मोदी के तीन साल: विपक्ष ने कहा, फ़ेल है सरकार

  • 16 मई 2017
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सोलहवीं लोकसभा के लिए साल 2014 में हुए चुनावों के नतीजे 16 मई को आए थे.

तीन साल पहले भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली एनडीए ने जो वादे किए उस पर जनता ने समर्थन की मुहर लगाई और प्रचंड बहुमत दिया.

चुनाव जीतने के तीन साल बाद भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार का दावा है कि उसने अभूतपूर्व काम किया है.

लेकिन विपक्ष की राय में सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही है. वहीं राजनीतिक विश्लेषक सरकार के कामकाज को मिलाजुला बता रहे हैं. पढ़िए विपक्ष, सरकार और राजनीतिक विश्लेषकों की राय.

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सरकार बताए कब आएंगे अच्छे दिन?

रणदीप सिंह सुरजेवाला, नेता, कांग्रेस

तीन साल बीत जाने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी से हिसाब मांगना जायज़ है.

मन की बात तो बहुत हो गई. मतलब की बात कब होगी. अच्छे दिन के सपने सच कब होंगे. भारतीय जनता पार्टी ने हर साल दो करोड़ नौकरी देने का वादा किया था. सालाना एक लाख 35 हज़ार नौकरी नहीं पैदा कर पा रही है.

भारतीय मजदूर संघ के मुताबिक नोटबंदी की वजह से 20 लाख नौकरियां चली गईं. आज भी 35 किसान हर रोज़ आत्महत्या करते हैं. हर नौ मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार हो रहा है. उद्योग-धंधे चौपट हो चुके हैं. व्यापार की सहूलियत के लिहाज़ से आज भी भारत 130वें नंबर पर है. ऐसे में बेहतर क्या हुआ है?

ज़ुबान दबाने का दमन चक्र बेहतर हुआ है. तरक्की और विकास लोगों की ज़िंदगी से ग़ायब हो गए हैं.

कांग्रेस पार्टी पूरे देश में एक-एक विषय पर देश के हर कोने में जाएगी. जनमानस को बताएगी और इसको उजागर करेगी.

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सरकार के हर वादे पर सवाल

केसी त्यागी, सांसद, जनता दल यूनाइटेड

राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर ये सरकार खुद को कामयाब नहीं कह सकती है.

सीमा पर अतिक्रमण और सैनिकों के हताहत होने की संख्या बढ़ी है. कश्मीर का मसला पहले से भी गंभीर हो गया है.

आंतरिक सुरक्षा की बात करें तो सुकमा से लेकर नक्सलवादियों की वारदातों की संख्या बढ़ी है. सरकार सिर्फ़ अधिकारियों की बैठक से संतुष्टि हासिल कर लेती है.

किसानों से वादा किया गया था कि पहली सरकारों के मुक़ाबले हम किसानों का ज़्यादा ख़्याल रखेंगे.

सरकार की तरफ़ से तय न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 फ़ीसद के इज़ाफ़े का वादा किया गया था, लेकिन साढ़े तीन फ़ीसद से ज़्यादा दाम नहीं बढ़े हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने 'सबका साथ सबका विकास' का वादा किया था, लेकिन इस पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है. दादरी से लेकर पहलू खां तक जो सवाल दफ़न हो गए थे उन्हें उभारने का काम किया गया. दलितों पर भी अत्याचार बढ़े हैं.

जैसा अकाली आंदोलन के समय हुआ था कि नेताओं के हाथ से नेतृत्व निकल गया था, उसी तरह के अतिवादी क़ानून अपने हाथ में लेकर जज की मुद्रा में पहुंच गए हैं.

पूरे देश में असुरक्षा का माहौल है. भारत को 70 साल में पहली बार संयुक्त राष्ट्र में कहना पड़ा कि हमारे देश में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं.

अगर लोकतंत्र को मज़बूत रखना है तो विपक्षी दलों को राष्ट्रपति चुनाव में एक होना चाहिए फिर चुनावी तालमेल करना चाहिए.

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गरीबों के लिए काम कर रही है सरकार

राजीव प्रताप रुडी, केंद्रीय मंत्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुमत के साथ सरकार बनाई. हमने देश के सामने अपनी योजनाएं रखीं. काम करते हुए तीन साल का कार्यकाल पूरा किया.

सरकार के कामकाज को कैसे नापते हैं? आप इसे बाकी राज्यों के चुनाव परिणाम से देखते हैं.

