आँखों देखीः पत्रकारिता का राष्ट्रवादी हवन और कल्लूरी का 'वॉर ऑफ परसेप्शन'

  • 20 मई 2017
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सुबह के नौ बजे जब मैं आईआईएमसी के परिसर में पहुंचा तो कैंपस के सारे गेट पर तालों के साथ पुलिसवाले थे और जो एक गेट खुला था, वहां एक व्यक्ति ने ये कहते हुए रोक दिया कि मीडिया वालों को अंदर नहीं जाने दिया जाएगा क्योंकि अंदर हवन हो रहा है.

थोड़ी देर बाद इसी व्यक्ति ने मेरी एक तस्वीर ली जिसमें मेरा आईकार्ड मेरे हाथ में पकड़ने को कहा गया.

अंदर परिसर के लॉन में एक अख़बार पर एक लोहे का बर्तन था जिसमें से धुआं उठ रहा था. नीचे पुराना मिंट अख़बार पड़ा था. संभवतः हवन यहीं हुआ होगा क्योंकि आसपास भगवा-पीले कुर्तों में घूमते नौजवानों के माथे पर तिलक शोभायमान था.

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यज्ञ के बाद आईआईएमसी के अलावा बस मिंट अख़बार शुद्ध हो पाया था.

अंदर पहला सत्र शुरू होने वाला था और हर पत्रकार को मेरी ही तरह आईकार्ड के साथ तस्वीर के बिना घुसने नहीं दिया जा रहा था. हालांकि बाकी लोग बिना कोई परिचय पत्र दिखाए आयोजकों के साथ हाय-हेलो कर के घुस रहे थे.

सेमिनार का विषय कुछ यूं था कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय पत्रकारिता. मैंने राष्ट्रीय पशु सुना था, राष्ट्रीय खेल भी, राष्ट्रीय पक्षी भी, लेकिन राष्ट्रीय पत्रकारिता पहली बार देख रहा था.

चूंकि यज्ञ हो चुका था तो दीप प्रज्जवलन जैसी कोई औपचारिकता नहीं हुई और गुलाबी कुर्ता पहने किसी कवि महोदय ने पति पत्नी वाले जोक्स और अपनी राष्ट्रवादी कविताएं सुनाकर शुरुआत की.

हालांकि उन्होंने बताया कि वो राष्ट्रीय टीवी पर भी आते हैं लेकिन चूंकि मैं टीवी नहीं देखता तो मुझे पता नहीं चला कि वो कितने महान कवि हैं.

पहले सेशन को संभालने के लिए फिर किसी टीवी एंकर को बुलाया गया जिनका परिचय इतना है कि वो ज़ी टीवी के एंकर हैं. उन्होंने ज़ी टीवी जैसी ही बातें कहीं और मंच पर मौजूद चार वक्ताओं से एक किताब का विमोचन करवाया.

Image caption कैंपस के बाहर विरोध-प्रदर्शन करते स्टूडेंट्स

यह भी कहा गया कि सभाओं में बुके दिए जाते हैं और वो बुक दे रहे हैं. इस तरह से एकार की मात्रा हटाकर उन्होंने नई परंपरा शुरु करने का दावा किया.

सत्र के पहले वक्ता आशीष गौतम थे जिन्हें सब आशीष भैय्या, आशीष भैय्या कहते रहे. उनके भाषण में राष्ट्र, संवर्धन, संरक्षण, कर्तव्य कम से कम पच्चीस तीस बार तो आया ही होगा.

दूसरे वक्ता दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे योगेश जी. उनके भाषण का लब्बोलुआब यही था कि उनके यूनिवर्सिटी से जिन बच्चों को गूगल में सवा करोड़ का पैकेज मिला है वो स्वार्थी हैं. बीच में उन्होंने ये भी बताया कि अमरीका में जब मंदी आई थी तो कंपनियां दो-दो चार-चार रुपए में बिक गई थीं.

खैर तब तक आईआईएमसी के डायरेक्टर जनरल केजी सुरेश का नंबर था जो पिछले कुछ देर से सोफे पर अपनी दाईं हथेली की एक ऊंगली से अपने माथे को यूं संभाले हुए थे मानो उन पर महती जिम्मेदारी हो.

