क्या 15-20 माओवादियों के मारे जाने का दावा ग़लत है?

  • 20 मई 2017
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छत्तीसगढ़ के बस्तर में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल द्वारा पंद्रह से बीस माओवादियों के मारे जाने के दावे का माओवादियों ने खंडन किया है.

माओवादियों ने आरोप लगाया है कि सुरक्षाबल के जवानों ने कुछ गांवों में हमला किया और वहाँ रहने वाले आदिवासी ग्रामीणों के घरों में जमकर आगज़नी की है.

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पुलिस का दावा है कि सुकमा ज़िले के चिंतलनार स्थित रायगुड़म में ख़ुद माओवादियों ने ही ग्रामीणों की कई झोपड़ियों में आग लगाई है. इस सिलसिले में पुलिस ने माओवादी छापामारों पर प्राथमिकी दर्ज भी कर ली है.

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छत्तीसगढ़ के बस्तर में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल द्वारा पंद्रह से बीस माओवादियों के मारे जाने के दावे का माओवादियों ने खंडन किया

केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ ने दावा किया था कि सुकमा और बीजापुर में स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर नक्सलियों के खिलाफ एक बड़ा ऑपरेशन चलाया गया है, जिसके दौरान उन्होंने 15 से 20 माओवादी छापामारों को मार गिराया है.

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सुरक्षा बलों ने इस अभियान को 'अबतक के सबसे बड़े आपरेशन' की संज्ञा दी थी जिसकी निगरानी गृह मंत्रालय के विशेष सुरक्षा सलाहकार के विजय कुमार और सीआरपीएफ के नवनियुक्त महानिदेशक खुद कर रहे थे.

अभियान के दौरान माओवादी छापामारों के साथ हुई मुठभेड़ में सीआरपीएफ का एक जवान भी मारा गया था, जबकि एक जवान गंभीर रूप से घायल हुआ था.

कोई शव नहीं मिला है

आपरेशन के फ़ौरन बाद बस्तर में सीआरपीएफ के आईजी देवेंद्र चौहान ने पत्रकारों से बातचीत में कहा था, "सुकमा की सीमा पर एक सघन नक्सल विरोधी अभियान चलाया गया जिसमें 350 के आसपास जवान और अधिकारी शामिल थे. सुरक्षा बलों ने लगातार दो दिनों तक माओवादियों से लोहा लिया. यानी 13 और 14 मई की रात दोनों तरफ से ख़ूब गोलियां चलीं. अभियान के दौरान सुरक्षा बलों ने करीब पंद्रह से बीस माओवादियों को मार गिराने में कामयाबी हासिल की है."

अभियान की कामियाबी का दावा करते हुए आला पुलिस अधिकारियों ने अपनी पीट खूब थपथपाई है. मगर दावों के बावजूद मुठभेड़ के बाद किसी भी माओवादी छापामार का शव बरामद नहीं हो पाया है. शव बरामद नहीं होने पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ख़ामोश हैं.

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दूसरी तरफ माओवादियों ने एक बयान जारी किया है जिसमे दावा किया गया है कि सुरक्षा बलों के 'ऑपरेशन' में उन्हें, यानी माओवादियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है.

जगदीश इरपा, माओवादी कमांडर के अनुसार, "सीआरपीएफ़ का दावा पूरी तरह ग़लत है. हमारा कोई भी साथी नहीं मारा गया है. हक़ीकत ये है कि पुलिस ने 13 से 15 मई तक कई गांवों में हमला किया और लोगों को प्रताड़ित किया है."

दहशत फैलाने का आरोप

माओवादी प्रवक्ता का आरोप है कि सुकमा के चिंतलनार के इलाक़े के तीन गांवों में पुलिस ने गोलीबारी की. इसी इलाक़े के रायगुड़म गांव के 16 घरों में आग लगा दी, जिससे आदिवासियों का घर और उनका सारा सामान जल कर राख हो गया.

हालांकि आगजनी की इस घटना को लेकर सुकमा पुलिस ने माओवादियों पर ही आरोप लगाया है कि उन्होंने ही दहशत फैलाने के लिये घरों में आग लगाई है.

इस मामले में पुलिस ने दो सिपाहियों कोडयामी नंदा और माडवी जोगी की शिकायत पर माओवादियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ की है.

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पिछले महीने की 24 तारीख़ को सुकमा के ही बुरकापाल इलाके में माओवादियों के हमले में सीआरपीएफ के 26 जवान मारे गये थे.

इससे पहले इसी इलाके में 11 मार्च को माओवादियों ने सीआरपीएफ की 219वीं बटालियन पर भी हमला किया था जिसमे 12 जवान मारे गए थे.

इन हमलों के बाद सीआरपीएफ़ ने आरोप लगाया था कि स्थानीय पुलिस सहयोग नहीं कर रही है. इस आरोप के बाद एक उच्च स्तरीय बैठक में साझा ऑपरेशन चलाए जाने की बात कही गई थी.

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तबसे सुरक्षाबल और स्थानीय पुलिस माओवादियों के ख़िलाफ़ लगातार ऑपरेशन चला रहे हैं और बड़ी संख्या में संदिग्ध माओवादियों द्वारा आत्मसमर्पण की ख़बरें भी सामने आई हैं.

पुलिस ने कुछ माओवादियों को गिरफ़्तार भी करने का दावा किया है.

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