मोदी सरकार के समय सालाना कितनी नौकरियां?

  • 17 मई 2017
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वर्ष 2016 में तक़रीबन डेढ़ लाख ही नए रोज़गार पैदा हुए.

जब यूपीए की सरकार थी तब विकास दर 8.5 फ़ीसदी के आसपास थी. हालांकि वो विकास दर भी 'जॉबलेस' थी.

विकास के आंकड़ों में उछाल था लेकिन नई नौकरी पैदा नहीं हो रही थी.

एक अनुमान के मुताबिक़ हर साल 1.2 करोड़ नए लोग रोज़गार की तलाश में आते हैं.

यानी हर साल इतने बेरोज़गार लोगों की फ़ौज तैयार होती है. यूपीए के शासन काल में भी नए बेरोज़गारों का आंकड़ा उतना ही था.

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इनमें से 30 से 40 लाख लोगों को ही रोज़गार मिल पाता था. रोज़गार के अवसर के लिहाज़ से ये भी कोई अच्छी तस्वीर नहीं थी लेकिन मौजूदा हालत से बेहतर थी.

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पिछले तीन सालों से रोज़गार के अवसर में 50 से 60 प्रतिशत की गिरावट आई है. यानी पहले अगर 100 लोगों को नौकरी मिलती थी, वो अब घटकर 40 या 50 के आसपास आ गई है.

आठ क्षेत्रों का आकलन

आठ संगठित क्षेत्रों जैसे आईटी, चमड़ा उद्योग, पर्यटन, टेक्सटाइल में सबसे ज़्यादा रोज़गार के अवसर आते हैं.

इन क्षेत्रों का आकलन करें, तो देखने को मिलता है कि 2010 में यूपीए के कार्यकाल के दौरान जहां 10 लाख लोगों को रोज़गार मिलता था, वहीं अब केवल डेढ़ या दो लाख लोगों को ही रोज़गार मिल पा रहा है.

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ऐसा इसलिए है क्योंकि नई सरकार के आने के बाद सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में काफी गिरावट आई है. यूपीए के दौर में विकास दर अगर 8.5 था. अब एनडीए सरकार के शासनकाल में 7 फ़ीसदी के विकास दर का दावा किया जा रहा है. लेकिन हालात बता रहे हैं कि यह दर वास्तविक तौर पर 5 से 5.5 प्रतिशत के आसपास है.

नोटबंदी की मार

जहां तक औद्योगिक उत्पादन का सवाल है तो उसमें भी एक प्रतिशत की कमी देखी जा रही है. ऊपर से नोटबंदी की मार. नोटबंदी की वजह से भी रोज़गार घटा है. यूपीए के कार्यकाल के दौरान ये 3 से 3.5 प्रतिशत के आसपास था जो अब 2 से 2.5 के आसपास है.

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उसी तरह वर्ष 2016-2017 के बैंक से दिए जाने वाले कर्ज के आंकड़े बताते हैं कि इसमें भी पिछले 60 सालों में सबसे ज़्यादा कमी देखी जा रही है. इससे पहले यह गिरावट 1953 में देखी गई थी.

रोज़गार की अगर बात की जाए तो सिर्फ़ आईटी क्षेत्र की 5-6 कंपनियों ने पिछले कुछ महीनों में 56 हज़ार कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है.

आईटी सेक्टर का संकट

आईटी क्षेत्र की कंपनियों की संघ नैसकॉम के अनुसार फिलहाल आईटी क्षेत्र में 40 लाख लोग कार्यरत हैं. अगले चार से पांच साल में इनमें से आधे से ज़्यादा लोगों पर छंटनी की तलवार लटक रही है.

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'ऑटोमेशन' इसका एक बड़ा कारण है क्योंकि अब मशीनें ही ज़्यादा काम कर रही हैं. सिर्फ़ आईटी ही नहीं दूसरे क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर 'ऑटोमेशन' चल रहा है जिसकी वजह से नौकरियां जा रही हैं.

नए उद्योगों में अब 'रोबोट' ही ज़्यादा काम कर रहे हैं इसलिए यहां कर्मचारियों की ज़रूरत नहीं है. बिजली उत्पादन क्षेत्र और टेक्स्टटाइल उद्योग में भी हर चीज़ कम्प्यूटराइज़्ड हो गई है इसलिए यहां भी कर्मचारियों की छंटनी हो रही है. भारत को बेरोज़गारी की इस चुनौती को नए सिरे से देखना पड़ेगा.

(बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत पर आधारित)

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