तो क्या भाजपा से हाथ मिलाएंगे रजनीकांत?

  • 17 मई 2017
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तमिल फ़िल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत ने कहा कि 'ईश्वर ने चाहा तो वो राजनीति में उतर सकते हैं'. उनके इस बयान पर दक्षिण भारत के राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया में चर्चा हो रही है.

लेकिन उनके राजनीति में आने के बयान पर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है.

जो लोग मानते हैं कि वो राजनीति में उतरेंगे वो जानते हैं कि इसके बाद राज्य में क्या स्थिति बन सकती है और आगे क्या हो सकता है...

जो मानते हैं कि रजनीकांत ऐसा नहीं करेंगे उन्हें लगता है कि वो अपने फैन्स को ख़ुश करने के लिए कभी-कभी ऐसा कह देते हैं लेकिन इसके बारे में गंभीरता से नहीं सोच रहे हैं.

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रजनीकांत के 'ईश्वर ने चाहा तो' से कई चेहरे खिल उठे हैं तो कई लोगों की प्रतिक्रिया अलग है. हालांकि सभी मानते हैं कि तमिलनाडु की राजनीति में मौजूदा खालीपन ना होता तो रजनीकांत सार्वजनिक तौर पर इस तरह का बयान कतई ना देते.

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एआईएडीएमके की प्रमुख और प्रदेश की सबसे ताकतवर नेता जे जयललिता की मौत और तेज़ तर्रार राजनीतिक नेता डीएमके के करुणानिधि के स्वास्थ्य कारणों से राजनिति से दूर रहने के कारण प्रदेश की राजनीति में एक खालीपन आ गया है.

डीएमके नेता के पुत्र एमके स्टालिन की पार्टी पर मज़बूत पकड़ है और एआईडीएमके के पास भी ओ पनीरसेल्वम जैसे नेता हैं. लेकिन एक ऐसा राज्य जहां राजनीति और फ़िल्मी सितारे सीधे तौर पर जुड़े हैं, वहां केवल राजनीति से ताल्लुक रखने वाले नेताओं की अगुआई थोड़ी अजीब ही लगता है.

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ऐसे माहौल में द्रविड़ पार्टियों का गढ़ रहे तमिलनाडु में, भारतीय जनता पार्टी की पैठ बनाने की कोशिश की चर्चा हो रही है. केवल इतना ही नहीं, ये ऐसा राज्य भी है जहां केंद्र विरोधी भावना 50 सालों तक रही और एक ना एक द्रविड़ पार्टी ही सत्ता में आती रही है.

भाजपा के लिए संभावनाएं

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवेलपमेंटल स्टडीज़ के प्रोफेसर एस जनकराजन ने बीबीसी को बताया, "ये संभव है कि रजनीकांत भारतीय जनता पार्टी के साथ मिल कर एक रीजनल पार्टी बनाएं या फिर भाजपा के साथ गठबंधन करें. उन्होंने खुल कर डीएमके और एआईएडीएमके की आलोचना की है और इसलिए यही एक संभावना दिखती है."

वो कहते हैं, "अगर राज्य में वो भाजपा के साथ मिल जाएं तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. ये तो सब जानते हैं कि भाजपा तमिलनाडु जैसे राज्य में अपने दम पर तो आ नहीं सकती है. उसे रजनीकांत जैसी किसी शख्सियत के साथ हाथ मिलाना पड़ेगा."

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राज्य की राजनीति पर नज़र रखने वाले प्रोफेसर जनकराजन को यकीन है कि नौ साल के अंतराल के बाद अपने फैन्स से दोबारा मिलने के लिए बैठकें करने का कोई निश्चित उद्देश्य है.

वो कहते हैं, "नहीं तो वो अचानक अपने फैन्स के साथ दोस्ताना तरीके से क्यों पेश आ रहे हैं और उनके साथ सेल्फ़ी भी ले रहे हैं. कारण स्पष्ट हैं."

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लेकिन राजनीतिक विश्लेषक एस मुरारी की राय इससे इतर है. वो कहते हैं, "बीते बीस सालों से वो इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं और इस बारे में कोई फ़ैसला नहीं ले पाए हैं. उनकी बातों को गंभीरता से ना लें."

मुरारी कहते हैं, "तमिल सिनेमा का सुपरस्टार या मेगास्टार होने भर से आप अच्छे राजनेता नहीं बन सकते. हालांकि ये सच है कि लोग उन्हें एक बढ़िया इंसान मानते हैं."

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एस मुरारी के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके के नेता एमजी रामाचंद्रन उनसे अलग थे क्योंकि फ़िल्मों में काम करने के साथ-साथ उन्होंने एक यूनाइटेड डीएमके बनाने के लिए लंबे वक्त तक काम किया.

वो कहते हैं, "मुख्यमंत्री बनने से पहले जयललिता को भी पार्टी के लिए आठ साल तक काम करना पड़ा था."

जानकार इस मुद्दे पर भी अलग-अलग राय रखते हैं कि तमिलनाडु पर असर करने वाले किसी मुद्दे पर रजनीकांत ने कभी कोई स्पष्ट रुख़ नहीं लिया.

प्रोफेसर जनकराजन कहते हैं, "तमिल लोगों के दिल के करीब रहने वाले मुद्दे जैसे की कर्नाटक के साथ कावेरी जल विवाद और श्रीलंका के साथ मछुआरों के मुद्दे पर उनका रुख़ साफ़ नहीं था."

हालांकि चर्चा इस बात की भी है कि क्या रजनीकांत भी डीएमके के विजयकांत की तरह तेज़ तर्रार राजनेता बन पाएंगे या नहीं.

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