उन्होंने अपना भाषण यहीं से शुरु किया कि आईआईएमसी के बाहर नारे लगा रहे लोग आसुरी शक्तियां हैं जो यज्ञ में विघ्न डाल रही हैं. इस पर ज़ाहिर है कि तालियां बजीं लेकिन चूंकि चालीस से अधिक लोग नहीं थे तो तालियां भी थम गईं.

आगे उन्होंने विरोधियों के लिए "अरे मूर्खों" जैसे संबोधनों से शुरुआत की और बताया कि भारत के केरल में सबसे पहले चर्च बनाने की ज़मीन हिंदू राजाओं ने दी थी और 'साठ साल पुराना सेकुलरिज़्म सड़ चुका है'.

दक्षिण भारत के होते हुए केजी सुरेश ने जिस विश्वास से हिंदी में भाषण दिया वो तारीफ करने लायक था हालांकि उन्होंने जो कहा वो सुनने में अजीब था. इस कार्यक्रम में केजी के ही शब्दों में आईआईएमसी के शिक्षकों और छात्रों को नहीं बुलाया गया था और ऐसा कर के वो दावा कर रहे थे कि जब छात्रों को बुलाया नहीं गया तो फिर भगवाकरण भी नहीं हुआ.

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हां केजी सुरेश ने नारद से पत्रकारिता सीखने की भी सलाह दी और कहा कि कल्लूरी को बुलाने का विरोध बेकार है क्योंकि नारद जी तो देवता और असुर दोनों से मिलते थे इसलिए यहां भी पत्रकारों को कल्लूरी से मिलना चाहिए और सवाल पूछना चाहिए.

इन शॉर्ट पत्रकारों को नारद हो जाना चाहिए (देवताओं के हित में…अब देवता तो वही होंगे जिन्होंने यज्ञ किया)

ज़ाहिर है कि राष्ट्रीय पत्रकारिता में उपदेश का बहुत महत्व है तो केजी जाते जाते सत्य की पहचानने का मंत्र बता गए - कि सत्य अगर देश के लिए खराब है तो कम बताना चाहिए. और पत्रकार सोचें कि क्या कोई सत्य समाज के हित में है?

हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि ये तय कैसे होगा कि क्या समाज के हित में है?

चूंकि केजी डीजी हैं तो वो लंबा ही बोले. उनके बाद भाषण किन्हीं अशोक भगत जी को देना था जो वनवासी कल्याण आश्रम जैसी किसी संस्था से जुड़े हैं और बताया गया कि वो टाना भगत की परंपरा से हैं.

हालांकि केजी के भाषण में ज्यादातर लोग उठ कर सेमिनार हॉल से बाहर आ गए. इन लोगों में मैं भी था. बाहर फेसबुक पर सक्रिय कुछ लिक्खाड़ भी मिल गए. एक भगवा वस्त्र पहने संन्यासिन भी थीं जिनसे बात करते हुए पता चला कि वो भी किसी सत्र में भाषण देने वाली हैं.

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Image caption बस्तर के पूर्व आईजी पुलिस शिवराम प्रसाद कल्लूरी

इस बीच पता ये चला कि संस्थान के गेट के बाहर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. जब वहां पहुंचा तो देखा कि वो बीसेक गिने चुने चेहरे वही पुराने नारे लगा रहे हैं - कल्लूरी गो बैक, कल्लूरी गो बैक. नारे लगाने में भी वही चार लोग जो हर विरोध प्रदर्शन में दिख जाते हैं जेएनयू के.

विरोध के दौरान ही कुछ लोग साइड में सिगरेट सुलगाने में भी लगे थे. मुझे अचानक से समझ आया कि अंदर और बाहर लोगों की संख्या तकरीबन बराबर ही है. अंदर चालीस पचास और बाहर तीस चालीस.

माहौल को तनावपूर्ण दिखाने की पूरी कोशिश हुई लेकिन खाकी वर्दी की भरपूर मौजूदगी में कुछ हुआ नहीं.

