डायरी: कश्मीर में किसकी सुरक्षा कर रहे हैं भारतीय सुरक्षा बल?

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श्रीनगर में कर्फ़्यू के बीचोंबीच कई महीने बिताने के बाद जब मैंने अपना पहला लेख लिखा और उसे अपने एक ख़ास दोस्त को पढ़ाया, तो वो मुझसे नाराज़ हो गया.

उसकी आपत्ति इस बात को लेकर कतई नहीं थी कि हम दोनों के बीच वैचारिक मतभेद हैं. उसकी आपत्ति इस बात से थी कि मैंने अपने लेख में 'सुरक्षा बल' शब्द इस्तेमाल किया.

एक बार को तो मुझे लगा कि मेरे 12 साल के पत्रकारिता के करियर के सामने यह एक बड़ा और उचित सवाल है, जो मेरे दोस्त ने उठाया है. मुझे लगा, शायद मेरे प्रशिक्षण से इस किस्म से सवाल गायब हो चुके हैं.

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सवाल था कि किसकी सुरक्षा? उनका आरोप था कि ये शब्द उनके लिए इस्तेमाल हो रहा है जो स्थानीय कश्मीरियों को पीट रहे हैं, उनका उत्पीड़न कर रहे हैं और उन्हें मार भी रहे हैं- उनकी सुरक्षा?

आप देखेंगे कि किसी भी संघर्ष क्षेत्र में जब सशस्त्र बलों को उतारा जाता है, तो इस बात पर भी विवाद रहता है कि उसका मकसद क्या स्थानीय लोगों की सुरक्षा है. हां, यह ज़रूर है कि बार बार हिंसा और लंबे समय तक वहां रहने के बाद ये बल स्थानीय लोगों को ही दुश्मन के तौर पर देखने लगते हैं.

इस तथ्य को ध्यान में रखकर जब आप पूरी स्थिति पर नज़र घुमाते हैं, तो देखते हैं कि ऐसे तमाम शब्द मीडिया इस्तेमाल करता है जो आम नागरिकों के लिए संवेदनशून्य हैं. उन्हें लिखते वक़्त समुदायों का ज़रा भी ख़्याल नहीं रखा गया है.

यही नहीं, कई बार ये शब्द कई समुदायों का तिरस्कार भी करते हैं.

शब्दों का इस्तेमाल और कंडीशनिंग

लेकिन जिन शब्दों का स्वभाविक इस्तेमाल हम लोग करते हैं, वो काफ़ी हद तक हमारी कंडीशनिंग का परिणाम होते हैं.

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मसलन, जब हिज़बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की हत्या हुई, तो करीब 100 दिनों तक कश्मीर में हिंसा का एक दौर चला. इसके बाद पीपुल्स यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) की एक टीम तथ्यों को तलाशने के लिए दक्षिण कश्मीर के दौरे पर गई थी. मैं उस दौरे पर टीम के साथ सफ़र कर रही थी. यह वो इलाका था, जहां हिंसा के दौरान उच्चतम मृत्यु दर दर्ज की गई थी.

पंपोर के पास जब एक छोटे से गांव में हम लोग पहुंचे, तो हमारी मुलाक़ात एक लड़के से हुई. स्नातक की पढ़ाई कर रहे उस लड़के ने हमसे सवाल किया, "राष्ट्रीय राइफ़ल्स (आरआर) के अधिकारियों और जवानों ने उनके 30 वर्षीय लेक्चरर को हिरासत में लिया, जिनकी बाद में मौत की ख़बर आई. तो आप अब भी मानेंगे कि ये सुरक्षा बल हैं? किसकी सुरक्षा? ये हमारी सुरक्षा के लिए तो नहीं हैं."

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मेरे लेख पर मेरे पत्रकार साथी ने जो सवाल उठाए थे, उनके पीछे से मुझे पंपोर में मिले उस नौजवान की आवाज़ सुनाई दे रही थी.

एक ओर मेरा वो दोस्त था, जिसने कश्मीरी संघर्ष पर तमाम लेख पढ़े थे और वो इस विवाद पर तमाम विचारकों से चर्चा करता रहा था.

और दूसरी ओर वो स्थानीय लड़का था. दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर के मुद्दे, विवाद और सुरक्षा बलों की तैनाती पर दोनों की समझ और निष्कर्ष लगभग एक समान थे.

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लेकिन इन दोनों की राय को आप दिल्ली के किसी सीनियर पत्रकार से मिला कर देखेंगे, जो संघर्ष को कवर करता रहा है, तो पाएंगे कि वो अपनी कॉपी में या अपने बयान में सैन्य तैनाती को और फ़ौज को 'सुरक्षा बल' का पर्याय मानने लगे हैं.

मतभेद एक शब्द तक नहीं

'सुरक्षा बल' एकमात्र शब्द नहीं है, जिसके दो पक्ष हैं. ऐसा भी नहीं है कि यह चर्चा सिर्फ़ कश्मीर तक सीमित है.

भारतीय पत्रकार स्वदेशी लोगों के लिए आदिवासी शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं. जबकि, इस शब्द के इस्तेमाल को आपत्तिजनक माना जाता है.

और तो और, जो लोग भारत के मूल निवासियों के अधिकारों पर और उनके बचाव में लिखते हैं, वो भी आदिवासी शब्द से पीछा नहीं छुड़ा पाए हैं.

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अब अगर आप लोकल में जाएं, तो आप पाएंगे कि समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाला स्थानीय मीडिया इस मामले में ज़्यादा ज़िम्मेदार और बेहतर है.

मसलन, जो नौजवान कश्मीर में सशस्त्र प्रतिरोध का हिस्सा हैं, उन्हें चरमपंथी या फिर विद्रोही कहने की बजाय दिल्ली का मीडिया 'आतंकवादी' कहता है. अब इसकी तुलना पंजाब से करें, तो पंजाब के विद्रोहियों को आतंकवादी नहीं, उग्रवादी कहा जाता था और अनेक लोग उनके विद्रोह को 'पंजाब की मिलिटेंसी का दौर' बताते हैं.

ऐसे में यह समझने की ज़रूरत है कि मीडिया जिस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल कश्मीर के लिए करता है, उससे कश्मीर के स्थानीय लोग लगातार भारत के ख़िलाफ़ हो रहे हैं या ख़िलाफ़ होने के लिए उकसाए जा रहे हैं.

आंदोलन या विद्रोह?

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पिछले साल जब कश्मीर जल रहा था और हर दिन मौतों की संख्या बढ़ती जा रही थी, तो भारतीय मीडिया उसे 'प्रदर्शन' या 'आंदोलन' के रूप में संबोधित कर रहा था. जबकि स्थानीय लोगों की नज़र में यह एक 'विद्रोह' था.

स्थानीय लोगों की यह सोच स्थानीय मीडिया की कवरेज में दिखाई देती है.

लेकिन इस पर बात क्यों होनी चाहिए? यह बात महत्वपूर्ण क्यों है?

वो इसलिए कि जब कभी भी 'डायलॉग' होगा, कश्मीर मुद्दे को सुलझाने का संकल्प लिया जाएगा, तो उन मुद्दों को समझना होगा, जो कश्मीरी लोगों को प्रभावित करते हैं.

क्योंकि मसला यहां गरिमा का भी है. तो क्या हम दूसरों का सम्मान करने में सक्षम हैं? यह सोचने लायक है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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