चाहे वो नगर पालिकाओं का चुनाव हो, भुवनेश्वर में हो या फिर चंडीगढ़ में हो या फिर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव के नतीजे हों, भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला.

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कहीं न कहीं राष्ट्रीय कार्यक्रम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में जो आस्था है, वो इन परिणामों में दिख रही है.

किसानों के लिए फ़सल बीमा योजना और मृदा (सोइल) कार्ड जैसी योजनाएं शुरू हुईं. सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का हिस्सा बढ़ता जा रहा है. नोटबंदी का फ़ायदा ग़रीबों और किसानों को मिला.

स्वच्छ भारत अभियान, स्कूलों में शौचालय का निर्माण और उज्जवला योजना का लाभ भी ग़रीबों और किसानों को मिल रहा है. एक बड़ा विश्वास है कि ये सरकार गरीबों के लिए काम कर रही है.

रोज़गार बढ़ाने के लिए गांव-गांव तक कौशल विकास योजनाएं चल रही हैं. विदेशी निवेश बढ़ रहा है. विदेश नीति के कारण दुनिया में भारत की ताकत बढ़ रही है.

हमारा लक्ष्य सादा है. हम काम करके ग़रीबों, बेरोज़गारों और ग़रीबों से जुड़ रहे हैं.

विपक्ष परेशान है. विपक्षी दलों ने सोचा नहीं था कि एक चाय बेचने वाले का बेटा कभी प्रधानमंत्री बनेगा. भारतीय जनता पार्टी एक विकल्प के रूप में मौजूद है. सभी पार्टियां मिलकर बीजेपी को रोकना चाहती हैं, लेकिन लोगों को लगने लगा है कि बाकी दल सिर्फ़ बातें करते हैं और भारतीय जनता पार्टी काम कर रही है.

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रोज़गार देने में सरकार नाकाम

राधिका रामाशेषन

केंद्र सरकार का अभी तक का कार्यकाल मिलाजुला है.

भारतीय जनता पार्टी सभी महत्वपूर्ण चुनाव जीतती जा रही है. इसका मतलब है कि नरेंद्र मोदी से लोगों का विश्वास एक प्रतिशत भी नहीं हटा है.

शुरुआत में बीजेपी दिल्ली का चुनाव हारी और बाद में बिहार के चुनाव में उन्हें हार मिली. लेकिन उसके बाद उन्हें जीत मिली.

चुनाव को पैमाना मानें तो लोगों का विश्वास मोदी पर कायम है. लेकिन चुनाव नतीजे और सरकार ने ज़मीनी स्तर पर क्या किया, इसमें अंतर तो है ही.

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सरकार के बारे में पूरा विश्लेषण करना है तो हमें ये देखना होगा कि ज़मीनी स्तर पर क्या हुआ? अपने वादे पर सरकार खरी उतरी या नहीं. इस मोर्चे पर परिणाम मिलाजुला सा है.

विपक्ष कुछ आरोप जिम्मेदारी के साथ लगाता है तो कुछ आरोपों में गैरजिम्मेदारी दिखती है.

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जम्मू कश्मीर प्रदेश तो बीते कई सरकारों से ठीक से संभाला नहीं गया. ऐसे में मोदी सरकार पर आरोप लगाना ठीक नहीं होगा. जहां तक किसानों का सवाल है, उत्तर प्रदेश में ऋण माफी की गई है लेकिन महाराष्ट्र और अन्य प्रदेशों से अब भी किसानों की आत्महत्या की ख़बर आ रही है.

सरकार की सबसे बड़ी नाकामी रोजगार के मोर्चे पर ही है. चुनाव के पहले मोदी ने 'बेरोजगारों को रोजगार' का बड़ा सा नारा दिया था. निर्माण के क्षेत्र में भी कोई बदलाव नहीं आया है. आईटी सेक्टर में भी भारी छंटनी हो रही है. नौकरियां नहीं देना इस सरकार की बड़ी नाकामी है. हमें नहीं लगता कि

उत्तर प्रदेश में अगर बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी इकट्ठा हो जाते हैं तो बीजेपी के छुट्टी कर सकते हैं. विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती गठबंधन तैयार करने और नेता चुनने की है. कांग्रेस अच्छी स्थिति में नहीं है. लोगों को राहुल गांधी के नेतृत्व पर विश्वास नहीं है. विपक्ष ने अभी तक ऐसा कोई मुद्दा नहीं उठाया है जिससे सरकार को रक्षात्मक होने के लिए मजबूर कर दें.

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