पोखरण टेस्ट 1: जब कृष्ण ने उंगली पर उठाया पहाड़ को...

  • 18 मई 2017
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18 मई, 1974 की सुबह आकाशवाणी के दिल्ली स्टेशन पर 'बॉबी' फ़िल्म का वो मशहूर गाना बज रहा था, "हम तुम एक कमरे में बंद हों और चाबी खो जाए."

ठीक नौ बजे गाने को बीच में ही रोक कर उद्घोषणा हुई, कृपया एक महत्वपूर्ण प्रसारण की प्रतीक्षा करें.

कुछ सेकंड बाद रेडियो पर उद्घोषक के स्वर गूंजे, "आज सुबह आठ बजकर पांच मिनट पर भारत ने पश्चिमी भारत के एक अज्ञात स्थान पर शांतिपूर्ण कार्यों के लिए एक भूमिगत परमाणु परीक्षण किया है."

इससे एक दिन पहले लंदन में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के प्रधान सचिव पीएन हक्सर बार-बार भारतीय उच्चायुक्त बीके नेहरू से सवाल कर रहे थे, "दिल्ली से कोई ख़बर आई?"

जैसे ही भारत के परमाणु परीक्षण की ख़बर मिली नेहरू ने हक्सर के चेहरे पर आई राहत को साफ़ पढ़ा.

वो समझ गए कि हक्सर क्यों बार-बार दिल्ली से आने वाली ख़बर के बारे में पूछ रहे थे.

किसका सिर काटा जाए

पाँच दिन पहले 13 मई को परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना की देखरेख में भारत के परमाणु वैज्ञानिकों ने परमाणु डिवाइस को असेंबल करना शुरू किया था.

14 मई की रात डिवाइस को अंग्रेज़ी अक्षर एल की शक्ल में बने शाफ़्ट में पहुंचा दिया गया था. अगले दिन सेठना ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी. इंदिरा गाँधी से उनकी मुलाक़ात पहले से ही तय थी.

Image caption होमी सेठना

सेठना ने कहा, "हमने डिवाइस को शाफ़्ट में पहुंचा दिया है. अब आप मुझसे ये मत कहिएगा कि इसे बाहर निकालो क्योंकि ऐसा करना अब संभव नहीं है. अब आप हमें आगे जाने से नहीं रोक सकतीं."

इंदिरा का जवाब था, "गो अहेड. क्या तुम्हें डर लग रहा है?"

सेठना बोले, "बिल्कुल नहीं. मैं बस ये बताना चाह रहा था कि अब यहाँ से पीछे नहीं मुड़ा जा सकता." अगले दिन इंदिरा गाँधी की मंज़ूरी ले कर सेठना पोखरण वापस पहुँचे.

उन्होंने पूरी टीम को जमा किया और सवाल किया कि अगर ये परीक्षण असफल हो जाता है तो किसका सिर काटा जाना चाहिए? बम के डिज़ाइनर राजगोपाल चिदंबरम ने छूटते ही जवाब दिया, "मेरा."

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टीम के उपनेता पी के आएंगर भी बोले, "किसी का सिर काटने की ज़रूरत नहीं है. अगर ये असफल होता है तो इसका मतलब है भौतिकी के सिद्धांत सही नहीं हैं." ( राजा रमन्ना, इयर्स ऑफ़ पिलग्रिमेज)

जीप ने दिया धोखा

18 मई की सुबह पोखरण के रेगिस्तान में गर्मी कुछ ज़्यादा ही थी. विस्फोट को देखने के लिए वहाँ से पाँच किलोमीटर दूर एक मचान-सा बनाया गया था.

वहाँ पर होमी सेठना, राजा रमन्ना, तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल बेवूर, डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष बीडी नाग चौधरी, टीम के उपनेता पी के आयंगर और लेफ़्टिनेंट कर्नल पीपी सभरवाल मौजूद थे.

नाग चौधरी के गले में कैमरा लटक रहा था और वो लगातार तस्वीरें खींच रहे थे. चिदंबरम और एक दूसरे डिज़ाइनर सतेंद्र कुमार सिक्का कंट्रोल रूम के पास एक दूसरे मचान पर थे.

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Image caption भारत ने दूसरा परमाणु परीक्षण 1998 में वाजपेयी सरकार के दौरान किया.

श्रीनिवासन और इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेशन टीम के प्रमुख प्रणव दस्तीदार कंट्रोल रूम के अंदर थे. परीक्षण के लिए सुबह आठ बजे का समय निर्धारित किया गया था.

