कश्मीरी समाज में आज कितनी आज़ाद है औरत?

  • 16 मई 2017
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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की पहचान एक संघर्षरत और मुस्लिम बहुल राज्य के तौर पर है.

कश्मीर की राजनीतिक और सामाजिक संरचना हमेशा से अलहदा रही है.

अगर कोई किसी पूर्वाग्रह के साथ कश्मीर को समझने की कोशिश करेगा तो उसे इसे समझने में बहुत मुश्किल होगी.

कश्मीर की ये 'पत्थरबाज़ लड़कियां'

खासकर अगर कश्मीरी महिलाओं की बात करें तो वास्तविकता बहुत हैरान करने वाली है. समाज में औरतों की स्थिति बदतर तो है लेकिन यह कहना सिर्फ़ एकतरफा निष्कर्ष निकालना भी होगा.

एक इस्लामी और पुरुषवादी समाज में जहां आमतौर पर औरतों के ऊपर परिवार की इज्ज़त और मर्यादा को बचाए रखने का बोझ होता है, वहीं यहां की औरतें अपनी डरी-सहमी औरत वाली छवि को तोड़ भी रही हैं.

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जब मैं जून 2016 में श्रीनगर गई थी तो किस्मत से मुझे वहां एक करीबी दोस्त के घर रूकने का मौका मिला और एक कश्मीरी घर के अंदर की ज़िंदगी को नजदीक से देखने का मौका मिला.

धोनी की तरह धुनाई करना चाहती है कश्मीरी लड़की

मैं ईमानदारी से मानूं तो पहले चीजें थोड़ी असहज करने वाली थीं. खासतौर पर जब किसी के जेहन में कश्मीरी औरतों को लेकर यह छवि बनी हो कि उन्होंने हिजाब पहना होगा और कोई उन्हें घर के अंदर बिना हिजाब के देखने के बारे में सोचता भी ना होगा.

मेरी परवरिश हरियाणा के एक छोटे से शहर में हुई है जहां पंजाबी और जाट समुदाय के लोगों की बहुलता है. वहां आमतौर पर औरतें लंबा कुर्ता, सलवार और चुन्नी पहनती हैं. लेकिन वे घर के अंदर बिना चुन्नी लिए आराम से रहती हैं भले ही घर के मर्द आस-पास ही क्यों ना हो.

बदल गई धारणा

लेकिन कश्मीरी घरों के अंदर जो मैंने पाया उससे मेरी धारणाओं को झटका लगा.

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पहली मुलाकात में मैंने अपने दोस्त की बहन के साथ बहुत गंभीरता से बर्ताव किया. उस वाकये को लेकर हम अब तक आपस में हंसते हैं. जैसे-जैसे उस परिवार और उनके दोस्तों के साथ वक्त गुजारती गई मुझे अपने पूर्वाग्रहों की मूर्खता पर हंसी आती गई.

मुझे लगा कि कश्मीर के बाहर के लोगों ने कश्मीरी औरतों और उनके समाज के बारे में 'दकियानूसी' होने की धारणा बना ली है.

जबकि हक़ीक़त तो यह है कि कश्मीर में ही मां-बाप अपनी बेटियों को अच्छे कॉलेज में पढ़ाना चाहते हैं. मुझे ऐसा लगा कि उन्हें अपनी लड़कियों की शादी की कोई जल्दी नहीं है.

अलग सोच रखने वाली लड़कियां

मैं 26-28 साल की ग़ैर-शादीशुदा औरतों से भी वहां के गांवों में मिली. वो अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी थीं और उन्हें ग़ैर-शादीशुदा होने की वजह से कोई अपमान या दबाव नहीं झेलना पड़ रहा था.

मैं जिन औरतों से मिली उनमें से कइयों के ब्वॉयफ्रेंड भी थे. उनमें से तो कुछ एक वक्त में एक से अधिक लड़कों के साथ डेट भी कर रही थीं. यह बिल्कुल ऐसा ही था जैसा दुनिया के किसी भी दूसरे कोने में होता है.

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अपनी ज़िंदगी को लेकर उनकी अपनी अलग सोच थी.

उनमें से ज्यादातर औरतों के पास 'गुपचुप' तरीके से छुपाकर रखे गए मोबाइल फोन थे. उन्होंने ये मोबाइल अपने परिवार और ब्वॉयफ्रेंड से छुपा कर रखे हुए थे.

डेट करने वाली इन लड़कियों को लेकर अलग-अलग तरह की धारणाएँ हैं.

अगर उनके पास महंगा मोबाइल है तो इसका मतलब हुआ कि वो किसी अच्छे लड़के के साथ डेटिंग कर रही हैं और अगर महंगा मोबाइल है तो उन्हें बदचलन मान लिया जाता है.

इनके राज़ के बारे में भले ही दुश्मनों को पता हो लेकिन बड़े-बुजुर्गों से सब कुछ छिपा रहता है.

डेटिंग करती कश्मीरी लड़कियां

एक बार मैंने एक लड़की से पूछा कि उन्हें डेट पर जाने में डर नहीं लगता क्योंकि श्रीनगर एक छोटी सी जगह है और इस बात की बहुत गुंजाइश है कि कोई जानने वाला देख ले.

इस पर उन्होंने कंधा झटकते हुए कहा, "तो क्या हुआ? थोड़ी मार खा लेंगे, काफी जोर है हमारी हड्डियों में.'

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मैं एक ऐसी औरत से भी मिली जिसे उनके पिता और चाचा ने तब बहुत बेरहमी से मारा था जब उसके प्रेम प्रसंग के बारे में उन्हें पता चल गया था.

