सिब्रेवाल और वरिष्ठ अधिवक्ता शादाब इक़बाल ने उच्च न्यायलय का ध्यान अखबारों में कुंदन पाहन के आत्मसमर्पण से संबंध रखने वाली रिपोर्टों को दिखाया और बताया कि जिस तरह नक़द राशि और दूसरी सहायता सरकार कुंदन पाहन को दे रही है वो एक स्वतंत्रता सेनानी को भी नहीं मिलती.

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मामले का संज्ञान लेते हुए अदालत ने इस मामले को पीआईएल के रूप में सुनने की सहमति दे दी है. इस मामले में 'इंटेरवेनेर' बनने वाले वकील अराफ़ात हुसैन ने बीबीसी से बात करते हुए आत्मसमर्पण की पूरी कहानी पर ही हैरानी ज़ाहिर की है.

128 आपराधिक मामले

उनका कहना है, "जिस इंसान पर कुल 128 आपराधिक मामले दर्ज हों. जिसपर पूर्व मंत्री के हत्या का आरोप हो. जिसपर एक डीएसपी, एक इंस्पेक्टर और कई पुलिसवालों की हत्या का आरोप हो. उसके कथित आत्मसमर्पण के लिए भव्य समारोह का आयोजन किया गया. इस समारोह में कुंदन पाहन ने भाषण भी दिया और सबके सामने राजनीति में आने की अपनी इच्छा भी ज़ाहिर की. फिर समारोहपूर्वक उसे 15 लाख रुपये का चेक पुलिस के अधिकारी मुस्कुराते हुए थमाते हैं. ये मारे गए लोगों का अपमान नहीं तो और क्या है?"

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हुसैन का कहना है कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने उच्च न्यायलय को बताया कि कुंदन पाहन सैकड़ों एकड़ ज़मीन के भी मालिक हैं.

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उन्होंने अदालत से यह भी कहा कि जब एक महीने से राज्य के पुलिस महानिदेशक और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कुंदन पाहन के संपर्क में थे तो फिर उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया और आत्म्सपर्पण क्यों करवाया गया.

अधिवक्ताओं के अनुरोध पर उच्च न्यायलय ने कुंदन पाहन के ख़िलाफ़ दर्ज सभी 128 मामलों का पूरा ब्योरा पुलिस से माँगा है.

कुंदन पाहन पर झारखण्ड के पूर्व मंत्री रमेश सिंह मुंडा की हत्या का भी आरोप है. इसके अलावा आईसीआईसीआई बैंक के 'कैश-वैन' से पांच करोड़ रुपये की लूट और गुप्तचर शाखा के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदवार की बीच सड़क पर गला काटकर हत्या करने का आरोप भी कुंदन पाहन पर है.

धरने पर विधायक

रमेश सिंह मुंडा के पुत्र विकास मुंडा आजसू पार्टी के विधायक हैं और कुंदन पाहन के आत्मसमर्पण और पुलिस द्वारा दिए गए पैकेज से वो काफ़ी निराश हैं.

विकास कहते हैं, "जिसको फांसी पर चढ़ाया जाना चाहिए था उसको एक हीरो के रूप में पुलिस ने पेश किया है. ज़रा उन लोगों से पूछ कर तो देखिये जिनलोगों के किसी न किसी की हत्या कुंदन पाहन ने की है. आज उन सबके दिल रो रहे हैं. ये महिमामंडन है. इससे दूसरे नौजवान नक्सलवाद की तरफ जाएंगे क्योंकि उन्हें लगेगा कि इसमें अच्छा पैसा मिलेगा."

विकास फिलहाल रांची में इसके विरोध में धरने पर बैठे हैं. वहीं रांची के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कुलदीप द्विवेदी कहते हैं कि आत्मसमर्पण की नीति में पुनर्वास इसलिए रखा गया है ताकि 'भटक कर' माओवादियों के साथ शामिल हुए लोग मुख्यधारा में वापस लौट आएं.

वो कहते हैं, "कुंदन पाहन को 15 लाख रुपये दिए गए हैं. मगर इसका यह मतलब नहीं कि उसे आरोपों से मुक्त कर दिया गया है. उसे तो अपने ख़िलाफ़ चल रहे मामलों के सिलसिले में अदालत का सामना करना ही पड़ेगा."

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रांची के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का कहना है कि पुनर्वास नीति की वजह से ही अभी तक कई माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है.

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वैसे पुलिस का दावा है कि कुंदन पाहन अभी भी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का वरीय कमांडर है.

मगर जानकार कहते हैं कि आरोपों से घिरने के बाद उसे वर्ष 2014 में संगठन से बाहर कर दिया गया था. हलांकि माओवादियों ने अभी तक इस बात की पुष्टि आधिकारिक तौर पर नहीं की है.

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कुंदन पाहन का असली नाम बीर सिंह पाहन है जो राज्य के खूंटी ज़िले के अड़की प्रखंड स्थित बारीगड़ा गाँव के रहने वाले हैं.

पारिवारिक ज़मीन पर आपसी कलह के बाद उन्होंने हथियार उठा लिया. उनके दो भाइयों ने भी माओवादियों से हाथ मिला लिया था. हलांकि उनके एक भाई - दिम्बा पाहन ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था जबकि दूसरे भाई श्याम पाहन को पुलिस ने पंजाब से गिरफ्तार किया था.

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