लेकिन इससे एक घंटे पहले अंतिम जाँच करने गए वैज्ञानिक वीरेंद्र सिंह सेठी की जीप परीक्षण स्थल पर स्टार्ट होने का नाम ही नहीं ले रही थी. समय निकलता जा रहा था. आख़िरकार सेठी ने जीप वहीं छोड़ी और दो किलोमीटर पैदल चल कर कंट्रोल रूम पहुँचे.

सेठना ने वहाँ मौजूद थल सेनाध्यक्ष जनरल बेवूर से पूछा कि जीप का क्या किया जाए जो परीक्षण स्थल के बिल्कुल पास खड़ी थी. जनरल बेवूर का जवाब था, "ओह यू कैन ब्लो द डैम थिंग अप."

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ऐसा करने की नौबत नहीं आई क्योंकि इस बीच भारतीय सेना के जवान एक जीप ले कर वहाँ पहुंच गए और ख़राब जीप को टो करके सुरक्षित जगह पर लाया गया. लेकिन इस चक्कर में परीक्षण का समय पाँच मिनट और बढ़ा दिया गया.

वी विल प्रोसीड

अंतत: मचान के पास मौजूद लाउड स्पीकर से उल्टी गिनती शुरू हुई. सेठना और रमन्ना ने ट्रिगर दबाने का गौरव प्रणव दस्तीदार को दिया.

जैसे ही पाँच की गिनती हुई प्रणव ने हाई वोल्टेज स्विच को ऑन किया. दस्तीदार के पैरों से ज़मीन निकल गई जब उन्होंने अपनी बाईं तरफ़ लगे इलेक्ट्रीसिटी मीटर को देखा.

मीटर दिखा रहा था कि निर्धारित मात्रा का सिर्फ़ 10 फ़ीसदी वोल्टेज ही परमाणु डिवाइस तक पहुँच पा रहा था. उनके सहायकों ने भी ये देखा. वो घबराहट में चिल्लाए, "शैल वी स्टॉप ? शैल वी स्टॉप?" हड़बड़ी में गिनती भी बंद हो गई.

Image caption राजा रमन्ना

लेकिन दस्तीदार का अनुभव बता रहा था कि शॉफ्ट के अंदर अधिक आद्रता की वजह से ग़लत रीडिंग आ रही है. वो चिल्लाए, "नो वी विल प्रोसीड."

जॉर्ज परकोविच अपनी किताब 'इंडियाज़ न्यूकिल्यर बॉम्ब' में लिखते हैं आठ बज कर पाँच मिनट पर दस्तीदार ने लाल बटन को दबाया.

कृष्ण ने पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया

उधर मचान पर मौजूद सेठना और रमन्ना ने जब सुना कि गिनती बंद हो गई है तो उन्होंने समझा कि विस्फोट को रोक दिया गया है.

रमन्ना 'इयर्स ऑफ़ पिलग्रिमेज' में लिखते हैं कि उनके साथी वैंकटेशन ने जो इस दौरान लगातार विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहे थे, अपना जाप रोक दिया था.

अभी सब सोच ही रहे थे कि उनकी सारी मेहनत बेकार गई है कि अचानक धरती से रेत का एक पहाड़-सा उठा और लगभग एक मिनट तक हवा में रहने के बाद गिरने लगा. बाद में पी के आएंगर ने लिखा, "वो ग़ज़ब का दृश्य था. अचानक मुझे वो सभी पौराणिक कथाएं सच लगने लगी थीं जिसमें कहा गया था कि कृष्ण ने एक बार पर्वत को अपनी उंगली पर उठा लिया था."

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उनके बग़ल में बैठे सिस्टम इंटिगरेशन टीम के प्रमुख जितेंद्र सोनी को लगा जैसे उनके सामने रेत की क़ुतुब मीनार खड़ी हो गई हो.

औंधे मुंह गिरे

तभी सभी ने महसूस किया मानो एक ज़बरदस्त भूचाल आया हो. सेठना को भी लगा कि धरती बुरी तरह से हिल रही है. लेकिन उन्होंने सोचा कि विस्फोट की आवाज़ क्यों नहीं आ रही? या उन्हें ही सुनाई नहीं पड़ रहा ? (रीडिफ़.कॉम से बातचीत- 8 सितंबर 2006)

लेकिन एक सेकेंड बाद विस्फोट की दबी हुई आवाज़ सुनाई पड़ी. चिदंबरम, सिक्का और उनकी टीम ने एक दूसरे को गले लगाना शुरू कर दिया. चिदंबरम ने बाद में लिखा, ''ये मेरे जीवन का सबसे बड़ा क्षण था.'' जोश में सिक्का मचान से नीचे कूद पड़े और उनके टख़ने में मोच आ गई.