आख़िरकार बाद में उसे अपने प्रेमी से शादी करने की 'इजाज़त' मिल गई थी, लेकिन मार खाने की याद अभी तक उसके जेहन में ताज़ा है.

कश्मीरी अक्सर यह कहते मिल जाएँगे कि उनका समाज दिल्ली और भारत के दूसरे शहरों की तुलना में औरतों के लिए महफूज है.

वो ये बात दिल्ली और दूसरे शहरों में आए दिनों होने वाले बलात्कार के मामलों के संदर्भ में कहते हैं.

सड़कों पर होने वाली बदतमीजियां और घरेलू हिंसा की घटनाएं उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है और वो इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं.

'महफूज़' कश्मीर

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मैंने कश्मीर को औरतों के लिए कितना 'महफूज' पाया, खासतौर पर एक बाहरी औरत के लिए, इसका अंदाजा मेरे साथ हुए इन वाक़यों से लगाया जा सकता है.

एक बार सड़क पर चलते हुए दो नौजवानों ने लगभग-लगभग मेरे ऊपर बाइक चढ़ा दी थी.

फिर एक दफा एक अधेड़ उम्र के आदमी ने मेरे कपड़ों पर फब्तियां कसी थीं क्योंकि मैंने अपनी चुन्नी से सर नहीं ढकने की हिमाकत की थी.

ये तो हुई वहां के स्थानीय लोगों की बात, लेकिन सेना के जवानों का रवैया भी काफी निराशाजनक था. बंदूक ताने जवान और कर्फ्यू का माहौल इसे और भयावह बना देते हैं.

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पिछले सितंबर में बकरीद के बाद जब मैं श्रीनगर में कोठी बाग़ पुलिस स्टेशन के पास से गुजर रही थी, तब वहीं पास में सीआरपीएफ़ की जवानों से भरी एक वैन खड़ी थी.

मुझे देखकर वो अचानक मेरे ऊपर चीखने लगे. मैं रामबाग़ में एक बैठक करने के बाद लौट रही थी, सुबह का वक़्त था.

लेकिन कर्फ्यू का समय शुरू हो चुका था और सड़कें खाली हो गई थीं. दो सीआरपीएफ़ के जवान मुझसे 50 फ़ीट की दूरी पर खड़े थे.

उन्होंने मुझे देखते भद्दी टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं. वहां से गुजर रहे दो स्थानीय लोगों ने मुझसे वहां से निकलने को कहा.

कश्मीरी औरतों को हर रोज यह सब झेलना पड़ता है.

ड्रेस कोड

अक्सर ऐसे मामलों में औरतों को ख़ुद को ढंककर रखने की नसीहत दी जाती है. लेकिन इससे कुछ भी बदलता नहीं है. औरतों को स्कूल से लेकर कॉलेज तक में ड्रेस कोड मानना पड़ता है.

अबाया जो एक लिबास है, को यूनिफॉर्म के ऊपर से पहनना होता है.

जहां एक तरफ औरतों को स्थानीय लोगों की इज्ज़त के नाम पर बुरी नज़र का शिकार होना पड़ता है, तो वहीं सेना के जवान अफस्पा की आड़ में इस तरह की हरकत करते हैं.

आश्चर्य है कि फिर भी कम से कम श्रीनगर में तो महिलाएं घर से बाहर निकल रही हैं.

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शाम में गर्लफ्रेंड्स के साथ घूमने का चलन बढ़ रहा है. कश्मीरी परिवारों में संपत्ति बंटवारा भाई-बहनों में बराबर का नहीं है और भ्रूण हत्या के मामले भी बढ़े हैं.

लेकिन इसके बावजूद कश्मीर की महिलाएँ कुपोषित नहीं हैं, जैसा कि भारत के दूसरे पुरुष प्रधान समाजों में होता है.

इसकी वजह है, कश्मीरी आम तौर पर खूब खाते-पीते हैं और इस बात का भी ख्याल रखते हैं कि उनके मेहमान ठीक से खा रहे हैं कि नहीं.

मेरे दोस्त के परिवार के साथ उसके पड़ोसी भी मेरे कमजोर होने को लेकर फिक्रमंद थे.

विरोधाभास और जटिलताएँ

कश्मीरी समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर कई तरह के विरोधाभास और जटिलताएँ हैं.

समाज के पुरुष प्रधान होने के बावजूद घर में महिलाओं का फ़ैसला चलता है और वहीं घर की सारी देखभाल करती हैं. कश्मीरी औरतें कभी भी पूरी तरह से कमजोर नहीं रहीं और अब तो वो अपने लिए और जगह ढूंढ रही हैं.

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हाल ही में दुनिया ने कश्मीरी लड़कियों के हाथ में सेना के जवानों के ख़िलाफ़ पत्थर देखे हैं.

आज़ादी के समर्थक राजनीतिक धड़ों में भी कोई महिला आवाज़ नहीं है. लेकिन अब वो अपनी आवाज़ भारत के प्रसाशकों तक भी पहुंचाना शुरू कर चुकी हैं.

संभवत: पिछले साल अगस्त में मैं उस वक्त ताज्जुब में पड़ गई जब मेरी दोस्तों ने मुझे बुरहान वानी की बहन का गाना सुनाया. यह समय इंटरनेट बैन और कर्फ्यू का था.

जब बुरहान की बहन रो रही थीं तब मैंने देखा कि उनके साथ दूसरी औरतें भी रो रही थीं. वे औरतें एकजुटता, विरोध और प्रतिरोध में उनके साथ खड़ी थीं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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