'ग़रीबों के मसीहा' लालू ने ऐसे दूर की अपनी ग़रीबी

  • 18 मई 2017
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कौन हैं लालू? इस सवाल पर यह जवाबी सवाल ही सटीक बैठता है कि 'को नहिं जानत है जग में?'

लालू अपनी सियासी लीलाओं के कारण विख्यात हुए हों या घोटालों की वजह से कुख्यात- इस पर यहाँ बहस छेड़ना मेरा मक़सद नहीं है.

मक़सद है उनकी पहचान संबंधी विभिन्न पहलुओं में से कुछ का ज़िक्र करना ताकि चारा घोटाले की ही तरह बेनामी संपत्ति विवाद में भी उनकी चर्चा पढ़-सुन रही नई पीढ़ी को लालू यादव के बारे में थोड़ी और जानकारी मिल सके.

भारतीय राजनीति के इस बहुचर्चित बिहारी नेता की अब उम्र हो गई है 68 साल. गोपालगंज ज़िले के फुलवरिया गाँव में एक ग़रीब परिवार में जन्मे.

आखिर लालू और नीतीश के बीच चल क्या रहा है?

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राष्ट्रीय जनता दल

दो बेटे और सात बेटियों के पिता हैं. पटना यूनिवर्सिटी से बीए और एलएलबी पास हैं. लगभग चालीस साल पहले जेपी आंदोलन के समय छात्र नेता के रूप में उभरे.

फिर सियासत में सितारा चमका तो वर्ष 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री का ओहदा मिल गया. जनता दल से अलग हो कर 'राष्ट्रीय जनता दल' नाम से अपनी पार्टी बनाई.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि अचानक पशुपालन विभाग में हुए अरबों रुपये के घपले का भंडाफोड़ हो गया.

शासन के दूसरे टर्म का अभी आधा समय भी नहीं गुज़रा था कि चारा घोटाले में फंसे लालू प्रसाद को कुछ समय के लिए जेल जाना पड़ा.

तब से लेकर आठ-नौ वर्षों तक लालू यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री पद पर बिठा कर परोक्ष रूप से शासन चलाते रहे.

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लालू-राबड़ी राज

उस दौरान मुश्किलों के कई दौर आए. क़ानून व्यवस्था की समस्या, ख़ास कर अपहरण की घटनाओं में वृद्धि ने बिहार पर अराजक राज्य होने का दाग लगाया.

बिजली, सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा ने लालू-राबड़ी राज की छवि बिगाड़ दी.

लेकिन, मुस्लिम-यादव के ठोस जनाधार और अन्य पिछड़ी जातियों के सहयोग से अपनी चुनावी ताक़त किसी तरह बनाए रखने में लालू कामयाब होते रहे.

हालांकि यह सिलसिला बहुत लंबा नहीं चल सका.

लालू-राबड़ी शासन काल के कुल पंद्रह वर्षों में जमा हुए जनाक्रोश को नीतीश-बीजेपी गठबंधन ने अपनी ताक़त बनाई और उसी के बूते लालू को परास्त किया.

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लालू की लीला

लेकिन सियासत का खेल देखिए कि लालू यादव अपने धुर विरोधी नीतीश कुमार के साथ गठबंधन करके बिहार की सत्ता पर फिर काबिज हो गए.

एक बेटे को मंत्री और दूसरे बेटे को उप मुख्यमंत्री बनवा लिया. अब फिर वही चारा घोटाले जैसा संकट उन पर दिख रहा है.

आरोप है कि अपने सत्ता-प्रभाव का बेजा इस्तेमाल करके लालू यादव ने बेनामी लेन-देन के ज़रिये एक हज़ार करोड़ रुपए की संपत्ति अपने बेटे-बेटियों के नाम करा ली.

अब आयकर विभाग उनसे जुड़े ठिकानों पर छापे डाल कर सबूत इकट्ठा कर रहा है. इसलिए लोग कहते हैं कि लालू की लीला अपरंपार है.

राजनीति में प्रवेश से पहले गांव के ठेठ गँवार और ग़रीबों के यार समझे जाने वाले लालू अब अपने कुनबा समेत अरबपतियों की श्रेणी में आ गए हैं.

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सोची-समझी सियासत

ऐसे बहुरंगी और विरोधाभासी व्यक्तित्व/चरित्र के नेता इस देश में शायद ही कोई और होंगे.

अपनी तरह का एक अकेला, जो धन्नासेठों पर गरजते हुए कब सपरिवार धन्नासेठ हो गया, आम लोगों को पता ही नहीं चला.

इनके प्रति जुनूनी समर्थन और घृणा की हद तक विरोध-दोनों मैंने देखे हैं.

इनके पीछे जहाँ ग़रीबों और पिछड़ों के हुजूम उमड़ते रहे हैं, वहीं बाहुबलियों और दागियों की कतारें भी लगती रही हैं.

जातीय आरक्षण, सामाजिक न्याय और सेकुलरिज़्म के पक्ष में ख़ूब ज़ोर से बोलना इनकी सोची-समझी सियासत का हिस्सा रहा है.

कुल मिला कर देखें तो लालू चाहे सत्ता में रहे हों या विपक्ष में, चाहे विवादों में रहे हों या जन संवादों में, हमेशा सुर्ख़ियों में होते हैं.

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