कंट्रोल रूम में मौजूद श्रीनिवासन को लगा जैसे वो ज्वार भाटे वाले समुद्र में एक छोटी नाव पर सवार हों जो बुरी तरह से डगमगा रही हो. रमन्ना ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मैंने अपने सामने रेत के पहाड़ को ऊपर जाते हुए देखा मानो हनुमान ने उसे उठा लिया हो."

लेकिन वो इस उत्तेजना में भूल गए थोड़ी देर में धरती कांपने वाली है. उन्होंने तुरंत ही मचान से नीचे उतरना शुरू कर दिया. जैसे ही धरती हिली मचान से उतर रहे रमन्ना अपना संतुलन नहीं बरक़रार रख पाए और वो भी ज़मीन पर आ गिरे.

ये एक दिलचस्प इत्तेफ़ाक़ था कि भारत के परमाणु बम का जनक, इस महान उपलब्धि के मौक़े पर पोखरण की चिलचिलाती गर्म रेत पर औंधे मुँह गिरा पड़ा था.

बुद्धा इज़ स्माइलिंग

अब अगली समस्या थी कि इस ख़बर को दिल्ली इंदिरा गाँधी तक कैसे पहुँचाया जाए?

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सिर्फ़ इसी मक़सद से सेना ने वहाँ पर प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए ख़ास हॉट लाइन की व्यवस्था की थी. पसीने में नहाए सेठना का कई प्रयासों के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क स्थापित हुआ.

दूसरे छोर पर प्रधानमंत्री के निजी सचिव पी एन धर थे. सेठना बोले, "धर साहब, एवरी थिंग हैज़ गॉन..." तभी लाइन डेड हो गई.

सेठना ने समझा कि धर को लगा होगा कि परीक्षण फ़ेल हो गया है. उन्होंने सेना की जीप उठाई और लेफ़्टिनेंट कर्नल पीपी सभरवाल के साथ बदहवासों की तरह ड्राइव करते हुए पोखरण गाँव पहुँचे जहाँ सेना का एक टेलिफ़ोन एक्सचेंज था.

वहाँ पहुँच कर सेठना ने अपना माथा पीट लिया जब उन्होंने पाया कि वो धर का डाएरेक्ट नंबर भूल आए हैं.

यहाँ सभरवाल उनकी मदद को आगे आए. उन्होंने अपनी सारी अफ़सरी अपनी आवाज़ में उड़ेलते हुए टेलिफ़ोन ऑपरेटर से कहा, "गेट मी द प्राइम मिनिस्टर्स ऑफ़िस. "

ऑपरेटर पर उनके इस आदेश का कोई असर नहीं हुआ. उसने ठेठ हिंदी में पूछा आप हैं कौन?

काफ़ी मशक्क़त और हील हुज्जत के बाद आख़िरकार प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क हुआ.

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बहुत ख़राब लाइन पर लगभग चीखते हुए सेठना ने वो मशहूर कोड वर्ड कहा, "बुद्धा इज़ स्माइलिंग. "

प्रधानमंत्री निवास

उस घटना के 29 वर्षों बाद तक पी एन धर ने ये बात किसी को नहीं बताई कि सेठना के ये सारे प्रयास बेकार साबित हुए थे क्योंकि दस मिनट पहले ही थलसेनाध्यक्ष जनरल बेवूर का फ़ोन उन तक पहुँच चुका था.

धर उनसे सीधा सवाल नहीं कर सकते थे क्योंकि टेलिफ़ोन लाइन पर बातचीत सुनी जा सकती थी. धर ने उनसे पूछा था ' क्या हाल है?' बेवूर का जवाब था,' सब आनंद है.'

धर को उसी समय लग गया कि भारत का परमाणु परीक्षण सफल रहा है. उन्होंने तुरंत प्रधानमंत्री निवास का रुख़ किया. उस समय इंदिरा गाँधी अपने लॉन में आम लोगों से मिल रही थीं.

जब उन्होंने धर को आते हुए देखा तो वो लोगों से बात करना बंद उनकी तरफ़ दौड़ीं. उखड़ी हुई साँसों के बीच उन्होंने पीएन धर से पूछा, "क्या हो गया."

धर का जवाब था, "सब ठीक है मैडम."

धर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "मुझे अभी भी याद है कि ये सुनते ही इंदिरा गाँधी की बाँछे खिल गई थीं. एक जीत की मुस्कान को उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था."

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