इस बीच आयोजकों में से एक आशीष अंशु बार बार आस पास से गुजरते रहे और अचानक हम लोगों से आकर कहने लगे कि आप लोग अंदर बैठिए और अगर इच्छा नहीं है सेमिनार में बैठने की तो आप लोग बाहर जा सकते हैं.

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Image caption छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने बस्तर के आईजी पुलिस शिवराम प्रसाद कल्लूरी की गिरफ़्तारी की मांग करते हुए एक कार्टून जारी किया था.

मुझसे ये बात उन्होंने प्यार से और कुछ अन्य लोगों को तल्ख अंदाज़ में भी कही. हरी टी शर्ट पहने अंशु कई आयोजकों में से एक थे लेकिन लोग आयोजक के रूप में उनका ही नाम ले रहे थे. स्टेज पर चढ़ते उतरते हड़बड़ाते अंशु को देख कर लग रहा था कि उन्होंने बड़ी ज़िम्मेदारी उठा ली है.

उधर एक और सत्र शुरू हो गया था जिसमें पत्रकारों की दुर्दशा पर विचार हो रहा था लेकिन ऐसी कोई बात नहीं की गई जिसके बारे में कुछ लिखा जाए.

अगला सत्र शुरू होते ही लगभग पूरी जनता बाहर निकल गई क्योंकि लंच बंटने लगा था. चूंकि आईआईएमसी की कैंटीन बंद कर दी गई थी इसलिए वहां खाने के अलावा कोई चारा नहीं था.

खाते समय आयोजकों ने बार बार पूछा कि अब तो फेवरेबल रिपोर्ट लिखिएगा. मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि आप खाने के पैसे हाथ के हाथ ले लीजिए.

खैर जैसे ही वापस लौटा तो पाया कि जो सत्र चल रहा है उसमें कोई धोतीधारी संस्कृत में श्लोक पढ़े जा रहे हैं और धर्म एवं राष्ट्र की व्याख्या कर रहे हैं. दर्शकों में बीसेक लोग होंगे.

धोतीधारी जी ये बता रहे थे कि अवतार क्यों लेते हैं भगवान आदि आदि…बाद में पता चला कि वो कथावाचक हैं यानी धार्मिक कथाएं सुनाते हैं.

कल्लूरी का दिल्ली लॉन्च

असल में सारे पत्रकार और कई अन्य लोग पूरा दिन बिता रहे थे बस्तर के विवादित आईजी रहे कल्लूरी की बातें सुनने के लिए.

दोपहर का सत्र शुरू हुआ और कल्लूरी जी आए. उनके साथ मंच पर इतिहास के प्रोफेसर दिवाकर मिंज, जेएनयू के प्रोफेसर बुद्धि सिंह भी थे और मंच संचालन किन्हीं राजीव रंजन के पास था जिन्होंने बस्तर पर किताब लिखी है.

दलितों-वंचितों के विमर्श से जुड़े इस सत्र में दिवाकर मिंज ने अपनी बात आदिवासियों की कठिनाइयों पर केंद्रित रखी लेकिन जेएनयू के प्रोफ़ेसर बुद्धि सिंह ने माइक लेते ही बहुत ज़ोर-ज़ोर से बोलना शुरु किया.

वो अपने पूरे समय में जेएनयू को गालियां देते रहे और बताते रहे कि जेएनयू कितनी घटिया जगह है, वहां कितने घटिया प्रोफेसर हैं और वहां सबकुछ कितना घटिया है. उन्होंने कम से कम पांच बार नौ फरवरी की घटना का ज़िक्र किया और कहा कि जेएनयू के प्रोफेसर निहायत ही ख़राब लोग हैं.

खैर उनके इस रोष पर एसआर कल्लूरी ने भी टिप्पणी की कि आपकी आवाज़ सुनकर मुझे मेरी पत्नी याद आ गई क्योंकि पत्नियां ऐसे ही ज़ोर ज़ोर से बोलती हैं. इस बात पर बुद्धि जी तनिक भी नहीं मुस्कुराए.

हां, कल्लूरी जी के मंच पर आते ही स्टेज के नीचे …आगे से चार युवक और पीछे से चार युवकों ने उठकर जय श्री राम और भारत माता की जय वाले नारे लगाए. कल्लूरी के आने के बाद सभागार में लोगों की संख्या पर्याप्त मात्रा में बढ़ गई थी.

