ब्लॉग: तीन साल के जश्न में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तो करें मोदी

  • 16 मई 2017
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देश मौनमोहन सिंह की चुप्पी से परेशान था, मोदी ने सन्नाटे को झन्नाटे के साथ तोड़ा, 'सिंह गर्जना' करने वाले नेता को जनता ने प्रधानमंत्री चुना.

लोगों को विश्वास दिलाया गया कि अगर पाकिस्तान गुस्ताख़ी करेगा, देश पर भीतर से या बाहर से हमले होंगे तो शेर ऐसा दहाड़ेगा कि सबकी बोलती बंद हो जाएगी.

भारी बहुमत से चुनाव जीते उन्हें तीन साल हो गए हैं, इन तीन सालों में लोग कंफ्यूज़ हो गए हैं कि वे न जाने कब किसकी बोलती बंद करे दें और कब अपनी बोलती बंद कर लें?

पहले अख़लाक, नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर लोग उनकी राय सुनने को तरस गए. अब सुकमा में हमला हुआ, कश्मीर सुलगता रहा, लेकिन पीएम नहीं बोले, दो भारतीय सैनिकों की अपमानजनक हत्या हुई, लेकिन पीएम के ज़ोरदार बयान का इंतज़ार ही रहा.

नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक के दौर में सरकार और उसके मुखिया की जगह बोलने वाली एक अदृश्य ताक़त उभरी जिसका नाम है 'सूत्र', आजकल प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों से ज़्यादा 'सूत्र' ही बोल रहा है, ख़ास तौर पर सरकार की ज़ोरदार कामयाबियों के बारे में.

अख़लाक की हत्या के बाद, लोग अनुभव से समझने लगे हैं कि गोरक्षकों के बढ़ते हमलों, पहलू ख़ान की हत्या और सहारनपुर की जातीय हिंसा को इतना गंभीर नहीं माना जाएगा कि पीएम उन पर बोलें.

ये आरोप ग़लत होगा कि पीएम जनता से संवाद नहीं करते. लगभग हर बार उनके 'मन की बात' वही होती है जो बाक़ी लोगों के मन में न हो. वे 'मन की बात' के ज़रिए लोगों को बताते हैं कि जनता का क्या सोचना राष्ट्रहित में होगा.

पीएम ने शायद पहला डेढ़ साल बोलने और विदेश यात्राओं के लिए तय किया था, अब वे शांति से काम कर रहे हैं तो लोग पूछ रहे हैं कि वे बोल क्यों नहीं रहे हैं? जब बोल रहे थे तो लोग कह रहे थे काम क्यों नहीं करते, इतना क्यों बोलते हैं?

बात केवल पीएम की ही नहीं है, बात-बेबात और पर्याप्त बोलने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद से मौन व्रत पर हैं.

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माता और पुत्र की आवाज़ सुने तो न जाने कितना अरसा गुज़र गया, यहाँ तक कि दिग्विजय सिंह भी नहीं बोल रहे हैं, लालू भी चारा घोटाले की साज़िश का केस खुलने के बाद से चुप ही हैं. और तो और योगी आदित्यनाथ भी सहारनपुर पर कुछ नहीं कह रहे.

कुल मिलाकर देश में सन्नाटा है. देश के नेता चुनाव के पहले और अभिनेता फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले बोलते हैं यानी अपनी ज़रूरत के हिसाब से, जनता की ज़रूरत के हिसाब से नहीं.

सिर्फ रिट्वीट कर रहे हैं केजरीवाल, ख़ुद क्यों ख़ामोश हैं?

जनता के हिसाब से सवाल उसके नुमाइंदे ही पूछ सकते हैं. सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता और पत्रकार अपने पाठकों-दर्शकों के नुमाइंदे के तौर पर सवाल पूछते हैं, उनके सवालों के जवाब देना लोकतांत्रिक नेताओं की ज़िम्मेदारी मानी जाती है.

पिछले तीन साल में पीएम ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है, अलबत्ता एक बार कुछ पत्रकारों को 'सेल्फ़ी विद पीएम' के लिए ज़रूर बुलाया गया. अपनी पसंद के दो विदेशी चैनलों और इक्का-दुक्का देसी मीडिया संस्थानों को उन्होंने इंटरव्यू दिया है, जो एकालाप की ही तरह थे.

सरकार अपनी तीन साल की कामयाबियों पर सैकड़ों करोड़ रुपए के विज्ञापन देगी, लेकिन वह पत्रकारों के सवालों के जवाब देने को तैयार नहीं है. प्रधानमंत्री ने अपनी विदेश यात्रों में पत्रकारों को ले जाना बंद कर दिया है जो एक स्वागत योग्य क़दम है, जिसे स्टोरी कवर करनी हो वह अपने ख़र्च पर जाए और अपना काम करे.

लेकिन पत्रकारों को सवाल पूछने का कोई मौक़ा नहीं देना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी किसी तरह नहीं माना जा सकता.

संसद में सवालों के जवाब देने के मामले में मोदी का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है, वे जवाब देने की जगह भाषण देने में ज़्यादा सहज महसूस करते हैं. उन्हें 'मन की बात' करने और राजनीतिक सभाओं में बोलने में आनंद आता है, जहाँ सवाल न पूछे जाएँ, जहाँ टोका-टाकी न हो.

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दुनिया के हर सुचारु लोकतंत्र में पीएम या सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह डेमोक्रेसी की अनिवार्य शर्त फ़्री-प्रेस और संसद की छानबीन के रास्ते बंद नहीं करेगा.

मसलन, ब्रिटेन में अगर सत्र चल रहा हो तो प्रधानमंत्री को हर बुधवार दोपहर सांसदों के सवालों के जवाब देने के लिए हाज़िर होना पड़ता है, यहाँ तक कि पीएम की विदेश यात्रा में इसका ध्यान रखा जाता है कि 'पीएम क्वेश्चन टाइम' को टाला न जाए.

इसी तरह व्हाइट हाउस में साप्ताहिक प्रेस ब्रीफ़िंग होती है, ज़रूरत पड़ने पर बीच में भी, जिसमें राष्ट्रपति के प्रेस सेक्रेटरी या दूसरे शीर्ष अधिकारी प्रेस के सवालों का जवाब देते हैं. अमरीकी राष्ट्रपति काफ़ी नियमित प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते रहे हैं हालांकि ट्रंप के रवैए को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.

सिर्फ़ मोदी ही नहीं, प्रचार अभियानों, टीवी, रेडियो और होर्डिंग्स पर छाए रहने वाले सभी नेताओं को समझना चाहिए कि लोकतंत्र के हित में उन्हें जनता से ईमानदार दोतरफ़ा संवाद करना होगा.

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