तीन तलाक़- जो बातें आपको शायद पता न हों

  • 17 मई 2017
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इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की एक बेंच एक साथ तीन तलाक़ के मुद्दे पर सुनवाई कर रही है. बुधवार को सुनवाई का पांचवां दिन है.

एक ही समय में तीन तलाक़ भारत के मुसलमानों से जुड़ी एक विवादित प्रथा है. इसके बारे में लोगों के पास सही जानकारी भी कम ही है.

इससे जुड़े कुछ सवालों के जवाब:

कितना प्रचलित है तीन तलाक़?

आम तौर पर ये समझा जाता है कि भारत के मुसलमानों में एक साथ तीन तलाक़ एक गंभीर समस्या है. लेकिन इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने एक संस्था के कराए सर्वे का हवाले देते हुए लिखा है कि भारत के मुसलमानों में ज़बानी तीन तलाक़ के मामले दाल में नमक के बराबर हैं.

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सर्वे में 20,000 से अधिक लोगों ने भाग लिया था. ज़ुबानी तीन तलाक़ की संख्या एक प्रतिशत से भी कम पाई गई. लेकिन मुस्लिम समुदाय की शादीशुदा महिलाओं के अनुसार इस प्रथा से मुस्लिम महिलाओं में असुरक्षा का एहसास काफ़ी है. महिलाओं का बहुमत ज़ुबानी तीन तलाक़ ख़त्म करने के पक्ष में है.

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पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे इस्लामी देशों में तीन तलाक़ पर पाबंदी है. ज़बानी तीन तलाक़ का चलन दुनिया में भारतीय मुसलमानों के बीच ही है और वो भी हनफ़ी विचारधारा को मानने वालों के बीच.

इस्लाम की चार ख़ास विचारधाराओं में से भारत में हनफ़ी धारा को मानने वालों का बहुमत है. हनफ़ी धारा के मानने वालों के बीच तीन तलाक़ सही है. बाक़ी तीन धाराओं में "एक ही सांस में तीन बार तलाक़" को एक ही माना जाएगा. शादी ख़त्म करने के लिए कुछ महीनों के अंतराल में अलग-अलग समय में दो बार तलाक़ देना होगा.

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लेकिन इस पर इस्लामी विद्वानों के बीच सहमति नहीं है. कुछ विद्वानों के अनुसार तो एक बार में तीन तलाक़ एक दम से ग़ैर इस्लामी है और ये क़ुरान के ख़िलाफ़ है. उनके अनुसार क़ुरान के सूरह बक़रा में तीन तलाक़ के बारे में जो बताया गया है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि एक ही समय पर, एक ही सांस में तीन बार तलाक़ कहना इस मुक़द्दस किताब के ख़िलाफ़ है.

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तीन तलाक़ क्या है?

इस्लाम में तलाक़ देने के लिए तीन बार तलाक़ देना होता है. आम तौर से तीन तलाक़ अलग-अलग समय पर देना चाहिए ताकि अगर ग़ुस्से में तलाक़ कहा गया हो तो पति-पत्नी का रिश्ता टूटे नहीं.

अगर तीन बार "तलाक़, तलाक़, तलाक़" कहा गया हो, तब भी इसे एक ही तलाक़ माना जाएगा. लेकिन भारत के मुसलमानों के बीच अगर एक ही समय में जब मर्द अपनी पत्नी को एक ही सांस में तीन बार तलाक़ देता है तो इसे तीन तलाक़ मान लेते हैं और तलाक़ हो जाता है.

ज़बानी तीन तलाक़

कुछ लोग लिखित रूप से तलाक़ देते हैं. मुद्दा लिखित रूप से तीन तलाक़ देने का नहीं है. मुद्दा है ज़बानी एक बार में, एक ही सांस में तीन बार तलाक़ देने का है.

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तीन तलाक़ से तलाक़ चाहती हैं मुस्लिम महिलाएं

ज़्यादातर भारतीय मुसलमानों के बीच अगर एक मुस्लिम मर्द अपनी पत्नी को एक ही सांस में तीन बार ज़बानी तलाक़ कहता है तो उसकी शादी ख़त्म हो जाती है.

बाद में उसे पछतावा हो तो इसका कुछ नहीं किया जा सकता.

हाँ, अपनी पत्नी को दोबारा हासिल करने के लिए और उससे निकाह करने के लिए उसकी पत्नी को किसी दूसरे मर्द से शादी करनी होती है और फिर यदि वो 'खुला' या तलाक़ के ज़रिए अलग हो जाते हैं तो वो अपने पहले पति से दोबारा शादी कर सकती है. इसे हलाला कहते हैं. ये प्रथा अब ख़त्म होती जा रही है.

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मामला सुप्रीम कोर्ट में कैसे गया?

कुछ पीड़ित मुस्लिम महिलाओं और मुस्लिम महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने ज़बानी तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

उनके मुक़दमे की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की एक बेंच बनाई है जिसमें सभी अलग-अलग धर्मों से हैं.

जस्टिस कुरियन जोसेफ ईसाई, आरएफ़ नरीमन पारसी, यूयू ललित हिन्दू, अब्दुल नज़ीर मुस्लिम हैं और इस बेंच की अध्यक्षता कर रहे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर, जो सिख हैं. समझा जा रहा है कि गुरुवार को सुनवाई ख़त्म हो सकती है.

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