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कल्लूरी के माथे पर आज न तो सफेद तिलक था और न ही वो सैनिक वेश में थे. काला कोट, खाकी कलर की पैंट और पैरों में संभवतः वुडलैंड के जूते. बालों में तेल लगा हुआ और हाथ में एक फाइल. सामान्य कद के कल्लूरी क्लीन शेव्ड थे.

अपनी बात शुरू करते ही उन्होंने कहा कि उन्हें लगा था कि मंच पर कोई जूता फेंकेगा, गाली देगा लेकिन ऐसा न होते देखकर उन्हें ख़ुशी हुई. हालांकि जूते वाली बात जैसे ही उन्होंने कही, उनका बॉडीगार्ड तुरंत पीछे आकर खड़ा हो गया था.

कल्लूरी का कहना था कि लड़ाई परसेप्शन की है. बस्तर, रायपुर और दिल्ली के बीच और इस परसेप्शन को ठीक करना चाहते हैं. शायद इसलिए वो दिल्ली आए भी हैं.

खैर उन्होंने बताया कि इस समय वो बस्तर के आईजी नहीं हैं, उनके पास कोई चार्ज नहीं है लेकिन फिर भी वो अपना काम कर रहे हैं. काम क्या है….ये उन्होंने बहुत स्पष्ट नहीं किया लेकिन ये ज़रूर कहा कि मुझे बस्तर से निकाल दिया गया लेकिन मैं दिल्ली पहुंच गया. उन्हीं के शब्दों में 'कम से कम आज तो दिल्ली में लॉन्च हो गया.'

इस बयान के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं लेकिन ये अर्थ मैं सुधि पाठकों पर छोड़ता हूं. बाद बाकी कल्लूरी ने वही बातें दोहराई जो दक्षिणपंथी लोग कहते हैं नक्सलियों के बारे में लेकिन उन्होंने पति-पत्नी के झगड़ों के ढेर सारे उदाहरण दिए ताकि लोग हंस सकें.

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राष्ट्रवादी पत्रकारिता में पति-पत्नी के जोक्स की अलग बीट होनी चाहिए. क्योंकि आज के सेशन में काफ़ी ऐसे जोक्स सुनाए गए.

कल्लूरी ने एक बात स्वीकार ज़रूर की कि आदिवासी दोनों के बीच पिस रहे हैं. पुलिस और नक्सलियों के. लेकिन इसके बाद वो वापस वही सब कहते रहे जो वो कहते हैं.

आखिर में लिखित में प्रश्न मांगे गए और प्रश्न पूछे जाने पर कल्लूरी ने मुस्कुराते हुए कहा कि आप चाहे जो पूछ लें मैं जवाब वहीं दूंगा जो मैंने किया है और फिर उन्होंने सरकारी योजनाएं गिनवा दीं.

इस बीच एक उत्साही पत्रकार ने हाथ खड़ा कर के सवाल पूछा कि फलां, फलां और फलां पत्रकार के अलावा बहुत सारे पत्रकारों का कहना है कि आप उन्हें परेशान करते हैं. आपको पत्रकारों से क्या एलर्जी है.

कल्लूरी का जवाब था- नाम बताओ….पत्रकार ने नाम बताए तो कल्लूरी बोले- बहुत सारों के नाम बताओ……फिर खुद ही मुस्कुरा कर बोले नहीं बता पाओगे…

शायद कल्लूरी विज्ञापन की थ्योरी पढ़ के आए थे कि किसी भी आदमी को एक झटके में तीन से अधिक नाम याद नहीं रहते.

कल्लूरी इस सवाल के बाद निकल लिए और मैं भी निकल लिया. रास्ते भर सोचता हुआ आया और तत्काल में यही समझ में आया कि कल्लूरी को अब दिल्ली में लोग शायद और देखेंगे. वो बस्तर की परसेप्शन की लड़ाई हार चुके हैं और अब वो ये लड़ाई रायपुर और दिल्ली में लड़ेंगे. इस लड़ाई का पहला पड़ाव संभवत आईआईएमसी ही रहा.

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